Maharaja Vyankat Raman Singh History: आज से सौ साल से भी पहले, जब दुनिया तेजी से बदल रही थी और भारत भी आधुनिकता की नई राह पर निकल रहा था, तब रीवा राज्य का एक युवा शासक भी अपने राज्य को सँवारने का सपना देख रहा था। वह रीवा को आधुनिक शहर बनाना चाहता था, राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाना चाहता था। लेकिन एक ओर आधुनिक विकास की चुनौतियाँ थीं, तो दूसरी ओर राज्य सूखा, बाढ़, अकाल और महामारियों जैसी आपदाओं से जूझ रहा था। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच उस युवा शासक ने बड़े साहस, दूरदर्शिता और जनसेवा का परिचय देते हुए रीवा राज्य को संभाला। ये कहानी है रीवा रियासत के लोकप्रिय शासक महाराज व्यंकट रमण सिंह की, जिन्होंने सेना का नेतृत्व किया, रीवा को आधुनिक बनाने की नींव रखी, और प्रजा के सुख-दुख को अपना कर्तव्य समझा।
कृपालपुर में हुआ महाराज व्यंकट रमण सिंह
महाराज व्यंकट रमण सिंह का जन्म 23 जुलाई 1876 को रीवा राज्य के तत्कालीन महाराज रघुराज सिंह और उनकी छठवीं पत्नी सिलपरा वाली बड़ी चंदेलिन रानी शिवदान कुंवर के यहाँ ‘कछिया टोला’ कृपालपुर में हुआ था। दरसल महाराज रघुराज सिंह की एक के बाद एक कई संतानें काल कलवित हो गईं थीं, जिसके कारण महाराज ने, गर्भ ठहरने के उपरांत महारानी को रीवा किले से हटाकर, कृपालपुर की कच्ची गढ़ी में भेज दिया। महारानी वहीं रही और उनका प्रसव भी यहीं हुआ। कृपालपुर से लौटकर महारानी पहले सिलपरा अपने मायके गईं, जहाँ बालक की पसनी सम्पन्न हुई और वहाँ से रीवा आईं।
महाराज के नाम में क्यों जुड़ा था रामानुज प्रसाद?
उनका नामकरण किया गया व्यंकट रमण रामानुज प्रसाद सिंह, रीवा और बघेलखंड में उन्हें वेंकट रमण सिंह कहा जाता है। उनके नाम के साथ रामानुज प्रसाद जोड़ने की भी एक दिलचस्प कहानी है। रीवा के वरिष्ठ विद्वान रविरंजन सिंह की किताब “तब और अब रीवा” के अनुसार- “जब महाराज रघुराज सिंह की एक के बाद एक सारी संतानें काल कलवित हो गईं, तो उन्होंने सरकार से मंजूरी लेकर देउरा के ठाकुर साहब के लड़के रामानुज प्रसाद सिंह को विधिवत गोद ले लिया था। लेकिन बाद में जब युवराज का जन्म हुआ तो संभवतः वैधानिक कारणों से उनके नाम के साथ रामानुज प्रसाद भी जोड़ दिया गया।”
चार साल की उम्र में बने रीवा के राजा
जब वेंकट रमण महज तीन साढ़े तीन साल के थे, तभी उन पर से पिता का साया उठ गया। लंबे समय से बीमार चल रहे महाराज रघुराज सिंह का 6 फरवरी 1880 को देहांत हो गया। जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने जनरल हेनरी डेली को रीवा भेजा और 8 अक्टूबर 1880 को ही चार वर्षीय व्यंकट रमण सिंह को रीवा का राजा घोषित कर दिया। पहले ही बीमारी के दौरान महाराजा रघुराज सिंह ने राज्य का प्रबंध ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। लिहाजा, उनका नियंत्रण पहले से ही बना हुआ था। अब युवराज व्यंकट रमण सिंह अभी निरा बालक थे, राज्य क्या ही संभालते। इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने रीवा राज्य और राजा को अपने संरक्षण में ले लिया। राज्य का प्रबंध मेजर डी. डब्ल्यू. के. बार के हाथों में रहा, जो रघुराज सिंह के समय से ही सुपरिंटेंडेंट थे, जबकि सर्जन डॉ. गोल्डस्मिथ को बालक महाराज का ट्यूटर और संरक्षक नियुक्त किया गया।
अंग्रेजों और रानियों में खींचतान?
