History Of Electricity In Rewa:आज विंध्य ऊर्जा की राजधानी कहलाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं यहाँ पहली बार बिजली कब, कहाँ और कैसे पहुँची? आइए जानते हैं विंध्य में जले पहले बल्ब और बिजली की शुरुआत की ऐतिहासिक कहानी।
व्यंकट भवन में जली थी पहली बार लाइट
भारत में सबसे पहले बिजली 1879 में कलकत्ता में आई थी और उसके लगभग 28 वर्ष बाद1907 में विंध्य क्षेत्र में पहली बार बिजली रीवा पहुँची। हालांकि यह बिजली सार्वजनिक नहीं, बल्कि रीवा महाराज के व्यक्तिगत उपयोग के लिए थी। रीवा में सबसे पहले बिजली कोठी कंपाउंड परिसर स्थित व्यंकट भवन में जलाई गई थी। दरअसल महाराज व्यंकट रमण सिंह ने व्यंकट भवन का निर्माण त्रिलोक अर्थात पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग की कल्पना पर करवाया था। भवन की ऊपरी मंजिल के मुख्य कक्ष की अंदरूनी छत पर काँच से बने चाँद और सितारे जड़े गए थे। इन चाँद-सितारों को जगमगाने के लिए बिजली की आवश्यकता थी क्योंकि वे बिजली के करंट से चमकते थे। इसके साथ ही भूतल परिसर की सड़कों के किनारे और क्यारियों के पास लोहे के कलात्मक खंभे लगाए गए थे, जिनमें लगे लट्टू भी रात में जलते थे।
अमहिया नदी में बना था पावर प्लांट
इसी कारण यहाँ बिजली उत्पादन की विशेष व्यवस्था की गई। ब्रिटेन से दो लौह संयंत्र, जिन्हें बॉयलर कहा जाता था, रीवा मँगवाए गए और अमहिया नदी के पानी से बिजली तैयार करने की व्यवस्था बनाई गई। यही अमहिया नदी जो आज एक नाला बन चुकी है। खैर मानस भवन के सामने, सड़क के पार पूर्व दिशा में उस समय पावर हाउस बनाया गया था। इसका निर्माण तराशे गए चौकोर पत्थरों और चूना-सुरखी से किया गया था। इस प्लांट से जो बिजली बनती थी वह इस व्यंकट भवन और कोठी कंपाउंड परिसर में ही उपयोग की जाती थी।
महाराज गुलाब ने सड़कों में लगवाई थी लाइट
महाराज व्यंकट रमण के बाद महाराज गुलाब सिंह के समय में राज्य ने और तेजी से प्रगति की, इसीलिए महाराज ने अब रीवा में विद्युत व्यवस्था को विस्तार देकर सार्वजनिक करने की योजना बनाई। इसके लिए वर्ष 1931 में यहाँ दूसरी बार बड़े संयंत्र लगवाकर विद्युत प्लांट की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य केवल राजभवनों और महलों तक बिजली पहुँचाना नहीं था, बल्कि पूरे शहर को भी सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना था। इसलिए आवश्यकता अनुसार शहर के प्रमुख सड़कों और महत्वपूर्ण स्थानों पर लोहे के खंभे लगवाए गए तथा उनमें प्रकाश की व्यवस्था की गई। धीरे-धीरे जिन लोगों की हैसियत थी, उन्होंने भी अपने घरों में बिजली लगवाना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार रीवा में आधुनिक जीवन शैली की एक नई शुरुआत हुई।
सतना से रोज 2 बैलगाड़ी में आता था कोयला
हालाँकि इस बार बिजली उत्पादन पहले से अलग था, पहली बार जहाँ बिजली उत्पादन अमहिया नदी के पानी से किया जाता था, वहीं अब पावर हाउस के बॉयलर कोयले से चलाए जाते थे। इसके लिए पहले से स्थापित पावर हाउस को ही संशोधित कर कोयला आधारित व्यवस्था में बदल दिया गया। अब चूंकि रीवा नगर के आसपास तो कोयला मिलता नहीं था, वह तो रियासत के दक्षिणी भाग स्थित उमरिया कॉलरी से प्राप्त होता था। इसीलिए उस दौर में वहाँ से रीवा तक कोयला पहुँचाना भी अत्यंत कठिन और मेहनत वाला काम था। इसीलिए उमरिया की खदानों से कोयला रेल से कटनी होते हुए सतना तक लाया जाता था। इसके बाद सतना से प्रतिदिनदो बैलगाड़ियों के माध्यम से कोयला राजधानी रीवा तक आता था। अब उस समय रीवा में न तो बड़े उद्योग-धंधे थे और न ही बिजली से चलने वाले उपकरणों का व्यापक उपयोग होता था। इसलिए बिजली का उत्पादन मुख्यतः प्रकाश व्यवस्था तक ही सीमित रहा।
1932 में आई थी सतना में लाइट
