कौन हैं हरियरी देवी और भुईंया बाबा? सावन के महीने में क्यों होती है इनकी पुजाई?

Hariyari Ki Pujai: विंध्य और बघेलखंड की लोकपरंपरा और संस्कृति में कई लोकदेवता और देवियों का जिक्र है जिनमें बाबा साहब, बरमबाबा इत्यादि प्रमुख हैं जिनकी पुजाई हर वर्ष परंपरा अनुसार इसी कड़ी में विंध्य से संबंध रखने वाले एक लोकदेवता हैं भुईंया बाबा जिनकी पुजाई सावन मास में हरियरी की पुजाई के साथ की जाती है।

कौन हैं हरियरी देवी?

जब सावन के महीने में पड़ने वाली वर्षा की फुहारों से धरती हरीतिमा की चादर ओढ़ लेती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी नवयौवना ने प्रकृति के रंगों से स्वयं का अनुपम श्रृंगार कर लिया हो। खेतों में रोपे गए धान के कोमल पौधों की कौमार्यता देखकर सहज ही लगता है, जैसे धरती ने हरे रंग के नवीन परिधान धारण कर लिए हों। वर्षा से धुले वृक्ष, लहलहाती बेलें और उनकी पत्तियों पर ठहरी जल-बूंदें जब पुरवा के मंद झोंकों के साथ टपककर धरती पर बिखरती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो आकाश से मोतियों की वर्षा हो रही हो। नदियाँ और तालाब वर्षा के जल से लबालब भर उठते हैं और मानो उमंग से छलकने लगते हैं। कहीं तेज बारिश की गूँज है, तो कहीं रिमझिम फुहारों की मधुर तान। झूमते वृक्ष, महकती मिट्टी और हरियाली से सराबोर धरती मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं कि लगता है मानो स्वयं प्रकृति उल्लास और आनंद में मग्न होकर जीवन का उत्सव मना रही हो। यही है वह अनुपम प्रकृति और उसकी हरियाली, जिसकी पूजा विंध्य और बघेलखंड में ‘हरियरी की पुजाई’ के रूप में की जाती है।

क्यों की जाती है हरियरी की पुजाई?

सावन की मनोहारी ऋतु में विंध्य और बघेलखंड के गांवों में यह लोकपरंपरा पूरे उल्लास के साथ जीवंत हो उठती है। गाँव की महिलाएँ सिर पर पूजा की टोकरियाँ और हाथों में पूजा की थालियाँ लिए देवी-स्थलों की ओर जाती हैं। दरअसल, लोकपरंपराओं के आधार पर माना जाता है कि प्रारंभिक काल में यह पुजाई मुख्यतः कृषक समुदाय द्वारा प्रकृति-पूजा के रूप में की जाती थी। इसका मूल भाव उसी प्रकृति-पूजा की परंपरा से जुड़ा प्रतीत होता है, जिसकी झलक हमें गोवर्धन पूजा जैसे उत्सवों में भी दिखाई देती है। यदि ध्यान से देखें, तो भारतीय दर्शन में आदिशक्ति को मूलतः प्रकृति-स्वरूपा ही माना गया है। समस्त सृष्टि, वनस्पति, जल, पर्वत और पृथ्वी उसी आदिशक्ति की अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं। यही कारण है कि प्रकृति की आराधना को भी देवी-उपासना का ही एक रूप माना गया है। लेकिन कालांतर में जब लोकआस्थाओं का समन्वय वैदिक और पौराणिक परंपराओं से हुआ, तब बघेलखंड की अनेक ग्राम-देवियाँ- जैसे फूलमती, शीतला, बूढ़ीदाई तथा अन्य स्थानीय देवियों के साथ-साथ पौराणिक देवियाँ, जैसे कालिका और चंडी भी हरियरी की पुजाई की इस परंपरा से जुड़ती चली गईं।

