Great Nicobar Development Project Explained In Hindi: द ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का राहुल गांधी (Rahul Gandhi Great Nicobar Project), पूरी कांग्रेस, कांग्रेस समर्थित पार्टियां और इनके समर्थक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स जमकर विरोध कर रहे हैं। और मजेदार बात ये है कि चीन (China On Great Nicobar Development Project) भी इस प्रोजेक्ट के खिलाफ है। चीन का विरोध समझ में आता है, क्योंकि इस प्रोजेक्ट के बनने के बाद भारत रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में आ जाएगा और चीन के लिए खतरा बन सकता है। मगर राहुल गांधी?
क्या है द ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट?
What Is Great Nicobar Development Project: मेनलैंड भारत और बंगाल की खाड़ी से करीब 1300 किलोमीटर दूर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (Andaman Nicobar Islands) स्थित है। 8,249 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में उत्तरी द्वीपों को अंडमान और दक्षिणी द्वीपों को निकोबार कहा जाता है, जो लगभग 1800 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। इन्हीं निकोबार द्वीपों में एक द्वीप है—ग्रेट निकोबार (Great Nicobar) जिसका क्षेत्रफल लगभग 900 वर्ग किलोमीटर है, यानी दिल्ली से छोटा लेकिन मुंबई से थोड़ा बड़ा। इसी द्वीप के करीब 18% हिस्से यानी 166 वर्ग किलोमीटर में सरकार यह प्रोजेक्ट विकसित करने जा रही है।
सरकार ग्रेट निकोबार के दक्षिणी छोर पर स्थित गलाथिया बे एरिया को ग्लोबल शिपिंग हब (Nicobar Global Ship Hub), स्ट्रैटजिक मिलिट्री लोकेशन और एक नए आर्थिक शहर में बदलना चाहती है। यहां 14 मिलियन TEU क्षमता वाला इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (Great Nicobar International Transshipment Port), ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Great Nicobar Greenfield International Airport), 450 मेगावॉट का गैस और सोलर हाइब्रिड पावर प्लांट, सेना-नेवी-वायुसेना के बेस और एक टाउनशिप बनाई जाएगी।
निकोबार में ये सब क्यों?
दरअसल, ग्रेट निकोबार से सिर्फ 75 किलोमीटर दूर है स्ट्रेट ऑफ मलक्का (Malacca Strait)। यह दक्षिण-पूर्व एशिया का एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित है।
Strait Of Hormuz Vs Malacca Strait: जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का 20% तेल और गैस गुजरता है, वैसे ही मलक्का स्ट्रेट से भी करीब 20% तेल और दुनिया का एक चौथाई समुद्री व्यापार गुजरता है। इसे दुनिया का “मरीन हाइवे” कहा जाता है। खास बात यह है कि चीन का लगभग 65% व्यापार और 80% तेल आयात इसी रास्ते से होता है।
अगर भारत यहां से करीब 40 नॉटिकल माइल्स की दूरी पर अपनी मजबूत सैन्य मौजूदगी बनाता है, तो किसी भी तनाव या युद्ध की स्थिति में इस रास्ते पर निगरानी रख सकता है और दबाव बना सकता है। यही वजह है कि चीन चिंतित है।
ट्रांसशिपमेंट के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता
India’s Transshipment Dependency: भारत एक बड़ा व्यापारिक देश है, लेकिन समुद्री लॉजिस्टिक्स में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। देश के लगभग 70-75% कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों—जैसे सिंगापुर, कोलंबो या पोर्ट क्लांग—से होते हैं। बड़े जहाज सीधे हर बंदरगाह पर नहीं जाते, बल्कि पहले इन बड़े हब्स पर कंटेनर उतरते हैं, फिर छोटे जहाजों से आगे भेजे जाते हैं—इसे ही ट्रांसशिपमेंट कहते हैं।
भारत खुद ऐसा हब क्यों नहीं बना पाया?