महाराज रघुराज सिंह के निधन के समय उनकी छह पत्नियाँ जीवित थीं। ये सभी रानियाँ किले के राघो महल में में मिल-जुल कर बड़े प्रेमभाव से रहती थीं और व्यंकट रमण सिंह से विशेष स्नेह रखती थीं। और उन्हें हमेशा अपने पास रनिवास में रखती थीं। लेकिन राज्य के संरक्षक होने के कारण महाराज के पालन-पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेजी सरकार की थी। इसीलिए अंग्रेज अधिकारी उन्हें महल से बाहर निकालना चाहते थे, लेकिन महारानियाँ पुत्र की परिवरिश और सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती थीं, इसीलिए वह उन्हें महल के अंदर रखना चाहती थीं, इसी कारण से महारानियों और अंग्रेज अफसरों के मध्य बहुत खींचतान चलती रहती थी। महारानियों ने अपनी तरफ से कर्नल लाल कल्याण सिंह को बालक महाराज का अभिवावक और संरक्षक नियुक्त किया था।
सतना में निवास और नई कोठी का निर्माण
एक बार सुपरिनटेन्डेंट बार साहब चार महारानियों की अनुमति प्राप्त करके कुछ दिनों के लिए महाराज को घुमाने-फिराने अपने साथ कैंप में ले गए। इस दौरान डॉ गोल्डस्मिथ और मेजर बार ने अनुभव किया, महाराज महल से बाहर स्वतंत्र होकर खुली हवा में खूब खेलते हैं और चित्त भी पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा प्रसन्न रहता है। इसीलिए मेजर बार ने ध्यान दिया राजमहल भले भव्य था, लेकिन पुराने समय का निर्मित था, जहाँ रोशनदान तक नहीं थे। यह बालक महाराज के निवास के लिए उचित नहीं है, यहाँ बिना हवादान के सीलन भरी कोठरियाँ थीं और उनके खेलने के लिए कोई मैदान तक नहीं है, जिसके बाद महाराज को रीवा ना लाकर सतना में डॉ गोल्डस्मिथ के संरक्षण में रखा गया। लेकिन यह बात जानकर चंदेलिन महारानी भड़क गईं और उन्होंने अपना विरोध प्रकट किया। जिसके बाद रीवा में ही महाराज के निवास और शिक्षा-दीक्षा के लिए 1882 में एक नई कोठी का निर्माण करवाया गया। इसमें महाराज के लिए लान टेनिस कोर्ट, घुड़सवारी सीखने का मैदान, सुंदर फूलों वाला बगीचा और फव्वारा भी बनवाया गया। और सतना से महाराज को रीवा लाया गया, आगरा कॉलेज से अंग्रेजी में एम. ए. पंडित पूरनमल चतुर्वेदी को रीवा बुलाकर उनका ट्यूटर नियुक्त किया गया।
अमरा कोठी और महाराज की शिक्षा
लेकिन महाराज की माँ चंदेलिन महारानी, अपनी संस्कृति और रीवा राज्य की परंपराओं को लेकर बड़ी सख्त थीं, वह नहीं चाहती थीं उस समय परंपरा के अनुसार बालक महाराज विवाह से पूर्व अंग्रेजों के साथ बैठकर भोजन करें। इसीलिए उनकी जिद पर कोठी के पीछे ही 1883 में उनके तथा अन्य महारानियों के लिए एक अलग कोठी बनवाई गई, जिसे अमरा कोठी कहा जाता था। लेकिन महाराज के साथ रहने के लिए केवल उनकी माँ को ही अनुमति मिली, बाकि रानियाँ बालक महाराज से तय समय के लिए राघो महल या अन्यत्र कहीं मिल सकती थीं। महाराज ज्यादातर रीवा में ही रहते थे, लेकिन गर्मी के दिनों में कभी-कभी वह गोविंदगढ़ और सतना भी जाया करते थे, सतना में भी उनके निवास के लिए रेलवे स्टेशन के पास एक कोठी का निर्माण करवाया गया था। महाराज का लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा इत्यादि आधुनिक ढंग से दी जाती थी, लेकिन साथ ही महाराज के धर्म और परंपराओं का ध्यान भी रखा जाता था। महारानी के दबाव के बाद उनको संस्कृत की भी शिक्षा दी जाने लगी। महाराज बाल्यकाल से ही बड़े मेधावी और बहादुर थे।
19 साल की उम्र में संभाली रीवा राज्य की कमान
