ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना का पूरा इतिहास

Lalitpur Singrauli Railway Project: ललितपुर-सिंगरौली रेलवे परियोजना का इंतजार कई पीढ़ियों ने किया, वह सपना अब साकार होने लगा है। विंध्य में पहली बार इस रेलमार्ग पर ट्रेन दौड़ने की शुरुआत हो चुकी है। आइए जानते हैं विंध्य की लाइफलाइन इस ऐतिहासिक रेल परियोजना की पूरी कहानी।

विंध्य में कब हुई रेलवे की शुरुआत

लेकिन इस परियोजना से पहले, हम विंध्य में रेलवे के शुरुआती सफर को भी जान लेते हैं। विंध्य में रेलवे की शुरुआत 1863 में हुई, जब प्रयाग के निकट नैनी से जबलपुर के बीच रेल पटरी बिछाई गई। बघेलखंड पोलिटिकल एजेंसी का मुख्यालय होने और बघेलखंड तथा बुंदेलखंड के लगभग मध्य में स्थित होने के कारण सतना में प्रमुख रेलवे स्टेशन बनाया गया। इसके साथ डभौरा, मैहर, उचेहरा समेत कई छोटे स्टेशन भी बने। कोयले की खोज के बाद कटनी-बिलासपुर रेलवे लाइन योजना के तहत 1886 में रीवा राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों शहडोल-उमरिया तक भी रेलवे पहुँच गई। इसी बीच, महाराजा रघुराज सिंह के समय और फिर वर्ष 1910 में महाराजा व्यंकट रमण सिंह के शासनकाल में सतना से रीवा तक रेल पटरी बिछाने के प्रयास किए गए। यहाँ तक कि मिट्टी डालने का काम भी हुआ, लेकिन इसके बावजूद रेल लाइन का निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ पाया।

विंध्य प्रदेश का भौगोलिक विस्तार और संचार की कमी

ललितपुर-सिंगरौली रेलवे लाइन के निर्माण की कहानी को समझने के लिए सबसे पहले हमें 1948 से 1956 के बीच अस्तित्व में रहे विंध्य प्रदेश को भी जानना होगा। उस समय विंध्य प्रदेश का भौगोलिक विस्तार उत्तर-पश्चिम में दतिया से लेकर टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी और शहडोल होते हुए दक्षिण-पूर्व में सिंगरौली और अमरकंटक तक फैला हुआ था। कई छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर बने इस राज्य का अधिकांश हिस्सा विकास की दृष्टि से पिछड़ा हुआ था। हालांकि, पर्यटन और खनिज आधारित उद्योगों के विकास की यहाँ अपार संभावनाएँ थीं। इन संभावनाओं को साकार करने के लिए जरूरी था कि विंध्य प्रदेश सड़क और रेल मार्गों के जरिए देश के दूसरे हिस्सों से अच्छी तरह जुड़ा हो। लेकिन उस समय राज्य में न तो पर्याप्त सड़कें थीं और न ही रेलवे नेटवर्क का व्यापक विस्तार हुआ था। रेलवे से जुड़े प्रमुख शहरों में सतना, शहडोल और दतिया ही शामिल थे। दूसरी ओर, कोयले के विशाल भंडार और ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाओं वाला सिंगरौली क्षेत्र रेल संपर्क से वंचित था। वहाँ के लोगों को रेल यात्रा के लिए मिर्जापुर और सोनभद्र की ओर जाना पड़ता था, जबकि टीकमगढ़ के लिए उत्तर प्रदेश का ललितपुर निकटतम रेलवे स्टेशन था।