रीवा में लाइट आने के एक साल बाद ही 1932 में, रीवा रियासत के सतना शहर में भी लाइट की व्यवस्था की गई। सतना में बिजली महाराज गुलाब सिंह के प्रयासों से आई थी, इसके लिए जर्मनी की एक कंपनी के साथ पावर प्लांट बनाने का अनुबंध किया गया था, जिसके अनुसार कंपनी 20वर्षों तक प्लांट का संचालन करने के बाद उसे रीवा राज्य को सौंप देगी। योजनाअनुसार सतना में रिहाइश के बीच पोल गाड़े गए, तार खींचे गए और तीन बड़े-बड़े इंजनों से बिजली बनाकर शहर को रोशन किया गया। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने जर्मनी की कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके बाद इस प्लांट का संचालन रीवा रियासत द्वारा ही किया जाने लगा। उसके बाद उमरिया और शहडोल में भी रियासत की तरफ से बिजली का प्रबंध किया गया। प्रारंभिक दौर में रीवा राज्य की बिजली व्यवस्था केवल राजपरिवार के निवास और बड़े अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों तक सीमित थी। लेकिन समय के साथ इसका विस्तार किया गया और बिजली का उपयोग सार्वजनिक स्थलों को प्रकाशित करने में भी होने लगा। धीरे-धीरे सरकारी भवनों और रियासत के विभिन्न दफ्तरों तक भी विद्युत व्यवस्था पहुँचाई गई। इस प्रकार रीवा राज्य में बिजली केवल शाही सुविधा न रहकर प्रशासनिक और सार्वजनिक उपयोग का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी थी।
आजादी के बाद हुआ था व्यापक विद्युतीकरण
आजादी के समय तक विंध्य क्षेत्र में रीवा शहर के अलावा सतना, शहडोल, उमरिया, नागौद और मैहर शहर तक बिजली पहुँच चुकी थी। नागौद और मैहर में विद्युत व्यवस्था होने का मुख्य कारण उनका प्रिंसली स्टेट होना था। हालांकि उस दौर में बिजली आम जनता तक नहीं पहुँची थी। लेकिन आजादी के बाद विंध्यप्रदेश सरकार ने कई ट्रांसमिशन लाइनों का निर्माण करवाया डीजल संयंत्रों को संस्थापित कर बिजली प्लांटों की क्षमता बढ़ाते हुए शहरों का विद्युतीकरण करवाया, जिससे शहरों में रोशनी पहले आई, लेकिन गाँवों तक बिजली के खंभे और तार 1980 के दशक से बिछने शुरू हुए। स्वतंत्रता के बाद केंद्र सरकार ने विद्युत विकास को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया। 1948 के विद्युत आपूर्ति अधिनियम के तहत केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और राज्य विद्युत बोर्ड बनाए गए जिसके बाद पंचवर्षीय योजनाओं बड़े बांधों, ताप विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से बिजली का उत्पादन देश में शुरू हुआ था। अब चूंकि उस समय बिजली उत्पादन डीजल जनरेटरों के माध्यम से ज्यादा होता था, लेकिन 1970 के दशक ऊर्जा संकट के बाद इंदिरा गांधी ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया, उससे कुछ वर्ष पहले ही 1969 में केंद्र सरकर ने गांवों में लाइट पहुँचाने के लिए आरइसी लिमिटेड यानि रूरल इलेक्ट्रीफिकेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थापना की, जिसके बाद ग्रामीण विद्युतीकरण योजनाओं के माध्यम से धीरे-धीरे गाँवों तक बिजली पहुँचने लगी। लेकिन ऐसा होने में सालों लग गए।
पहले पॉवर प्लांट के बायलर अभी भी सुरक्षित
अब बात करते हैं रीवा के पहले पावर प्लांट की। मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है, कि नए पावर हाउस के बनने के बाद इस पुराने प्लांट का क्या हुआ? नया पावर हाउस शुरू होने के बाद यह भवन उपयोग से बाहर हो गया और खाली पड़ा रहा। इसके बाद महाराज गुलाब सिंह ने वर्ष 1940 में इसे शिक्षा विभाग को सौंप दिया। आजादी के बाद विंध्य प्रदेश सरकार ने इस भवन का उपयोग उद्योग विभाग के एम्पोरियम के रूप में किया। बाद में जब रीवा में आयुर्वेदिक कॉलेज की स्थापना हुई, तो शुरुआती दिनों में उसकी कक्षाएँ भी इसी भवन में संचालित होती थीं। कुछ समय तक रीवा संभाग का एक्साइज कार्यालय भी यहीं से चलता रहा। यह ऐतिहासिक पावर हाउस वर्ष 2025 तक अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित खड़ा था, लेकिन बाद में इसे ध्वस्त कर दिया गया। हालांकि, इसमें स्थापित दोनों पुराने बॉयलरों को संरक्षित रखने के लिए उनका रंग-रोगन करा कर उन्हें रीवा के इंजीनियरिंग कॉलेज में स्थापित कर दिया गया, जहाँ वे आज भी ऐतिहासिक धरोहर की याद दिलाते हुए सुरक्षित रखे हुए हैं।