वयस्क हो जाने पर 15 नवंबर 1895 को सरकार ने उन्हें राज्याधिकार दे दिया, जिसके बाद उन्होंने राज्य की बागडोर स्वयं संभाल ली और 19 वर्ष की उमर से ही राज-काज देखने लगे। महाराज ने दरबार में बड़े स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में घोषणा की, रीवा में राज्य विरोधियों के लिए कोई स्थान नहीं है, अच्छा होगा वह स्वयं राज्य छोड़कर बाहर चले जाएं। सुपरडेन्सी काल में रीवा आए कई बड़े अफसर और हाकिम, जो बेईमान और दागदार थे, उन्हें निकाल बाहर किया और नए सिरे से ईमानदार और कर्मठ व्यक्तियों की नियुक्ति करने लगे। कम उम्र के होने के बाद भी महाराज के अंदर व्यक्तियों को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने योग्य और कर्मठ कर्मचारियों को चुन-चुन कर स्वयं भर्ती किया। लाल बलदेव सिंह को रीवा राज्य की सेना का कमांडर नियुक्त किया और पंडित जानकी प्रसाद को अपना सचिव बनाया।
अकाल में प्रजा के लिए खोल दिया राजकोष
महाराज व्यंकट रमण सिंह के शासक बनते ही वर्ष 1896 में रीवा राज्य को भीषण अकाल और सूखे का सामना करना पड़ा। महाराज ने प्रभावितों को राहत देने के उद्देश्यों से पुअर हाउसेस का निर्माण करवाया, जहाँ गरीब लोगों को भोजन और रहने की व्यवस्था की जाती थी। उन्होंने भारी लगान की रकमों को माफ कर दिया या फिर स्थगित कर दिया। इस संकट से निपटने के लिए महाराज ने दस हजार लोगों को प्रतिदिन ग्यारह महीनों तक रोजगार देने की घोषणा की। इसके तहत राज्यभर में राहत कार्य शुरू किए गए, जिनमें 248 बांध, 36 तालाब और 17 सड़कों का निर्माण कराया गया। रीवा स्टेट गजेटियर के अनुसार, इस योजना पर लगभग सात लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि राज्य की आमदनी केवल 13 लाख थी, यानि पचास प्रतिशत से अधिक की आय राहत कार्यों हेतु खर्च की गई थी। राज्य की आबादी तब करीब पंद्रह लाख थी, जिसमें से करीब तीन लाख लोगों को रोजगार मिला था। सीमित संसाधनों और महज 21 वर्ष का तरुण होने के बाद भी, भीषण अकाल के दौर में राज्य की सीमित आय का इतना बड़ा हिस्सा राहत कार्यों पर खर्च करना महाराज की प्रजा के प्रति संवेदनशीलता और संकट के समय बेहतर राज्य व्यवस्था बनाए रखने के प्रयासों को दर्शाता है। इस दुर्भिक्ष से प्रजा को उबरने के उद्देश्य से किए गए उत्तम प्रबंधों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें जी. सी. एस. आई. की सर्वोच्च उपाधि और स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। इसके बाद भी आगे उनके शासनकाल में राज्य में कई अकाल पड़े जिसे महाराज ने बहुत संवेदनशीलता और धैर्यपूर्वक संभाला।
रीवा राज्य के शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार
महाराज व्यंकट रमण सिंह ने रीवा राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके शासनकाल में शिक्षा के विस्तार पर विशेष जोर दिया गया। इससे पहले राज्य में आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था सीमित थी, हालांकि रीजेंसी के समय अंग्रेजों ने हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और फारसी की नई पद्धति पर आधारित स्कूल शुरू की थीं। महाराज ने इसे आगे बढ़ाते हुए राज्यभर में कई पाठशालाएं खुलवाईं। कोठी राज्य दीवान जीतन सिंह की किताब रीवा राज्य दर्पण के अनुसार- रीवा और सतना में दो कन्या विद्यालय स्थापित किए गए, वहीं दोनों नगरों में अंग्रेजी शिक्षा के लिए हाईस्कूल भी संचालित होने लगे। शिक्षा के साथ-साथ महाराज ने स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर भी ध्यान दिया। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में अस्पताल और डिस्पेंसरी स्थापित की गईं, जहां रोगियों को अंग्रेजी दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाती थीं। रीवा, सतना सहित अन्य स्थानों के अस्पतालों में मरीजों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था भी की गई थी।
