होर्मुज जलडमरूमध्य में सीजफायर के बाद तेल की राहत तो मिली, लेकिन भारत पर मंडराई एक नई बड़ी मुसीबत ने 40 करोड़ किसानों और कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है।

Indian farmer standing in a dry field under a clear sky representing the monsoon threat.

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के ऐलान ने वैश्विक स्तर पर राहत दी है। इससे होर्मुज संकट टला मगर भारत पर मंडराई एक नई बड़ी मुसीबत ने अब नीति-निर्माताओं की रातों की नींद उड़ा दी है। जहां एक ओर तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के बदलते मिजाज ने देश के करीब 40 करोड़ लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है।

पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण माहौल में आई शांति भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी जीत मानी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया का सबसे प्रमुख तेल व्यापार मार्ग है, वहां युद्ध की आहट खत्म होने से वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली है। हालांकि, कूटनीतिक जीत के इस उल्लास के बीच भारत के कृषि प्रधान ढांचे पर प्रकृति का कहर टूटने की आशंका बढ़ गई है।

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ताजा मौसमी अनुमानों ने भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। जानकारों के मुताबिक, इस साल मॉनसून की बेरुखी देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकती है। भारत में लगभग 40 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़े हैं। यदि बारिश का आंकड़ा औसत से नीचे रहता है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।

होर्मुज संकट टला मगर भारत पर मंडराई एक नई बड़ी मुसीबत: अल-नीनो का डर?

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत महासागर में हो रहे बदलाव भारतीय मॉनसून को प्रभावित कर सकते हैं। भले ही खाड़ी देशों से आने वाले जहाजों का रास्ता अब सुरक्षित है, लेकिन आसमान से बरसने वाली राहत कम होने के आसार हैं। उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में सूखे जैसे हालात पैदा होने की चेतावनी जारी की गई है।

मॉनसून की कमी न केवल फसलों को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि इससे भूजल स्तर में भी भारी गिरावट आती है। भारत की अधिकांश खेती आज भी वर्षा आधारित है। ऐसे में बारिश की एक-एक बूंद की कमी का मतलब है कि बुवाई में देरी और पैदावार में भारी गिरावट।

40 करोड़ लोगों की आजीविका पर सीधा प्रहार

भारत के ग्रामीण अंचलों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए खेती केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन जीने का आधार है। जब मॉनसून कमजोर होता है, तो ग्रामीण बाजारों में मांग घट जाती है। इसका असर ट्रैक्टर कंपनियों से लेकर FMCG सेक्टर तक दिखाई देता है। रबी और खरीफ की फसलों का चक्र बिगड़ने से अनाज की कीमतों में उछाल आने की संभावना है, जो पहले से ही महंगाई से जूझ रहे आम आदमी की जेब पर भारी पड़ेगा।

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वहीं, कम बारिश के कारण चारे की कमी भी हो सकती है, जिससे पशुपालन क्षेत्र से जुड़े लोगों को भारी आर्थिक चपत लगेगी। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस संभावित सूखे से निपटने के लिए आकस्मिक योजना तैयार करने की है।

खाद्य सुरक्षा और महंगाई की दोहरी चुनौती

अगर मॉनसून वास्तव में कमजोर रहता है, तो सरकार को अनाज के बफर स्टॉक का प्रबंधन बहुत सावधानी से करना होगा। दालों और तिलहन के उत्पादन में कमी आने पर वैश्विक बाजार से महंगे दाम पर आयात करना पड़ सकता है। यह स्थिति व्यापार घाटे को बढ़ा सकती है, जिसे तेल की कीमतों में आई कमी भी संतुलित नहीं कर पाएगी।

विभिन्न राज्यों के कृषि विभागों को पहले ही सलाह दी गई है कि वे कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा दें। हालांकि, जमीनी स्तर पर इन योजनाओं को लागू करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।

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