बिखरे हुए विंध्य को जोड़ने के लिए रेल की जरूरत

उस समय के विंध्य प्रदेश के नक्शे पर नजर डालें, तो एक और दिलचस्प बात दिखाई देती है। दतिया राज्य के बाकी हिस्सों से अलग-थलग था और भौगोलिक रूप से भी विंध्य प्रदेश के मुख्य भूभाग से सीधे जुड़ा हुआ नहीं था। ऐसे में पूरे क्षेत्र को बेहतर रेल संपर्क से जोड़ना केवल यातायात और आर्थिक विकास की जरूरत नहीं थी, बल्कि राज्य के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क और राजनीतिक एकता को मजबूत करने के लिए भी महत्त्वपूर्ण था। यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें विंध्य प्रदेश के भीतर रेलवे विस्तार की मांग उठने लगी।

संसद में उठी विंध्य में रेलवे की कमी

विंध्य प्रदेश के शुरुआती वर्षों में ही उसके विभिन्न हिस्सों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की मांग संसद में उठने लगी थी। पहली संसद में विंध्य से राज्यसभा सांसद बने, सीधी के बैजनाथ दुबे ने विंध्य क्षेत्र में रेलवे की कमी का मुद्दा उठाया। इसी दौरान सीधी-शहडोल संसदीय क्षेत्र से सांसद बने आनंदचंद्र जोशी ने भी सतना से रीवा और गोविंदगढ़ होते हुए आगे तक रेलवे लाइन का विस्तार करने की मांग की। इन प्रयासों से स्पष्ट था कि विंध्य के जनप्रतिनिधि रेल संपर्क को क्षेत्र के विकास की एक महत्त्वपूर्ण जरूरत मानते थे और रीवा सहित दूर-दराज के इलाकों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने के लिए लगातार प्रयासरत थे।

विंध्य के लिए क्यों जरूरी थी यह रेल परियोजना?

हालांकि, वर्ष 1956 में विंध्य प्रदेश का मध्यप्रदेश में विलय हो गया और एक अलग राज्य के रूप में उसका अस्तित्व समाप्त हो गया। लेकिन विंध्य को रेल संपर्क से जोड़ने के प्रयास क्षेत्र से संबंध रखने वाले विभिन्न जनप्रतिनिधियों द्वारा होती ही रही। इसी बीच, 1960 के दशक में केंद्र सरकार की मंजूरी और सोवियत संघ की मदद से कोयला विकास निगम ने सिंगरौली में बड़े पैमाने पर मशीनीकृत कोयला खदानों की शुरुआत की। इसके बाद वर्ष 1962 में केंद्र सरकार ने कोयले के परिवहन के लिए चोपन-सिंगरौली-कटनी रेलवे लाइन की योजना बनाई और इसका निर्माण कार्य भी शुरू हो गया। अब यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझिए। चोपन, प्रयागराज–रांची–धनबाद रेल मार्ग से जुड़ा हुआ था, जबकि ललितपुर, दिल्ली–झाँसी–भोपाल रेल मार्ग पर स्थित था। ऐसे में ललितपुर से सिंगरौली तक रेल संपर्क स्थापित होने से विंध्य का पश्चिमोत्तर हिस्सा उत्तर भारत के प्रमुख रेल मार्गों से और दक्षिण-पूर्वी हिस्सा कोयला उत्पादक क्षेत्रों से बेहतर ढंग से जुड़ सकता था।

एक रेलमार्ग, पूरे विंध्य को जोड़ने का सपना

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यह परियोजना पुराने विंध्य प्रदेश के बड़े भूभाग को दतिया से लेकर सिंगरौली तक एक रेल संपर्क सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती थी। यानी यह केवल परिवहन या यात्रियों की सुविधा का मामला नहीं था, बल्कि विंध्य के बिखरे हुए क्षेत्रों को आपस में जोड़ने और उनके आर्थिक विकास को गति देने की एक व्यापक परिकल्पना भी थी। और यही वह सोच थी, जिसे विंध्य के पुराने समाजवादी नेता आगे बढ़ाना चाहते थे, एक ऐसा रेल मार्ग, जो विंध्य के पश्चिमोत्तर और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों को जोड़कर पूरे क्षेत्र को एक सूत्र में बाँध सके। तो यही मूल सोच थी इस परियोजना की।

