नागपंचमी। अगर सांप दिख जाएं तो आम आदमी डर से हांफने लगता है और कोबरा नजर आ जाए तो मानों जान ही निकल जाऐगी, लेकिन रीवा जिले के एमपी-यूपी बार्डर से लगा हुआ शंकरगढ़ क्षेत्र के कपारी गांव का नजारा इससे उलट ही नजर आता है, क्योकि इस गांव के बच्चों के मित्र सांप होते है और खिलौने की तरह उनके साथ वे खेलते है। यहां के हर घर में सांप यू ही घूमते हुए नजर आ जाऐगे। कपारी गांव में बच्चे गुड्डे-गुड़ियों और खिलौनों से नहीं, बल्कि सांपों से खेलकर बड़े होते हैं। यहां किसी भी छोटे बच्चे के गले में लिपटा हुआ सांप देखकर आप हैरत में पड़ जाएंगे। यहां न तो सांप से बच्चों को कोई नुकसान होता है और न ही लोग सांपों को नुकसान पहुंचाते हैं।
सपेरा समुदाय का निवास करता है परिवार
जानकारी के तहत इस गांव में सपेरे समुदाय के परिवार रहते हैं। बताते है कि इनका पेशा सांपों को पकड़ना और उनका लालन-पालन करना होता है। कपारी गांव के सपेरे नागपंचमी पर्व पर अपने नाग देवता को लेकर शहर पहुचते है और नाग देवता का दर्शन कराकर कुछ पैसे कमा लेते है। बताते है कि सपेरा परिवार की कमाई का जारिया ही सांप है। वे घरों में घुसे सांपों को पकड़ते है और इससे भी उन्हे पैसे मिल जाते है, तो जंगल से सांप पकड़ कर उसका लालन-पालन करते है।
जितना ज्यादा सांप उतना बड़ा रूतबा
बताते है कि कपारी गांव के सपेरों में सांपो को पालने में कम्पटीशन होता है। जिस परिवार के पास जितना ज्यादा सांप होते है समाज में उसका उतना ज्याद रूतबा होता है। इस बस्ती या गांव के लगभग हर घर में सांप पाले जाते हैं। बच्चे बहुत कम उम्र से ही सांपों के साथ रहना सीख जाते हैं और उनसे डरते नहीं हैं। नाग (कोबरा), करैत, वाइपर, घोड़ा पछाड़ जैसे जहरीले सांपों को यहां घरों में पाला जाता है। लोगों का कहना है कि घर में पलने वाले कुछ सांप जहरीले भी होते हैं, कभी किसी की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
जड़ीबूटी से उतार देते हैं सांप का जहर
स्थानीय लोगों के अनुसार इन सांपों के जहरीले दांत या तो निकाल दिए जाते हैं या उनका जहर असरहीन कर दिया जाता है, जिससे बच्चों को खतरा नहीं होता। यदि सांप काट भी लेता है, जड़ीबूटी (नर्घीस, जहेर, मोगरा) है जिससे जहर उतार देते हैं, बाकी सब ऊपर वाले के हाथ में हैं।
सांपों को स्पर्श से हो जाता है एहसास
लोगों का कहना है कि घर में पलने वाले कुछ सांप जहरीले भी होते हैं, लेकिन कभी किसी की मौत सांप के काटने से नहीं हुई। उन्हें स्पर्श से अहसास हो जाता है कि पकड़ने वाला उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगा। इस गांव की मिट्टी ही ऐसी है कि यहां सांप और इंसान स्वाभाविक रूप से दोस्त की तरह रहते आए हैं।
एक महीने बाद तोड़ते हैं दांत
सपेरा समुदाय के लोग सांपो के दांत पकड़ने के एक महीने के बाद तोड़ते हैं, क्योंकि पकड़े जाने से सांप बहुत दुखी होते हैं और कुछ खाते नहीं। यदि दांत तोड़ देंगे, तो ये जो भी खाएंगे उसे पचा नहीं पाएंगे। दांतों का जहर ही खाना पचाने में मदद करता है।




