Amit Shah Rewind Ayodhya Firing : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की रस्साकशी के बीच 36 साल पुराना इतिहास भी एक बार फिर लौट आया है। ऐसा इतिहास, जिसकी याद आते ही राम मंदिर आंदोलन, अयोध्या की गलियाँ, कारसेवकों का संघर्ष और गोलियों की गूँज कानों में सुनाई देने लगती है। अयोध्या के इसी इतिहास को 30 अक्टूबर को अमित शाह ने लखनऊ के मंच पर उकेर दिया।
अमित शाह ने याद दिलाया अयोध्या गोलिकांड
हम बात कर रहे हैं 30 अक्टूबर, 1990 की, जब अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोलियाँ चली थीं। इस गोलीकांड की याद दिलाकर अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समाजवादी पार्टी को सीधे निशाने पर ले लिया है। लखनऊ में बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने मुलायम सिंह यादव की तत्कालीन सरकार को कठघरे में खड़ा किया, रामभक्तों पर चली गोलियों का ज़िक्र किया और अखिलेश यादव से सवाल पूछ लिया कि आखिर किस मुँह से वो उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं?
अखिलेश बोले- फैसला जनता करेगी
अमित शाह ने साफ़ संदेश दिया कि रामभक्तों पर गोली चलाने वालों को जनता कभी माफ़ नहीं करेगी। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। अखिलेश यादव ने भी पलटवार करने में देर नहीं लगाई। उन्होंने कहा कि चुनाव में हार-जीत भाषणों से नहीं, जनता के वोट से तय होती है। यानी, एक तरफ़ अमित शाह ने 36 साल पुराने गोलीकांड को याद दिलाकर सपा की राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े किए, तो दूसरी तरफ़ अखिलेश ने चुनावी नतीजों का हवाला देकर बीजेपी को जवाब दिया।
क्या 2027 में रामभक्तों की हत्या बनेगा चुनावी मुद्दा?
ऐसे में सवाल है: क्या बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में अयोध्या गोलीकांड को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने जा रही है? क्या मुलायम सिंह यादव के फैसले के बहाने अमित शाह अखिलेश यादव की सियासत को घेर रहे हैं? अयोध्या के इसी पुराने इतिहास पर बात करेंगे और बताएँगे कि क्या राम मंदिर आंदोलन का इतिहास एक बार फिर यूपी की चुनावी राजनीति का केंद्र बनने जा रहा है?
क्या हुआ था 30 अक्टूबर 1990 को?
दरअसल, 30 अक्टूबर, 1990 का दिन राम मंदिर आंदोलन के इतिहास में बेहद अहम माना जाता है। उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। देशभर में राम मंदिर निर्माण की माँग को लेकर आंदोलन तेज़ हो चुका था। बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और संघ से जुड़े संगठनों के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँच रहे थे।
तत्कालीन मुलायम सरकार ने विवादित ढाँचे की सुरक्षा के लिए अयोध्या में कड़े इंतज़ाम किए थे। शहर में पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी। रास्तों पर पहरा था, आवाजाही पर पाबंदियाँ थीं। इसी दौरान मुलायम सिंह यादव का एक बयान बेहद चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
लेकिन सुरक्षा के तमाम इंतज़ामों के बावजूद 30 अक्टूबर को बड़ी संख्या में कारसेवक सुरक्षा घेरा तोड़कर विवादित परिसर की तरफ़ बढ़ गए। हालात बिगड़े। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन इसके बाद गोलीबारी हुई। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर को पाँच कारसेवकों की मौत हुई थी। इसके बाद 2 नवंबर को भी अयोध्या में गोलीबारी हुई।
दोनों घटनाओं को मिलाकर आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या करीब 15 से 16 बताई जाती है। हालाँकि, विश्व हिंदू परिषद और कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने इससे कहीं अधिक लोगों के मारे जाने का दावा किया था। और अब इसी इतिहास को अमित शाह ने लखनऊ की राजनीतिक धरती से फिर सामने रख दिया।
अमित शाह ने अखिलेश से पूछा सवाल
बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने सिर्फ़ मुलायम सिंह यादव का नाम लेकर हमला नहीं किया, बल्कि उनके ज़रिए अखिलेश यादव को भी घेरने की कोशिश की। अमित शाह ने कहा कि रामभक्तों और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर गोलियाँ चलाई गई थीं। सरयू का पानी रामभक्तों के खून से लाल हो गया था। जनता इस घटना को कभी नहीं भूलेगी। इसके बाद उन्होंने अखिलेश यादव पर सीधा हमला करते हुए सवाल किया, “अखिलेश बाबू, आप किस मुँह से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की बात करते हैं?”
मुलायम की विरासत पर बीजेपी का निशाना
दरअसल, बीजेपी की रणनीति में यह हमला केवल एक पुराने घटनाक्रम की याद दिलाना नहीं है, बल्कि समाजवादी पार्टी की राजनीतिक विरासत को राम मंदिर आंदोलन के विरोध से जोड़कर पेश करना भी है।
बीजेपी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रही है कि एक तरफ़ राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोलियाँ चलीं, तो दूसरी तरफ़ कल्याण सिंह की सरकार ने कारसेवा के लिए रास्ता दिया और राम मंदिर आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई। अमित शाह ने अपने संबोधन में कल्याण सिंह का ज़िक्र भी किया। उन्होंने याद दिलाया कि कल्याण सिंह ने कारसेवा होने दी और इसके लिए अपनी सरकार की कुर्बानी देने से भी पीछे नहीं हटे।
यानी, अमित शाह ने एक तरफ़ मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल को निशाने पर रखा, तो दूसरी तरफ़ कल्याण सिंह के फैसले को बीजेपी के राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष से जोड़कर पेश किया।
अखिलेश ने चुनावी नतीजों का दिया हवाला
अब अमित शाह के हमले के बाद अखिलेश यादव भी चुप नहीं रहे। सपा प्रमुख ने कहा कि चुनाव में हार और जीत भाषणों से नहीं, बल्कि जनता के वोट से तय होती है। अखिलेश ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए वाराणसी के चुनावी नतीजों का ज़िक्र किया और डबल इंजन की सरकार पर तंज कसते हुए उसे डबल ज़ीरो बताया। उन्होंने अयोध्या की जनता का भी आभार जताया।
दरअसल, अखिलेश का इशारा 2024 के लोकसभा चुनाव में फैज़ाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी की जीत की तरफ़ था, जहाँ सपा के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को शिकस्त दी थी। ये नतीजा बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि अयोध्या इसी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। राम मंदिर निर्माण के बाद भी बीजेपी को यहाँ हार का सामना करना पड़ा था।
अखिलेश इसी जनादेश को सामने रखकर बीजेपी को जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। उनका संदेश है कि जनता का फैसला ही सबसे बड़ा फैसला होता है।
एमएलसी चुनाव के बाद क्या तेज हो गई यूपी में सियासत
एक सवाल और है, जो आप सभी के मन में आ रहा होगा कि आखिर एमएलसी चुनाव के बाद ही यूपी की सियासत में मुलायम सिंह का ज़िक्र हो गया और चुनावी शोर भी तेज़ी से सुनाई देने लगा है। तो इसका जवाब है उत्तर प्रदेश में एमएलसी चुनाव के नतीजे, जिसके बाद बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों ही अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को लेकर सक्रिय हैं।
एक तरफ़ बीजेपी संगठन को मज़बूत करने और 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ़ समाजवादी पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता-विरोधी माहौल को रोकना और अपने पारंपरिक मतदाताओं को एकजुट रखना है। वहीं, सपा की कोशिश है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला समर्थन विधानसभा चुनाव तक बरकरार रखा जाए। ऐसे में अयोध्या गोलीकांड का मुद्दा उठाकर बीजेपी ने सपा को उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड पर घेरने की कोशिश की है, वहीं अखिलेश यादव चुनावी नतीजों और जनता के समर्थन को अपनी ताक़त बताकर जवाब दे रहे हैं।
2027 में क्या होगा गोलीकांड का असर?
अब इस पर बात कर लेते हैं कि अयोध्या का 36 साल पुराना मुद्दा 2027 के चुनाव में क्या असर डालेगा। क्या 36 साल पुराना अयोध्या गोलीकांड 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए बड़ा चुनावी हथियार साबित होगा? तो इसे तीन पॉइंट्स में समझते हैं।
पहला, बीजेपी इस मुद्दे के ज़रिए अपने कोर हिंदुत्व वोट बैंक को एक बार फिर एकजुट करने की कोशिश कर सकती है।
दूसरा, समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव के दौर की राजनीति और राम मंदिर आंदोलन के प्रति उसके तत्कालीन रुख पर जवाब देना पड़ सकता है।
तीसरा, अखिलेश यादव के सामने चुनौती होगी कि वो अपनी पार्टी की मौजूदा राजनीति को पुराने फैसलों से अलग करके जनता के सामने कैसे पेश करते हैं।
हालाँकि, 2027 का चुनाव सिर्फ़ राम मंदिर या अयोध्या गोलीकांड के मुद्दे पर नहीं लड़ा जाएगा। महँगाई, बेरोज़गारी, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याएँ, युवाओं की नौकरियाँ और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दे भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करेंगे।
लेकिन अमित शाह के लखनऊ दौरे ने इतना ज़रूर साफ़ कर दिया है कि बीजेपी 2027 की लड़ाई में इतिहास के पन्नों को भी चुनावी बहस का हिस्सा बनाने जा रही है। अयोध्या की धरती पर 36 साल पहले जो कुछ हुआ था, उसकी गूँज एक बार फिर लखनऊ के सियासी गलियारों में सुनाई दे रही है।
अमित शाह ने मुलायम सिंह यादव के दौर की गोलीबारी को याद दिलाकर अखिलेश यादव के सामने सवाल खड़ा किया है, तो अखिलेश ने भी जनता के वोट को सबसे बड़ा जवाब बताया है। लेकिन असली सवाल यही है कि 2027 में जनता किस मुद्दे को तरजीह देगी—राम मंदिर आंदोलन का इतिहास या आज के शासन और विकास का हिसाब?
क्योंकि इस बार मुकाबला सिर्फ़ दो राजनीतिक दलों के बीच नहीं होगा, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के बीच भी होगा। और फैसला आखिरकार उत्तर प्रदेश की जनता को ही करना है।




