जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में देश के समकालीन राजनीतिक परिदृश्य, संसदीय गरिमा, कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और विपक्षी नेताओं की सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बेहद बेबाक टिप्पणी की है। राजनीतिक गलियारों में चर्चित ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ जैसे तंज पर प्रतिक्रिया देते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि इस तरह की बातों और घटनाओं ने कम से कम देश की जनता को जगाने का काम किया है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार को अब जागना चाहिए और यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत का संविधान ही सबसे ऊपर है। देश को मजबूत बनाने के लिए राज्यों का मजबूत होना और उनकी समस्याओं को सुनना अनिवार्य है।
‘देश का जागना जरूरी’- फारूक अब्दुल्ला का राजनीतिक तंज
राजनीतिक बहस और बयानों के दौर में जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की चर्चा छिड़ी, तो फारूक अब्दुल्ला ने इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने कहा, “इन लोगों ने देश को जगा दिया है। यह अच्छा है कि इन लोगों ने देश को जगाया है।”
फारूक अब्दुल्ला ने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार को भी इस जमीनी हकीकत का एहसास होना चाहिए।
संविधान, विविधता में एकता और राज्यों की मजबूती का संदेश
फारूक अब्दुल्ला ने भारतीय लोकतंत्र के मूल आधार यानी संविधान की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा:
- संविधान सर्वोपरि है: भारत में संविधान से बढ़कर कोई सत्ता या संस्था नहीं है।
- विविधता में एकता: भारत की ताकत उसकी विविध संस्कृतियों, भाषाओं और क्षेत्रों में निहित है।
- राज्यों को प्राथमिकता: यदि केंद्र देश को मजबूत बनाना चाहता है, तो उसे पहले सभी राज्यों को मजबूत करना होगा और उनकी क्षेत्रीय चिंताओं व परेशानियों को ध्यान से सुनना होगा।
संसद की गिरती गरिमा पर फारूक अब्दुल्ला की चिंता
संसद में लगातार हो रहे हंगामे, काम ना हो पाने और जनता के मुद्दों पर बहस के अभाव को लेकर फारूक अब्दुल्ला ने गहरा दुख व्यक्त किया। खुद एक लंबे समय तक संसद सदस्य रहे अब्दुल्ला ने कहा कि जो स्थिति आज बनी हुई है, उसे पूरा देश और दुनिया देख रही है।
"पार्लियामेंट लोगों की बातें वहां पर लाने के लिए है। अगर आपने पार्लियामेंट को एकदम ही डस्टबिन में डाल दिया है तो वहां से क्या निकलेगा?"
— फारूक अब्दुल्ला“क्या संसद को डस्टबिन में डाल दिया गया है?”
फारूक अब्दुल्ला के अनुसार:
- संसद की स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया गया है।
- जनप्रतिनिधि (MPs) जनता के सवाल उठाते हैं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई ठोस जवाब नहीं मिलता।
- यदि हुकूमत संसद में उठाए गए मुद्दों पर तवज्जो नहीं देगी, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी।
कश्मीरी पंडितों का मुद्दा: वादों और हकीकत का विश्लेषण
जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी और उनके अधिकारों को लेकर फारूक अब्दुल्ला ने वर्तमान सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल उठाया।
मनमोहन सिंह सरकार के दौर की याद और स्थानीय भाईचारे की बात
फारूक अब्दुल्ला ने याद दिलाया कि कश्मीरी पंडितों के लिए वास्तविक कदम पहले उठाए गए थे:
- पुनर्वास योजनाएं: पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान कश्मीरी पंडितों को वापस लाने, बसाने और उन्हें रोजगार देने की ठोस नीतियां बनी थीं।
- स्थानीय मुस्लिम समाज का रुख: उन्होंने स्पष्ट किया कि कश्मीर का आम मुसलमान कभी भी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ नहीं रहा है।
- मौजूदा वादे कहाँ हैं? अब्दुल्ला ने पूछा कि सालों से शासन कर रहे लोगों ने कश्मीरी पंडितों से किए गए वादों को पूरा क्यों नहीं किया?
सुखबीर सिंह बादल पर हमला: सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
महाराष्ट्र के नांदेड़ में शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रमुख और पंजाब के पूर्व डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल पर हुए हमले की फारूक अब्दुल्ला ने कड़े शब्दों में निंदा की।
नांदेड़ घटना और विपक्षी नेताओं की सुरक्षा की जवाबदेही
विपक्षी नेताओं पर हो रहे हमलों को फारूक अब्दुल्ला ने सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर नाकामी बताया:
- सुरक्षा में चूक: उन पर बार-बार हमले का प्रयास यह दर्शाता है कि सुरक्षा एजेंसियां सतर्क नहीं हैं।
- ईश्वर का शुक्र: फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि यह अल्लाह का शुक्र है कि हमलावर अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए।
- केंद्र सरकार को चेतावनी: भारत सरकार को ऐसी घटनाओं को तुरंत संज्ञान में लेना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी राजनीतिक नेता की जान जोखिम में न पड़े।
फारूक अब्दुल्ला के इन बयानों से साफ उजागर होता है कि देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल में संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं की भारी कमी महसूस की जा रही है। चाहे वह संसद में सवालों की अनदेखी हो, कश्मीरी पंडितों के मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल हो या फिर विपक्षी नेताओं की सुरक्षा में चूक—अब्दुल्ला का मानना है कि भारत की मजबूती तभी संभव है जब राज्यों को उनका अधिकार मिले, संविधान के सिद्धातों का पालन हो और लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद की गरिमा को बहाल किया जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संदर्भ में फारूक अब्दुल्ला ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उत्तर: फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि इन बयानों और घटनाओं ने देश की जनता को जगाने का काम किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार भी जागेगी और समझेगी कि भारत का संविधान ही सर्वोपरि है और राज्यों की समस्याओं को सुनना जरूरी है।
Q2: संसद की वर्तमान स्थिति पर फारूक अब्दुल्ला ने क्या सवाल उठाए?
उत्तर: अब्दुल्ला ने संसद के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए कहा कि संसद को कमजोर कर दिया गया है। वहां जनप्रतिनिधियों के सवालों के जवाब नहीं मिलते। उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा कि यदि संसद को डस्टबिन में डाल दिया जाएगा, तो वहां से कुछ सकारात्मक नहीं निकलेगा।
Q3: कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर फारूक अब्दुल्ला का क्या विचार है?
उत्तर: फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और रोजगार का वास्तविक काम डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्तमान सरकार के वादे कहां चले गए, जबकि कश्मीर का आम मुसलमान कश्मीरी पंडितों के खिलाफ कभी नहीं रहा।
Q4: सुखबीर सिंह बादल पर हुए हमले को लेकर फारूक अब्दुल्ला ने क्या कहा?
उत्तर: उन्होंने सुखबीर सिंह बादल पर नांदेड़ में हुए हमले को सुरक्षा की गंभीर चूक बताया। अब्दुल्ला ने अल्लाह का शुक्र जताया कि हमलावर सफल नहीं हुए, लेकिन भारत सरकार से मांग की कि वह इसे गंभीरता से ले ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
Q5: फारूक अब्दुल्ला के अनुसार भारत को मजबूत बनाने का क्या तरीका है?
उत्तर: फारूक अब्दुल्ला के अनुसार, भारत तभी मजबूत हो सकता है जब उसके सभी राज्य मजबूत होंगे। संविधान में निहित ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत को अपनाते हुए केंद्र सरकार को राज्यों की चिंताओं और परेशानियों को प्राथमिकता से सुनना पड़ेगा।
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