कैसे और कब शुरू हुई परंपरा

दरअसल, पहले इन क्षेत्रों में अनेक जनजातियाँ निवास करती थीं, जो समय-समय पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसती रहती थीं। जीविकोपार्जन और कृषि के विस्तार के लिए इन लोगों ने जंगलों को साफ कर नई भूमि को खेती योग्य बनाना प्रारंभ किया। उस समय भूमि की कोई कमी नहीं थी, लेकिन खेती के लिए उपजाऊ तथा जलस्रोतों के निकट स्थित भूमि अपेक्षाकृत कम मिलती थी। इसलिए लोग प्रायः ऐसी ही जगहों के आसपास निवास करते थे, जहाँ खेती करना आसान हो और पानी की सुविधा भी उपलब्ध हो। इस प्रकार विकसित हुई ग्राम-बसाहट को बघेलखंड में ‘खेर’ कहा जाता था। जब तक लोग उस स्थान पर रहते, अपने देवी-देवताओं की पूजा अपनी परंपरा के अनुसार किया करते थे। लेकिन उस समय मनुष्य स्वभाव से ही घुमंतू था। इसलिए वह और बेहतर की तलाश में अपनी बसाहट छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चला जाता था। इसको बघेलखंड में ‘खेर उसलना’ कहा जाता था। हालाँकि, खेर उसलने के पीछे कई और भी प्राकृतिक कारण हुआ करते थे।

जब देवता भी गाँव के साथ स्थायी होने लगे

मनुष्य तो वहाँ से चले जाते थे, लेकिन भूमि वहीं रह जाती थी और उनके देवी-देवताओं के पूजास्थल भी उसी स्थान पर बने रहते थे। मध्यकाल में, विशेष रूप से रीवा राजाओं के स्थायी शासन के बाद जब विंध्य और बघेलखंड में गाँवों की बसाहट स्थिर होने लगी, तब ग्राम-समाज ने अपनी ग्राम-देवियों के लिए स्थायी पूजा-स्थलों का निर्माण प्रारंभ किया। प्रारंभिक समय में इन देवस्थलों का स्वरूप अत्यंत सरल होता था। प्रायः किसी नीम, पीपल या बरगद जैसे पवित्र वृक्ष के नीचे छोटी-सी चौरी या चबूतरा बनाकर उस पर प्राकृतिक अथवा गढ़े हुए पत्थर को ग्रामदेवी के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता था और वहीं उनकी पूजा-अर्चना होती थी। समय के साथ जब ग्राम-समाज अधिक संगठित और समृद्ध हुआ, तो इन पूजा-स्थलों का स्वरूप भी विकसित होने लगा।

हर खेर की होती थी अपनी देवी

अनेक स्थानों पर ग्राम-देवियों के लिए छोटे-छोटे स्थायी मंदिर बनाए गए, जिन्हें बघेली बोली में ‘मेढ़ुली’ कहा जाता है। यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों और गाँवों में इनके नाम और स्वरूप में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं, फिर भी उनका मूल उद्देश्य एक ही था, गाँव की अधिष्ठात्री ग्रामदेवी की पूजा करना। इसी परंपरा के कारण प्रत्येक ‘खेर’ या मूल ग्राम-बसाहट की अपनी एक ग्रामदेवी मानी जाने लगी, जिन्हें स्थानीय लोकमान्यता में ‘खेर की देवी’ कहा जाता है। माना जाता था कि इन ग्रामदेवियों का अधिकार-क्षेत्र निश्चित होता है और उसी ग्राम-सीमा के निवासी उनकी आराधना करते हैं। हरियरी की पुजाई के अवसर पर सबसे पहले इन्हीं ग्रामदेवियों का स्मरण किया जाता तथा उनसे अच्छी वर्षा, भूमि की उर्वरता, भरपूर फसल, रोगों, महामारियों और वन्य जीवों से गाँव की रक्षा की प्रार्थना की जाती थी।