- पहला कारण- भौगोलिक स्थिति: मलक्का स्ट्रेट के पास जो बंदरगाह पहले से हैं वो शिपमेंट हब बने हुए हैं. सिंगापुर और कोलंबो ठीक उसी मुख्य समुद्री मार्ग पर हैं, जहाँ से दुनिया का बड़ा व्यापार गुजरता है। जबकि भारत के अधिकतर बड़े बंदरगाह जैसे मुंबई, चेन्नई मुख्य रूट से थोड़ा अंदर हैं। बड़े जहाज़ों को वहाँ तक आने के लिए ज्यादा दूरी और ज्यादा समय लगता है
- दूसरा कारण- गहराई और इंफ्रास्ट्रक्चर: बड़े कंटेनर जहाज़ों को 18–20 मीटर तक गहराई चाहिए होती है। भारत के बंदरगाहों में इतनी गहराई, आधुनिक क्रेन, तेज़ कंटेनर हैंडलिंग सिस्टम और हाई-कैपेसिटी टर्मिनल्स की कमी रही जबकि सिंगापुर और कोलंबो ने दशकों पहले ही Worldclass सुविधाएँ बना लीं।
- तीसरा कारण- नेटवर्क इफेक्ट: एक बार जब बड़े शिपिंग रूट किसी पोर्ट को अपना हब बना लेते हैं, तो पूरी दुनिया की लॉजिस्टिक्स उसी के आसपास सेट हो जाती है। सिंगापुर और कोलंबो ने यह बढ़त पहले ही हासिल कर ली थी, इसलिए जहाज़ों के लिए वही “डिफॉल्ट स्टॉप” बन गए।
- चौथा कारण- नीतिगत और ऐतिहासिक देरी: भारत ने ट्रांसशिपमेंट हब बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास काफी देर से शुरू किए। जबकि छोटे देश जल्दी समझ गए कि यह क्षेत्र भविष्य में कितना बड़ा आर्थिक अवसर बनेगा। इन्हीं सभी कारणों का परिणाम यह है कि आज भी भारत का लगभग 70% से अधिक कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों के जरिए होता है। इसका मतलब है कि हर कंटेनर पर भारत को अतिरिक्त लागत, समय और रणनीतिक निर्भरता झेलनी पड़ती है।
इसी कमी को पूरा करने के लिए The Great Nicobar Island Development Project लाया गया है—एक ऐसा ट्रांसशिपमेंट हब बनाने के लिए जो लोकेशन, गहराई और क्षमता में ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके। इससे भारत ग्लोबल सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बनेगा, विदेशी शिपमेंट भारत से होकर गुजरेंगे और देश को ट्रांसशिपमेंट के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
पर्यावरण और जनजातियों पर ख़तरा?
Tribes Of Great Nicobar: कांग्रेस का दावा है कि इससे विनाश होगा। सच यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 8–10 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जो कुल जंगल का सिर्फ 1.82% हिस्सा है।
ग्रेट निकोबार में दो प्रमुख जनजातियां हैं—निकोबारी (Nicobarese) और शोम्पेन (Shompen)। शोम्पेन जनजाति जंगलों में रहती है और बाहरी दुनिया से लगभग अलग है। प्रोजेक्ट उनके क्षेत्र से दूर है और सरकार ‘मिनिमल इंटरफेरेंस’ नीति अपनाती है। वहीं निकोबारी जनजाति सामान्य जीवन जीती है—घर, स्कूल, नौकरी सब कुछ।
अब रही बात राहुल गांधी और कांग्रेस के विरोध की—तो उनका मुख्य मुद्दा पेड़ों की कटाई है। लेकिन सवाल ये भी है कि विकास के लिए कहीं न कहीं पेड़ कटते ही हैं—चाहे शहर बनाना हो, खेत हों या डैम।
ऐसा भी नहीं है कि वहां पहले कुछ बना ही नहीं। 2012 में INS बाज एयरस्ट्रिप बनाई गई थी, तब भी पेड़ कटे थे।
- बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस का विरोध राजनीतिक है और चीन के हितों से जुड़ा हुआ है। 2008 के कांग्रेस-चीन MOU को भी इससे जोड़ा जा रहा है। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं, जिन पर अलग-अलग राय हो सकती है।
- अंत में सवाल यही है—भारत क्या बनना चाहता है? क्या हम हमेशा दूसरे देशों के बंदरगाहों पर निर्भर रहेंगे या मलक्का स्ट्रेट के पास खड़े होकर वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका तय करेंगे?
- यह प्रोजेक्ट सिर्फ एक पोर्ट या एयरपोर्ट नहीं है, बल्कि भारत को एक रीजनल प्लेयर से ग्लोबल पावर बनाने की कोशिश है। हां, पर्यावरण, जनजाति और समुद्री जीवन की चुनौतियां हैं—और उनका समाधान जरूरी है।
- अगर हर बड़े प्रोजेक्ट का विरोध केवल पेड़ कटने के आधार पर होगा, तो हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत ऐसे क्षेत्र में है जहां रणनीतिक मजबूती भी उतनी ही जरूरी है।




