दुर्गा प्रतिमाएं तैयार, क्यों मिलाई जाती है वेश्यालय के आंगन की माटी

नवदुर्गा उत्सव। मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय की मिट्टी (जिसे निषिद्धो पाली की मिट्टी भी कहा जाता है) मिलाना एक पुरानी और पवित्र परंपरा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, गंगा की मिट्टी, गोबर और गोमूत्र के साथ-साथ वेश्यालय के आंगन की मिट्टी मिलाए बिना मां दुर्गा की प्रतिमा अधूरी मानी जाती है। इसका मुख्य कारण और मान्यताएं है।

पुण्य की माटी (सबसे पवित्र मिट्टी)

मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति वेश्यालय जाता है, तो वह समाज के डर या लालसा के कारण अपनी सारी पवित्रता, अच्छे कर्म और पुण्य बाहर ही (द्वार पर) छोड़ देता है। इसलिए वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को सबसे अधिक संचित और पवित्र पुण्य माटी माना जाता है।

सामाजिक समरसता और सम्मान

इस परंपरा का उद्देश्य यह संदेश देना है कि समाज में हर व्यक्ति बराबर है और कोई भी छोटा या अछूत नहीं है। इससे समाज द्वारा बहिष्कृत किए गए इस वर्ग को भी मुख्यधारा और पर्व के उल्लास से जोड़ा जाता है।

पौराणिक कथा (भक्त और भगवान शिव का वरदान)

एक प्रचलित कथा के अनुसार, कुछ वेश्याओं ने गंगा तट पर एक कुष्ठरोग से पीड़ित ब्राह्मण (वेश बदले देवता) की सेवा की थी। उनकी इस करुणा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि मां दुर्गा की प्रतिमाएं उनके आंगन की मिट्टी के बिना कभी पूरी नहीं होंगी।

शक्ति का प्रतीक

पुराणों के अनुसार, मां दुर्गा हर जगह और हर परिस्थिति में विद्यमान हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि देवी की शक्ति इतनी व्यापक है कि वह अशुद्धि और पाप पर भी विजय पा सकती है।

मां दुर्गा ने दिया था वरदान

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक वेश्या मां दुर्गा की बड़ी भक्त थी. लेकिन समाज में उसके साथ होने वाले तिरस्कार और अपमान ने उसे दुखी और हताश बना दिया था मां दुर्गा ने उसकी सच्ची श्रद्धा और भक्ति को देखकर एक वरदान दिया. मां ने कहा कि जब तक मेरी प्रतिमा में वेश्यालय की मिट्टी शामिल नहीं की जाएगी, तब तक मैं उस मूर्ति में वास नहीं करूंगी।

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