सरकारी नौकरी छोड़ शायरी के सरताज बने शकील बदायूंनी

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Death Anniversary Of Shakeel Badayuni :1944 में फिल्मों के लिए गाने लिखने के लिए एक शायर बंबई आया जहां उसकी मुलाक़ात फिल्म निर्माता, एआर कारदार और संगीतकार नौशाद अली से हुई , जिन्होंने उनका इम्तेहान लेने के लिए दर्द और मोहब्बत को एक पंक्ति में समेटने के लिए कहा। शकील ने लिखा, “हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे …” बस फिर क्या था नौशाद ने उन्हें फौरन कारदार की 1947 की फिल्म ‘दर्द’ के लिए रख लिया और गाने जब पर्दे पर आए तो बहुत सफल साबित हुए, खासकर उमा देवी यानी टुन टुन का गया गीत अफ़साना लिख रही हूं, बेशक आप हमारा इशारा समझ गए होंगे , ये शख़्स कोई और नहीं ,बदायूं से आए शकील बदायूंनी थे , जिन्हें अपनी पहली कोशिश में वो कमियाबी मिल गई जिसके वो हक़दार थे ।

कैसे किया शायरी की तरफ़ रुख़:-

दरअसल 3 अगस्त 1916 को उत्तर प्रदेश के बदायूँ में पैदा हुए शकील साहब के वालिद, मोहम्मद जमाल अहमद सोख्ता कादिरी चाहते थे कि वो आगे बढ़ें इसलिए उन्होंने घर पर शकील के लिए अरबी , उर्दू , फ़ारसी और हिंदी के ट्यूशन का इंतज़ाम किया था जिससे उन्हें भाषायी ज्ञान खूब हो गया था और फिर वो अपने दूर के रिश्तेदार हम्द ओ सना कहने वाले शायर ज़िया-उल-कादिरी से , मुतासिर भी थे ,इस वजह से उन्होंने शायरी की तरफ रुख़ किया ।

कॉलेज के मुशायरों में शिरकत:-

1936 में वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाख़िल हुए , तो उन्होंने इंटर-कॉलेज, अंतर-विश्वविद्यालय मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया और जीतने भी लगे ।
1940 में, उनकी शादी सलमा जी से हुई, जो उनकी दूर की रिश्तेदार थीं और बचपन से उनके साथ पली बढ़ी थीं, लेकिन पर्दे के चलन की वजह से वो उनके पास रहकर भी दूर थीं ,कुछ वक्त बाद शकील आपूर्ति अधिकारी के रूप में दिल्ली चले गए, लेकिन मुशायरों में भाग लेना जारी रखा और देश भर में ख्याति अर्जित की।
उन दिनों शायर विशेष रूप से, समाज के दलित वर्गों, उनके उत्थान, समाज की भलाई के बारे में लिखते थे लेकिन शकील की पसंद बिल्कुल अलग थी –

उनकी शायरी रोमांटिक और सबके दिल के करीब थी। शकील अर्ज़ करते थे:-
मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा
मोहब्बतों का हूं राज़दान
मुझे फख्र है मेरी शायरी
मेरी जिंदगी से जुदा नहीं।।

संगीतकार नौशाद का साथ :-

अपने अलीगढ़ के दिनों में, बदायूँनी ने हकीम अब्दुल वहीद ‘अश्क’ बिजनोरी से औपचारिक रूप से उर्दू कविता सीखना भी शुरू कर दिया।
इसके बाद ही आप मुंबई गए थे जहां उन्हें फिल्म ‘ दर्द ‘ से वो कमियाबी हासिल हुई जो बरसों तक जारी रही और कम लोगों को नसीब भी होती है फिर संगीतकार नौशाद का साथ, आपको यूं मिला कि आप दोनों उस दौर में फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मांग वाले संगीतकार/गीतकार जोड़ियों में से एक बन गए।
उन्होंने कई फिल्मों में एक साथ काम किया जैसे :- दीदार (1951), बैजू बावरा (1952), मदर इंडिया (1957) मुग़ल-ए-आज़म (1960) ,दुलारी (1949), शबाब (1954), दुलारी, गंगा जमुना (1961) और मेरे मेहबूब (1963) ।