महाराज व्यंकट रमण सिंह द्वारा प्रशासनिक और आर्थिक सुधार
नगर और ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों को देखते हुए महाराज ने प्रशासनिक ढांचे में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए। रीवा नगर के बेहतर प्रबंधन के लिए नगर पालिका की स्थापना की गई। उस समय राज्य में प्रशासनिक इकाइयों को परगना कहा जाता था और इनकी संख्या सात थी। सीधी और शहडोल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों की प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए महाराज ने पहले इनकी संख्या बढ़ाकर नौ और फिर दस कर दी। प्रशासन को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के लिए राज्य को उत्तरी और दक्षिणी दो हिस्सों में बांटकर हल्के अर्थात जिलों का गठन किया गया, जहां मजिस्ट्रेट नियुक्त किए गए। न्याय और शासन संबंधी कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए दोनों के लिए अलग-अलग कमिश्नर भी निर्धारित किए गए। इसके साथ ही जंगल और परमट विभागों में सुधार किए गए। विभिन्न विभागों के संचालन के लिए अंग्रेजी प्रशासनिक पद्धति के अनुरूप सचिव नियुक्त किए गए। महाराज स्वयं प्रत्येक विभाग के कामकाज की गहन जांच-पड़ताल करते थे। इन सुधारों का असर राज्य की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा। व्यवस्थित शासन के कारण रीवा राज्य की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, रीवा राज्य की आय पूर्ववर्ती महाराजाओं के शासनकाल की तुलना में कई गुना बढ़ गई और अंग्रेजी शासनकाल के दौर की आय से लगभग ढाई गुना हो गई। इस आर्थिक वृद्धि का उल्लेख कैप्टन सीई लुआर्ड द्वारा संकलित रीवा स्टेट गजेटियर से भी प्राप्त होता है।
आधुनिक रीवा के निर्माता
महाराज व्यंकट रमण सिंह को आधुनिक रीवा का निर्माता माना जाता है। क्योंकि उनसे पहले रीवा नगर का स्वरूप एक प्राचीन शैली में बसे गांव जैसा था। राजमहल को छोड़ दें, तो अधिकांश घर कच्चे और अव्यवस्थित थे। पक्की सड़कों और व्यवस्थित भवनों का अभाव था। यहां तक कि रीवा राज्य के दीवान का कार्यालय भी घुड़शाला में संचालित होता था। हालांकि, अंग्रेजों द्वारा कोठी और कचहरी जैसे कुछ भवन पहले ही बनवाए जा चुके थे। लेकिन महाराज व्यंकट रमण सिंह ने इन व्यवस्थाओं का विस्तार करते हुए आधुनिक रीवा नगर की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने निवास के लिए आधुनिक सुविधाओं से युक्त बीस लाख रुपए की लागत से गोलाघर का निर्माण करवाया, जिसे आज व्यंकट भवन के नाम से जाना जाता है। इस भवन के निर्माण के साथ ही रीवा राज्य में पहली बार विद्युत व्यवस्था की शुरुआत हुई। इसके लिए अमहिया नदी के पास एक पावर प्लांट स्थापित कराया गया, जिससे व्यंकट भवन को बिजली उपलब्ध कराई जाती थी। इस प्रकार, महाराज के प्रयासों से रीवा में आधुनिक शहरी सुविधाओं और तकनीक के विकास की एक नई शुरुआत हुई। उन्होंने कोठी कंपाउंड परिसर का विस्तार किया और घंटाघर, पीलीकोठी समेत कई भवनों का निर्माण करवाया। परिसर के अंदर पक्की सड़कों का निर्माण करवाया गया।
रीवा राज्य में करवाए विकास कार्य