कब होती है हरियरी की पुजाई

परंपरा के अनुसार हरियरी की पुजाई, बाबा साहब की पुजाई के बाद सावन मास में नागपंचमी से पहले पड़ने वाले किसी सोमवार या गुरुवार को उजियारे पक्ष, अर्थात शुक्ल पक्ष, में की जाती है। बघेलखंड की लोकमान्यता के अनुसार सोमवार और गुरुवार, दोनों ही देवी-पूजन के लिए शुभ माने जाते हैं। हालाँकि, विभिन्न गाँवों और क्षेत्रों में स्थानीय परंपरा तथा सुविधा के अनुसार बाबा साहब की पुजाई के तुरंत बाद, आषाढ़ मास के सोमवार या गुरुवार को भी हरियरी की पुजाई संपन्न कर ली जाती है। इस अवसर पर ग्रामदेवी की पूजा गाँव के मंदिरों, मेढ़ुलियों अथवा चौरी-चबूतरों पर स्थापित उनके देवस्थलों में की जाती है। देवी को प्रसाद के रूप में बेसन के रोट, आटे के रोट, नारियल, चना दाल तथा आलन अर्थात बेसन का घोल अर्पित किया जाता है। साथ ही उन्हें चुनरी, सिंदूर और अन्य श्रृंगार सामग्री भी यथायोग्य समर्पित की जाती है। और देवी से परिवार के सुख-समृद्धि, रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

कौन हैं भुईंया बाबा

हरियरी की पुजाई में ग्रामदेवी के साथ-साथ भुईंया बाबा की पूजा का भी विशेष महत्व है। लोकमान्यता के अनुसार भुईंया बाबा ग्राम-सीमा, भूमि और ग्राम-क्षेत्र के अधिष्ठाता लोकदेवता माने जाते हैं। उनकी आराधना केवल किसी देवता की पूजा नहीं, बल्कि उस धरती के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव प्रकट करना है, जहाँ मनुष्य अपने परिवार सहित निवास करता है और जिससे उसका जीवन एवं आजीविका जुड़ी होती है। बघेलखंड के लगभग प्रत्येक गाँव में भुईंया बाबा का एक अलग पूजा-स्थल होता है। सामान्यतः उनका कोई भव्य मंदिर नहीं बनाया जाता। उनकी उपस्थिति गाँव के बाहर, सीमा पर किसी चौरी या चबूतरे के रूप में मानी जाती है। अधिकांश स्थानों पर उनका कोई मूर्त स्वरूप भी नहीं होता, बल्कि गढ़े या प्राकृतिक पत्थरों को ही उनके प्रतीक के रूप में स्थापित कर पूजा की जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि यह परंपरा मूर्तिपूजा से अधिक प्रकृति और भूमि के प्रति लोकआस्था पर आधारित है। हरियरी की पुजाई के अवसर पर भुईंया बाबा को सामान्यतः आटे का रोट और नारियल अर्पित किया जाता है। ग्रामीण उनसे गाँव की रक्षा तथा समस्त सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

कोल जनजाति के लोग होते हैं पंडा

इस परंपरा से जुड़ी एक और रोचक और अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह भी है कि, गाँवों में भुईंया बाबा के पंडा या पुजारी परंपरागत रूप से कोल जनजाति के लोग होते हैं, जिन्हें बघेली बोली में ‘भुईंहार’ कहा जाता है। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि भुईंया बाबा की पूजा का संबंध संभवतः बघेलखंड की प्राचीन आदिवासी लोकसंस्कृति से रहा है, जिसे बाद में स्थानीय ग्रामीण समाज ने भी अपनाया और आगे बढ़ाया। इसके साथ ही हरियरी की पुजाई के अवसर पर स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार अनेक अन्य लोकदेवताओं को भी गांवों और क्षेत्र के अनुसार पूजा जाता है। विभिन्न गाँवों में यह परंपरा अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। कहीं ग्राम देवता, कहीं वनदेवता, तो कहीं पशुओं के रक्षक देवता, जलस्रोतों, खेतों तथा गांवों की सीमाओं के रक्षक देवताओं का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। इस तरह देखें तो हरियरी की पुजाई केवल किसी एक देवी-देवता तक सीमित न होकर, संपूर्ण लोकदेव-परंपरा और प्रकृति के पूजा की सामूहिक अभिव्यक्ति बन जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *