US Midterm Elections Result : अमेरिका में एक बार फिर भारतीयों का जलवा देखने को मिल रहा है। अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र में हुए मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने, जहां डोनाल्ड ट्रंप को दुखी कर दिया, वहीं भारतीय मूल के नेताओं की किस्मत चमका दी है। भारतवंशी नेताओं ने अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में अपनी जीत का परचम लहराया है। इन नेताओं ने वर्जीनिया से लेकर फ्लोरिडा और मैरीलैंड तक जीत का डंका बजा दिया है।
फ्लोरिडा में पिया डांडिया ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को शिकस्त देकर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जगह बनाई है। अरुणा मिलर की जीत ने भी भारतीय-अमेरिकी समुदाय को चर्चा का केंद्र बना दिया है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है सुहास सुब्रमण्यम की। सुहास ने वर्जीनिया के 10वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से दूसरी बार चुनाव जीता है। तो कौन हैं सुहास सुब्रमण्यम? बताएंगे आपको इस एक्सप्लेनर में। नमस्कार, मैं हूं सीमा और आप देख रहे हैं कंटाप न्यूज।
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजे
सबसे पहले बात करते हैं कि इस वक्त अमेरिका में क्या चल रहा है। बता दें कि कल यानी मंगलवार को अमेरिका में मिडटर्म चुनाव हुए हैं, जिनके नतीजे आज आने शुरू हो गए हैं। इन नतीजों ने अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ा दी है।
बुधवार की सुबह नॉर्थ कैरोलिना, ओहायो और जॉर्जिया जैसे राज्यों में मतदान खत्म होने के बाद जब शुरुआती नतीजे आने शुरू हुए, तो इनसे ट्रंप को बड़ा झटका लगा। मानो ईरान से युद्ध करने की वजह से महंगाई की मार झेल रही अमेरिका की जनता ने ट्रंप को सजा दे दी हो। शुरुआती रुझानों में ट्रंप की पार्टी काफी पिछड़ गई है और डेमोक्रेट्स बहुमत के आंकड़े को पार करने के काफी करीब हैं।
चुनाव के शुरुआती आंकड़े
अमेरिकी संसद की 435 सीटों पर चुनाव
डेमोक्रेट्स — 144 सीटें, 101 सीटों पर आगे
रिपब्लिकन पार्टी — 94 सीटें, पीछे चल रही
सीनेट की 33 सीटों पर चुनाव
डेमोक्रेट्स — 50 सीटें, 3 सीटों पर आगे
रिपब्लिकन पार्टी — 38 सीटें, पीछे चल रही
दरअसल, अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 सीटों में से 33 सीटों पर चुनाव हो रहा है। अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स के पास 144 सीटें हैं, जबकि वे 101 सीटों पर आगे चल रहे हैं। ऐसे में वे बहुमत के लिए 218 सीटों का आंकड़ा पार कर रहे हैं। 100 सदस्यों वाली सीनेट में डेमोक्रेट्स की संख्या 50 पहुंच गई है और वे 3 सीटों पर आगे चल रहे हैं। इस तरह डेमोक्रेटिक पार्टी को दोनों सदनों में बहुमत हासिल हो गया है।
वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 94 सीटें मिली हैं और सीनेट में भी रिपब्लिकन ने अपनी पकड़ खो दी है। पार्टी के पास अभी 38 सीटें ही हैं।
वर्तमान में दोनों सदनों पर डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का कब्जा है। सीनेट में रिपब्लिकन के पास 53 और डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें हैं। निर्दलीय के पास 2 सीटें हैं। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में रिपब्लिकन के पास 218 और डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। ऐसे में अगर ट्रंप की पार्टी हारती है, तो डेमोक्रेट्स का दोनों सदनों में कब्जा हो जाएगा। हालांकि, इससे ट्रंप की राष्ट्रपति की कुर्सी पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अगले चुनाव में उन्हें इसका नुकसान जरूर हो सकता है।
वर्जीनिया में सुहास सुब्रमण्यम का प्रदर्शन
सुहास को मिले 63.16 फीसदी वोट
डेव टी. बेकविथ को मिले 34.66 फीसदी वोट
28.5 फीसदी वोटों के अंतर से सुहास जीते
सुहास सुब्रमण्यम ने अमेरिका के वर्जीनिया में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता के तौर पर दूसरी बार जीत दर्ज की है। सुहास ने वर्जीनिया के 10वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का चुनाव जीत लिया है।
इस चुनाव में सुहास को 63.16 फीसदी वोट मिले, जबकि उनके रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी डेव टी. बेकविथ को 34.66 फीसदी वोट हासिल हुए। आंकड़ों की बात करें, तो सुहास को कुल 1 लाख 73 हजार 106 वोट मिले, वहीं बेकविथ के खाते में 94 हजार 990 वोट आए। दोनों के बीच करीब 28.5 प्रतिशत अंकों का अंतर रहा।
इस जीत के साथ सुहास ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में अपनी जगह बरकरार रखी है। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह वर्जीनिया के 10वें जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी नेता हैं।
सुहास सुब्रमण्यम कौन हैं?