रीवा किला का विस्तार भी महाराज ने ही करवाया। तब के बंबई के सबसे महंगे और पॉश एरिया लक्ष्मी नगर में कोठी खरीदी गई जिसे रीवा हाउस कहा जाता है। प्रयाग की कोठी का भी विस्तार किया गया। महाराज द्वारा रीवा राज्य में कई सड़कों का निर्माण करवाया गया, पुल बनवाए गए, विश्वनाथ सागर अर्थात गोविंदगढ़ तालाब का भी विस्तार करवाया गया। राज्य के दक्षिणी क्षेत्र के व्यक्तियों के आवागमन की सुविधा के लिए छुहिया घाटी को सपाट करवा के सड़क का निर्माण भी महाराज व्यंकट रमण सिंह द्वारा ही करवाया गया। सतना से रीवा तक रेलवे लाने का का प्रयास भी महाराज द्वारा किए गए, कुछ किलोमीटर तक मिट्टी भी डाली गई, लेकिन विश्वयुद्ध के कारण काम रुक गया। नई-नई सड़कों के बनने के बाद राज्य में व्यापारिक गतिविधियां भी बढ़ी, जिसके बाद कई व्यापारियों ने सतना में आधुनिक मिलों की भी स्थापना की।
सेना का आधुनिकीकरण और प्रथम विश्वयुद्ध
महाराज शरीर से हष्ट-पुष्ट और निरोगी काया के व्यक्ति थे। परिश्रम के कार्य उनको पसंद थे, घोड़े पर बैठकर वह राज्य भ्रमण करते थे। और साधारण सिपाहियों की तरह बिना थके कोसों पैदल चलते थे। इसीलिए रीवा के इतिहासकार महाराज वेंकट रमण सिंह को सिपाही राजा कहते थे, क्योंकि सेना के गठन और उसके आधुनिकीकरण में उनकी विशेष रुचि थी। यही कारण था कि लाल बलदेव सिंह के निधन के बाद, 27 जुलाई 1904 को उन्होंने स्वयं रीवा स्टेट आर्मी के कमांडर-इन-चीफ अर्थात सेनापति का पद संभाल लिया। उनके नेतृत्व में रीवा के अलावा सतना, बघऊँ और बांधवगढ़ में भी सैनिक छावनियाँ स्थापित की गईं। रिसाला, पलटन और तोपखाने को आधुनिक बनाया गया तथा सैनिकों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की गई। इन प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि उस समय मध्य भारत में सबसे विशाल सेना रीवा राज्य के पास थी। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने पर महाराज ने स्वयं अपनी सेना के साथ युद्ध में भाग लेने की इच्छा जताई, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बावजूद महाराज ने युद्ध में सहयोग देने के उद्देश्य से दो विमान खरीदे, जिन्हें ‘रीवां’ और ‘सोलंकी’ नाम दिया गया और ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया गया। इनमें से एक विमान युद्ध के दौरान नष्ट हो गया, जबकि दूसरा वापस रीवा लौट आया। यह विमान लंबे समय तक मार्तंड लांसर्स के बैरक में पड़ा रहा। प्रथम विश्वयुद्ध में सहायता के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लेफ्टीनेंट कर्नल की उपाधि से सम्मानित किया।
बाघों का शिकार और प्रजा की रक्षा
महाराज को सेना के बाद शिकार से भी बड़ा प्रेम था। वह अद्वितीय शिकारी थे और लगभग सवा सौ से अधिक बाघों का शिकार किया था। उन्होंने आखिरी बार बाघ का शिकार 19जून 1918 को आज के अनूपपुर जिले के छुईहाई के जंगल में किया था। दरसल महाराज को सोहागपुर के इलाकेदार ने सूचना दी, भोलगढ़ के समीप के जंगलों में एक बाघ है, जो पहले मवेशियों को अपना शिकार बनाता था, लेकिन वह आदमखोर हो चुका है और कई लोगों को मार चुका है, आस-पास के क्षेत्रों में उसका बड़ा आतंक है जिसके कारण लोग गांवों से पलायन करने लगे हैं, उन्होंने मेरे माध्यम से प्राणरक्षा की गुहार लगाई है। बाघ के आतंक की सुनकर महाराज व्यंकट रमण सिंह ने बंदूक उठा ली और छुईहाई के जंगलों में उस आदमखोर बाघ का शिकार कर प्रजा को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई, महाराज ने जिस जगह बाघ को मारा था, वहाँ आज भी एक शिलालेख लगा हुआ है।
महाराज व्यंकट रमण सिंह ने हिंदी को बनाया राजभाषा
