Akhilesh Yadav Not Contest Election : उत्तर प्रदेश में 2027 में सीएम की कुर्सी धर्म के आधार पर शुभ और अशुभ को देखकर तय किया जाता है। 2017 और 2022 का चुनाव हारने के बाद अखिलेश यादव ने इस बार खुद किसी सीट से चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। शायद अखिलेश यादव ने शुभ और अशुभ संकेतों की गणना कर ली है। वो समझ गए हैं कि अगर सीएम की कुर्सी पर बैठना है तो यूपी की विरासत को फॉलो करना ही होगी।
हम एसा क्यों कह रहे हैं ये भी बता दें कि यूपी में अबतक वही सीएम की कुर्सी पर बैठता है जो चुनाव नहीं लड़ता है। फिर चाहे वो मुलायाम सिंह यादव हो खुद अखिलेश यादव हो या सीएम योगी हो, इन सभी ने बिना चुनाव लड़े ही सीएम बने। और इस दौरान ये सभी लोकासभा सांसद रहें।
हालांकि, सीएम योगी ने 2017 में चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन 2022 में योगी ने इस प्रथा को तोड़ा और चुनाव लड़कर सीएम की कुर्सी पर बैठे। हांलांकि ये तब हुआ जब योगी सीएम की कुर्सी पर बैठे थे यानी सीएम रहते हुए उन्होंने विधायकी लड़ी। तो क्या यूपी की सत्ता कौन संभालेगा ये अंधविश्वास से तय होता है?
अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे?l
उत्तर प्रदेश की सियासत में CM की कुर्सी का फैसला सियासी गणित से नहीं बल्कि शुभ और अशुभ गणित से होता है। यूपी की सत्ता वही संभालेगा जो चुनाव खुद नहीं लड़ेगा। यानी कि विधानसभा का चुनाव न लड़ना भी एक शुभ संकेत है सीएम बनने के लिए। लगातार दो बार चुनाव हारने के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ये साफ कर दिया है कि वो इस बार 2027 का विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। यानी खुद चुनावी मैदान में उतरने के बजाय उम्मीदवारों को चुनाव लड़वाएंगे। लेकिन अखिलेश ने इस फैसले की वजह कोई सियासी प्लान नहीं बताया बल्कि शुभ-अशुभ का तर्क दिया है।
दरअसल, अभी हाल ही में अखिलेश यादव जब वाराणसी पहुंचे तो उनसे सवाल पूछा गया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में वो किस सीट से चुनाव लड़ेंगे। इस पर पहले तो अखिलेश मुस्कुराए और कहा- तुम ही बता दो। लेकिन इसके बाद उन्होंने ऐसा जवाब भी दिया, शुभ और अशुभ को मानते हैं या नहीं ये भी बताया। सुनिए।
अखिलेश यादव के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना अशुभ?
अखिलेश का ये बयान सिर्फ एक सियासी रणनीति नहीं बल्कि। इसके पीछे 2012 का एक पुराना राजनीतिक किस्सा छिपा हुआ है। जब अखिलेश यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, उस वक्त वो विधानसभा के सदस्य नहीं थे, बल्कि कन्नौज से लोकसभा सांसद थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और एमएलसी बन गए। यानी अखिलेश सीएम की कुर्सी पर जब बैठे थे तो वो विधायक नहीं थे, सांसद थे। इसके बाद अखिलेश ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में विधायकी लड़ी थी।
2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पहली बार विधानसभा के चुनावी मैदान में उतरे थे। उन्होंने मैनपुरी की करहल सीट से चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की थी। लेकिन उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच पाई। और वह सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठ पाए।
इसके बाद 2022 में अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ा और और फिर से वह विधायक बन गए लेकिन सरकार नहीं बनाए पाए थे। तो अब अखिलेश ने सीएम की कुर्सी पर बैठने का रास्ता ढूंढ लिया और वो रास्ता ये है कि अखिलेश इसबार खुद विधायकी का चुनाव नहीं लड़ेंगे। सांसद बने रहते हुए ही चुनाव जीतेंगे और सीएम बनेंगे।
लेकिन सवाल है कि क्या अखिलेश यादव के लिए विधानसभा का चुनाव लड़ना अशुभ है। क्या यूपी की सियासत में मुख्यमंत्री बनने का कोई ऐसा फॉर्मूला है, जिसमें चुनाव लड़ने के बजाय चुनाव लड़वाना ज्यादा शुभ माना जाता है। तो इसे समझने के लिए यूपी की सियासत के पुराने चुनावों के नतीजों पर गौर करना होगा और देखना होगा कि क्या इससे पहले भी यूपी के कोई सीएम बिना चुनाव लड़े सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं।
बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बने ये नेता
अब जरा यूपी की सियासत के इतिहास पर नजर डालिए। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। इसमें सबसे बड़ा उदाहरण खुद अखिलेश यादव का है। साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। और सरकार बनाई, मुलायम सिंह यादव ने अपनी जगह अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया था। उस समय अखिलेश यादव कन्नौज से सांसद थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान परिषद के सदस्य बने।
यूपी में ये गणित सिर्फ अखिलेश यादव के लिए ही फिट नहीं बैठता। इस लिस्ट में मुलायम सिंह यादव और योगी आदित्यनाथ शामिल हैं। अगर यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की बात करें तो वो भी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे, तब उन्होंने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। मुलायम सिंह यादव लोकसभा की राजनीति में सक्रिय थे और सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बने थे।
वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने की शुरुआत भी इसी तरह हुई थी। साल 2017 में जब बीजेपी ने यूपी में प्रचंड बहुमत हासिल किया था और सरकार बनाई थी। तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया था। उस वक्त योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से लोकसभा सांसद थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने विधान परिषद की सदस्यता ली थी।
इसके बाद सीएम योगी ने साल 2022 में इस परंपरा को बदल दिया। उन्होंने गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। खास बात ये है कि सीएम योगी ने मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा का चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने। अब अखिलेश यादव को यूपी की कुर्सी पाने की यही परंपरा याद आ गई है और उन्होंने चुनाव न लड़ने का एलान कर दिया है।
एक भी सीट पर चुना नहीं हारे अखिलेश यादव
– साल 2000 में अखिलेश यादव ने पहली बार कन्नौज लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।
– 2004 में कन्नौज से दोबारा सांसद बने।
– 2009 में कन्नौज और फिरोजाबाद, दोनों लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत हासिल की।
– 2019 में आजमगढ़ लोकसभा सीट से जीतकर संसद पहुंचे।
– 2022 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और करहल से विधायक बने।
– 2024 में कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे।
यानी अखिलेश यादव ने अब तक कुल सात चुनावी मुकाबलों में जीत हासिल की है। और अब तक कोई चुनाव नहीं हारे हैं। अब देखना होगा कि 2027 में अखिलेश यादव का ये पुराना फॉर्मूला कितना काम आता है।
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