कुछ और बेमिसाल गाने जिन्होंने दिलाया सर्वश्रेष्ठ गीतकार का ख़ेताब :-

शकील बदायूँनी ने सबसे ज़्यादा गीत नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में लिखे पर रवि और हेमन्त कुमार के भी संगीत बद्ध किए उनके गीत बेमिसाल हैं जैसे . हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं, फिल्म घराना का गीत जिसके लिए उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। रवि के साथ उनकी अन्य उल्लेखनीय फिल्म चौदहवीं का चांद (1960) है, जबकि साहिब बीबी और गुलाम (1962) हेमंत कुमार के साथ उनकी सबसे बड़ी हिट है। मोहम्मद रफी के गाए ,चौदहवीं का चांद के शीर्षक गीत ने 1961 में बदायूंनी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया।
1963 में फ़िल्म बीस साल बाद (1962) के गीत कहीं दीप जले के लिए भी आपको फ़िल्मफ़ेयर में सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला ।

आपकी कलम से निकली नायाब ग़ज़लें भी :-

शकील साहब ने क़रीब 89 फिल्मों के लिए गीत लिखे इसके अलावा, आपने कई बेमिसाल ग़ज़लें भी लिखीं जिन्हें बड़े बड़े गुलूकारों जैसे ,पंकज उधास और बेगम अख़्तर ने आवाज़ दी है।
उपाधि:-
भारत सरकार ने उन्हें गीतकार-ए-आज़म की उपाधि से सम्मानित किया था ।

ज़िंदादिली और दोस्ताना मिज़ाज पे फिदा थे दोस्त :-

शकील साहब की दोस्ती केवल नौशाद ही नहीं बल्कि रवि और ग़ुलाम मोहम्मद के साथ भी बहोत गहरी हो गई थी, जिनके साथ उन्होंने अपने जीवन का भरपूर आनंद लिया। फिल्म बैजू बावरा ,मदर इंडिया ,चौदहवीं का चाँद और मुग़ल ए आज़म आपके करियर में मील का पत्थर साबित हुईं।
जब शकील बदायूँनी को तपेदिक हो गया तो उन्हें इलाज के लिए पंचगनी के एक अस्पताल में रखा गया पर उस समय उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ऐसे में नौशाद ने 3 फ़िल्में उन्हें दिलवाई और गाने के बोल सेनेटोरियम में लिखवाए जिसके लिए उन्हें उनकी सामान्य फीस से लगभग 10 गुना अधिक भुगतान प्राप्त हुआ।

बीमारी ने ले ली ,जान :-

शकील बदायुनी के कलमबद्ध किए उम्दा गीत उस दौर के क़रीब क़रीब सभी संगीतकारों की धुनों पर बन रहे थे पर डायबिटीज़ की वजह से उनकी तबियत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में एडमिट होना पड़ा जिससे वो काफी उदास रहने लगे थे तो उस वक़्त भी शकील साहब को गाने लिखने के लिए नौशाद जी ने कहा और शकील जी ने अपना आखिरी नग़्मा फिल्म जगत को अपनी सलामी देते हुए लिखा” आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले,दिल की सलामी लेले ,कल तेरी बज़्म से परवाना चला जाएगा ,शम्मा रह जाएगी परवाना चला जाएगा ….।” ‘राम और श्याम’ फिल्म के इस गीत को लिखने के बाद 20 अप्रैल 1970 का वो दिन जल्द ही आ गया जब तिरपन वर्ष की उम्र में वो इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए,हमारे लिए दिलनशीं और बेशकीमती नग़्मों का नज़राना छोड़कर, जिनके के ज़रिए वो हमेशा जावेदाँ रहेगें और उनके नक्श ए क़दम पे शायर चलते रहेंगे , सबक लेते रहेंगे। उनकी याद और सम्मान में 3 मई 2013 को इंडिया पोस्ट ने उनकी फोटो के साथ डाक टिकट जारी किया गया था।

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