महाराज केवल प्रजावत्सल और यशस्वी नरेश ही नहीं थे, बल्कि रीवा राज्य की कला और साहित्य के संरक्षण के लिए भी प्रयासरत थे। 1918 में उन्होंने भजनावली नामक एक ग्रंथ की भी रचना की थी। राजा बनने के बाद उन्होंने पहला आदेश हिंदी को राज्य की भाषा बनाने के लिए जारी किया। दरसल हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा काशी के बाबू श्यामसुंदर दास और पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी रीवा आए थे, उनसे प्रभावित होकर महाराज ने हिंदी को राज्य की भाषा बनाने की घोषणा की। अब उस समय राज्य के काम उर्दू लिपि में होते थे, सामान्य लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल था, इसीलिए महाराज ने सुगमता के लिए राज-काज का काम देवनागरी अर्थात हिंदी लिपि में प्रारंभ करवा दिया। अब चूंकि जैसे हमने पहले भी बताया उस समय राज-काज की भाषा फारसी थी। पंडित हेतराम दीवान के समय में दूर-दूर से फारसी-उर्दू के विद्वान रीवा बुलाए गए थे। महाराज ने आदेश पारित किया, जो कर्मचारी हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं जानते, वह छः माह के अंदर सीख लें अन्यथा उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा, कहते हैं यह सुनकर कर्मचारियों ने सात दिन के अंदर हिंदी लिखना पढ़ना सीख लिया था। महाराजा ने पूरे रीवा राज्य में हिंदी का बहुत प्रचार-प्रसार किया। महाराज द्वारा हिंदी के लिए एक स्लोगन भी दिया गया, जो रीवा के इतिहासकार असद खान के माध्यम से हमें प्राप्त हुआ।
“हिंदी रीवा राज्य की, भाषा सर्व प्रधान। हिंदी को अपनाइए, जो है सुगम महान।।”
रीवा राज्य में दिया कला और संस्कृति के संरक्षक
साहित्य की परंपरा को संरक्षित करने के उद्देश्य से ही महाराज ने “रीवा प्रेस” की स्थापना की और बघेलखंड के पूर्ववर्ती अनमोल ग्रंथों का प्रकाशन करवाया। मौलवी रहमान अली द्वारा लिखा गया “बघेलखंड का इतिहास” और पंडित दुर्गाप्रसाद महापात्र द्वारा रचित “अजीत फतेह रायसा” जैसे अनुपम ग्रंथों का प्रकाशन भी इसी समय हुआ। रीवा राज्य में कला के विकास के लिये महाराज ने “बघेलखण्ड नाटक कम्पनी” की स्थापना की। साथ ही 1917 में रीवा में एक बहुत बड़े सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना भी महाराज द्वारा की गई। राजापुर में तुलसी स्मारक का उद्घाटन भी किया गया। इन सबके साथ ही महाराज देश में चल रहे राष्ट्रीय जनजागरण से भी अनभिज्ञ नहीं थे, उस समय दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा प्रवासी भारतीयों के अधिकारों के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था, जिसके समर्थन जुटाने हेतु बाल गंगाधर तिलक देश भ्रमण कर रहे थे, इन्हीं यात्राओं के समय तिलक 1917 में सतना स्टेशन में उतरे और जोरदार ओजस्वी भाषण दिया, जिससे प्रभावित होकर महाराज ने गांधी जी के आंदोलन के लिए बड़ी रकम चंदे के रूप में दी थी।
धार्मिक प्रवृत्ति के महाराज व्यंकट रमण सिंह
साथ ही महाराज बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के भी थे, उन्होंने अमरकंटक को पवित्र स्थान घोषित करते हुए, वहाँ मांस-मदिरा के सेवन पर प्रतिबंध लगाने की राजाज्ञा भी जारी कर दी। अपनी सेनाओं के लिए घोड़े-हाथी इत्यादि महाराज स्वयं खरीदते थे, इसी हेतु वह एक बार कुरुक्षेत्र पशु मेले गए थे। वहाँ उन्होंने कसाइयों द्वारा काटने हेतु गाय खरीद कर ले जाते देख वह द्रवित हो गए और उन्होंने उन 138 गायों को मूल्य देकर खरीद लिया और रीवा हँकवा लाए, और उन गायों के रखने के प्रबंध के लिए नदी किनारे एक गोघर बनवाया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भी गोवध बंद करवाने की अपील की।
महाराज के हुए थे तीन विवाह