सुहास सुब्रमण्यम की पहचान सिर्फ एक सांसद तक सीमित नहीं है। सुहास भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका आए थे। सुहास का जन्म साल 1979 में अमेरिका के वर्जीनिया में हुआ था। उनकी मां बेंगलुरु से हैं, जबकि उनके पिता चेन्नई और सिकंदराबाद से हैं। यानी सुहास का पारिवारिक रिश्ता भारत से जुड़ा है, लेकिन उनकी राजनीतिक जड़ें अमेरिका में पनपी हैं।
राजनीति में आने से पहले सुहास कानून के पेशे से जुड़े रहे। उन्होंने टुलेन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रित्जकर स्कूल ऑफ लॉ से कानून की डिग्री हासिल की।
व्हाइट हाउस से अमेरिकी संसद तक का सफर
उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत भी काफी दिलचस्प रही है। सुहास ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में व्हाइट हाउस में टेक्नोलॉजी पॉलिसी एडवाइजर के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा।
साल 2019 में वह वर्जीनिया हाउस ऑफ डेलीगेट्स के लिए चुने गए। इसके बाद 2023 से 2024 तक वर्जीनिया की सीनेट में भी रहे। साल 2024 में पहली बार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुने गए और अब 2026 में दूसरी बार जीत दर्ज करके उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया है।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने सुहास को किया मतदान
इस चुनाव में जीत हासिल कर सुहास सुब्रमण्यम ने एक खास संदेश दिया है। उन्होंने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से ज्यादा से ज्यादा संख्या में मतदान करने की अपील की थी। उनका कहना था कि अमेरिका में बढ़ती नफरत और भेदभाव के माहौल के बीच लोगों की आवाज पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में हर व्यक्ति को अपने वोट की ताकत पहचाननी चाहिए।
उन्होंने भारतीय-अमेरिकियों से सिर्फ मतदान करने की ही अपील नहीं की, बल्कि राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भी प्रेरित किया। इतना ही नहीं, सुहास अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों से जुड़े मुद्दे भी उठाते रहे हैं। इनमें ग्रीन कार्ड के लिए लंबा इंतजार और H-1B वीजा से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं। यानी उनकी राजनीति में एक तरफ अमेरिकी नागरिकों के रोजमर्रा के मुद्दे हैं, तो दूसरी तरफ भारतीय मूल के पेशेवरों की समस्याएं भी शामिल हैं।
अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं का दबदबा
अमेरिका के इस चुनाव के नतीजों से एक बात साफ नजर आती है। अमेरिका में भारतीय मूल के नेता अब केवल प्रवासी समुदाय के प्रतिनिधि बनकर नहीं रह गए हैं, बल्कि वे अमेरिकी राजनीति के अहम पदों तक पहुंच रहे हैं।
इससे पहले कमला हैरिस का नाम भी सुर्खियों में था, जब वह अमेरिका की उपराष्ट्रपति बनने वाली पहली भारतीय-अफ्रीकी मूल की महिला बनी थीं। इस लिस्ट में बॉबी जिंदल का नाम भी शामिल है। 2008 में वह 30 साल की उम्र में भारतवंशी अमेरिकी गवर्नर बने और अमेरिका के इतिहास में अपनी जगह बनाई।
अमेरिका में भारतवंशी सुहास सुब्रमण्यम, पिया डांडिया, विवेक रामास्वामी और अरुणा मिलर ने अमेरिकी जनता का समर्थन हासिल कर यह साबित किया है कि अमेरिका में अब बदलाव हो रहा है।
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