महाराज व्यंकट रमण सिंह के तीन विवाह हुए थे, पहला डुमरांव वाली उज्जैनिन महारानी शिवराज कुमारी से, जिनसे युवराज गुलाब सिंह और दादू साहिबा सुदर्शन कुमारी का जन्म हुआ था। दूसरा रतलाम के महाराज के कन्या राठौड़िन महारानी गुलाब कुमारी से, तथा तीसरा विवाह रीवा राज्य के सरदार साहबबक्स सिंह की कन्या परिहारिन महारानी कीर्तिकुमारी से, जिनसे महाराज के एक पुत्र रॉबिन साहब का जन्म हुआ।
महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में माता की भूमिका
रीवा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार अख्तर हुसैन निज़ामी के अनुसार- “रीवा और बघेलखंड के इतिहास में राजा रामचंद्र के बाद, महाराज व्यंकट रमण सिंह ही वह पहले शासक थे, जिनका शासनकाल और जीवन चरित्र दोनों सोने से लिखे जाने चाहिए। उनके व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माँ बड़ी चंदेलिन महारानी की बड़ी भूमिका थी, वह बेहद ही निडर स्वभाव की थीं और किसी से भी नहीं डरती थीं, यहाँ तक कि वह बड़े ब्रिटिश अधिकारियों से भी बड़ी निर्भीकता से अपनी बात रखती थीं। अपने सिद्धांतों में अडिग रहना और निडरता का गुण वेंकट रमण सिंह जी को, अपनी माँ से ही प्राप्त हुए थे।
अंग्रेजों के सामने भी नहीं झुके महाराज व्यंकट रमण सिंह
इसका एक उदाहरण वर्ष 1902 में उमरिया में शिकार के दौरान देखने को मिला। कट्टर साम्राज्यवादी लॉर्ड कर्जन ने जब महाराज से पूछा- वेल राजा ! तुम हमको ट्रिब्यूट क्यो नहीं देते हो? तो तुरन्त 26 वर्षीय महाराज बोल पड़े- “सुनी हो लाठ साहेब ! हम मुगुलन का कर नहीं दीन्हेन तो तुमहीं का देबै। राज तुम्हार आय ता आपन लैल्या। पय कर हम से न माँगा।” इसी तरह का एक और किस्सा भारत के वायसराय गवर्नर जनरल लॉर्ड हॉर्डिंग से भी जुड़ा है, जब वह शिकार के लिए उमारिया आए थे। तब महाराज ने उनसे निःसंकोच कहा- “देखिए हम वायसराय को हिज मेजेस्टी अर्थात ब्रिटिश साम्राज्य के सम्राट, का हिंदुस्तान में प्रतिनिधि मानते हैं। पर किसी और पॉलिटिकल अफसर को, जो अकड़ और ऐंठ दिखलाए, उसे हम कुछ नही मानते और वह दर्जा नही दे सकते हैं।” यह बात सुनकर वायसराय मुस्कुराए और हँसते हुए जवाब दिया- वेल महाराज! मैं इस बात को समझता हूँ। महाराज की इस निडरता से वायसराय इतना प्रसन्न हुआ कि, चलते वक्त उसने महाराज से जी भर के हाथ मिलाया। ये प्रसंग बताते हैं कि महाराज अपनी रियासत की प्रतिष्ठा और अपने सिद्धांतों को लेकर अडिग थे।
हैजा पीड़ित की सहायता
महाराज के स्वाभाव में सादगी कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह प्रजा पालक ही नहीं, बल्कि प्रजासेवक नरेश भी थे। उनके प्रजा के सेवा भाव का एक किस्सा, लाल भानु सिंह बघेल की किताब “वीर वेंकट रमण” में मिलता है। जिसके अनुसार एक बार महाराज अपने घोड़े में बैठकर कहीं जा रहे थे, उस समय देश में हैजे नाम की महामारी का प्रकोप फैला हुआ था, रास्ते में उनको एक हैजे से पीड़ित व्यक्ति मिला, जो अपने घर जा रहा था, लेकिन खराब तबीयत और कमजोरी के कारण वह चल नहीं पा रहा था, यह देखकर महाराज ने उसे अपने घोड़े पर बिठा दिया और खुद घोड़े की लगाम पकड़कर पैदल चलने लगे और उस पीड़ित व्यक्ति को उसके घर तक पहुंचाया।
राजा होकर भी सिपाहियों के बीच आम सिपाही थे महाराज
जैसे हमने पहले ही बताया था, इतिहासकारों ने महाराज वेंकट रमण सिंह को सिपाही राजा कहा है, क्योंकि वह अपने सैनिकों के साथ मिलकर सामान्य सिपाहियों जैसे हो जाते थे, इतिहासकार निज़ामी साहब उनके इस गुण के हिसाब से इतिहास में उनकी तुलना बादशाह शेरशाह सूरी से करते हैं। क्योंकि वह अपने सैनिकों के साथ ऐसे घुलते-मिलते थे, कि राजा और रंक का भेद ही मिट जाता था। निज़ामी साहब इससे संबंधित एक किस्सा अपनी किताब में बताते हैं- एक बार कैंप में किसी सिपाही को छींक आ गई, अब चूंकि राजा की एक मर्यादा होती है, इसीलिए उस सिपाही ने उस मर्यादा का पालन करते हुए धीरे से छींका, लेकिन महाराज व्यंकट रमण सिंह ने आवाज सुन ली, उन्होंने बघेली में कहा- “इया को आय फिसिकिन्ना अस छोड़त हय, ठहाका काहे नहीं छींकय।” अर्थात कौन है जो धीरे से छींक रहा है, तेज से छींकों। वह फागुन के महीने में अपने सिपाहियों के साथ मिलकर होली खेलते थे और फगुआ भी गाते थे- “काजर कय डिबिया खोला जेठानी, फागुन के महीना आबा।” ईद के दिन ईदगाह पहुँच जाते थे और बैठकर खुतबा सुनते थे।
जब भारत में फैला स्पेनिश फ्लू
रीवा राज्य में सबकुछ ठीक चल रहा था। राज्य प्रगति के पथ पर अग्रसर था और प्रजा सुखी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। प्रथम विश्वयुद्ध के अंतिम दौर में सैनिकों की आवाजाही, युद्ध शिविरों में भारी भीड़ और गंदगी के बीच दुनिया भर में स्पैनिश फ्लू नाम की घातक महामारी फैल गई। दूसरी महामारियों के विपरीत, यह बीमारी 18 से 45 वर्ष की उम्र के युवाओं को अधिक प्रभावित करती थी। इसमें तेज बुखार आता था और फिर फेफड़ों में पानी भरने लगता था। प्रथम विश्वयुद्ध से लौटे सैनिकों के माध्यम से यह महामारी बंबई पहुँची और देखते ही देखते पूरे भारत में फैल गई। महज एक साल के भीतर इसकी एक के बाद एक तीन लहरें उठीं, जिनसे भारत में लगभग एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की मौत हो गई।
स्पेनिश फ्लू ने छीन लिया रीवा का लोकप्रिय शासक
सितंबर 1918 में आई दूसरी लहर सबसे घातक साबित हुई और उसने देशभर में भारी तबाही मचाई। सैनिकों के माध्यम से यह महामारी रीवा भी पहुँची और शहर से लेकर गाँवों तक फैल गई। महाराज व्यंकट रमण सिंह स्वयं स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और राहत कार्यों की कमान संभाले हुए थे, लेकिन इसी बीच वे भी इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आ गए। दुर्भाग्यवश, 30 अक्टूबर 1918 को महज 42 वर्ष की उम्र में महाराज का निधन हो गया। वे अपने पीछे एक पत्नी और तीन बच्चों को छोड़ गए। उनके निधन के बाद उनके बड़े पुत्र 15 वर्षीय गुलाब सिंह रीवा राज्य के शासक बने।
मृत्यु सेपहले महाराज ने लिया था रतलाम के राजा से यह वचन
रीवा के प्रधानमंत्री रायबहादुर बृजमोहन लाल जुत्शी द्वारा लिखे गए “रीवा रीजेंसी एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट 1918-22” के अनुसार- अपने अंतिम समय में महाराज ने अपने मित्र और साले, रतलाम के महाराज सज्जन सिंह राठौड़ को रीवा बुलवाया। मृत्यु से एक दिन पहले उन्होंने सज्जन सिंह का हाथ, अपने हाथ में रखते हुए उनसे यह वचन लिया, जब तक गुलाब सिंह बालिग नहीं हो जाते, वे राज्य का प्रबंध संभालेंगे और उनके पुत्र व परिवार का ध्यान रखेंगे। शायद तब महाराज को अपने बचपन के वे दिन याद आ गए थे, जब पिता रघुराज सिंह के निधन के बाद उन्हें और उनकी माताओं को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा था। एक पिता के तौर पर संभवतः वे नहीं चाहते थे कि उनके पुत्र को भी उन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़े।
इतिहास में भुला दिए गए महाराज व्यंकट रमण सिंह
तो यह कहानी थी रीवा रियासत के उस निडर, कर्मठ और प्रजावत्सल शासक महाराज व्यंकट रमण सिंह की, जिनका जीवन जितना गौरवशाली था, उनके जीवन का अंतिम अध्याय उतना ही भावुक। आधुनिक रीवा के निर्माता इस महान शासक को शायद इतिहास में उतना याद नहीं किया जाता, जितना उनके पिता रघुराज सिंह और पुत्र गुलाब सिंह को। लेकिन उनका शासन रीवा के इतिहास में शांति, आधुनिकता और प्रगति का दौर था।