विंध्य विकास परिषद ने उठाई रेल की आवाज

1960 और 1970 के दशक में रीवा के समाजवादी विचारों से प्रभावित प्रबुद्ध वर्ग ने विंध्य के विकास से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए विंध्य विकास परिषद की स्थापना की। वर्ष 1967 में गोविंद नारायण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस संगठन को प्रोत्साहन मिला। इसके परिणामस्वरूप चंद्रप्रताप तिवारी और अन्य नेताओं के नेतृत्व में परिषद के प्रतिनिधियों ने तत्कालीन राष्ट्रपति वी. वी. गिरि और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात कर विंध्य के विकास के लिए चार सूत्रीय मांगें रखीं। इन मांगों में कटनी-चोपन रेल मार्ग को जल्द पूरा कराना, रीवा में विश्वविद्यालय की स्थापना, डिंबा परियोजना को आगे बढ़ाना और रीवा संभाग के बुंदेलखंड तथा बघेलखंड के हिस्सों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ना शामिल था। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने कटनी-चोपन मार्ग को जल्द पूरा कराने का आश्वासन दिया। विश्वविद्यालय की स्थापना को राज्य का विषय बताते हुए उन्होंने शेष योजनाओं को आगे बढ़ाने का भी भरोसा दिलाया।

संसद में गूँजी विंध्य में रेल विस्तार की मांग

इसी क्रम में वर्ष 1971 में रीवा से महाराज मार्तंड सिंह और सीधी संसदीय क्षेत्र से रणबहादुर सिंह सांसद निर्वाचित हुए। उन्होंने भी रीवा और सीधी तक रेलवे विस्तार की मांग उठाई। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद विंध्य के बड़े हिस्से को रेल नेटवर्क से जोड़ने की मांग लंबे समय तक पूरी नहीं हो सकी। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय तक मुख्य उद्देश्य विंध्य और आसपास के क्षेत्रों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ना था। इस पूरी योजना को अभी ललितपुर-सिंगरौली रेलवे लाइन के नाम की पहचान नहीं मिली थी।

यमुना प्रसाद शास्त्री ने उठाई रेल की आवाज

लेकिन वर्ष 1977 में देश का निजाम बदला जनता पार्टी की सरकार आई और यमुना प्रसाद शास्त्री रीवा से सांसद बने। उन्होंने संसद में सतना से रीवा होते हुए मिर्जापुर और सिंगरौली तक रेलवे लाइन बिछाने की मांग उठाई। यमुना प्रसाद शास्त्री के साथ-साथ सीधी के सांसद सूर्यनारायण सिंह, सतना के सांसद दादा सुखेन्द्र सिंह और खजुराहो के सांसद पंडित लक्ष्मीनारायण नायक ने भी विंध्य तथा आसपास के क्षेत्रों में रेल विस्तार की मांग उठाई। इन सांसदों के प्रयासों के बाद तत्कालीन रेल मंत्री मधु दंडवते ने ललितपुर-खजुराहो-पन्ना और सतना-रीवा होते हुए सीधी-सिंगरौली तक रेलवे लाइनों के सर्वेक्षण की घोषणा की। इसके बाद दिसंबर 1978 में सर्वेक्षण का काम शुरू हुआ और मार्च 1981 तक रिपोर्ट आने की संभावना जताई गई।

इंदिरा गांधी ने रखी सतना-रीवा रेल लाइन की नींव

इसी बीच वर्ष 1980 में जब अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो इस परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी भी मिल गई, इससे क्षेत्र में रेल संपर्क के विस्तार की उम्मीद जगी, लेकिन उस समय तक योजना आयोग और रेलवे उन्हीं परियोजनाओं को प्राथमिकता देता था, जिनसे भारी राजस्व प्राप्त होता था, और यह परियोजना तो देश के अत्यधिक पिछड़े और वन प्रांतर से होकर गुजरती थी, इसीलिए सर्वेक्षण और मंजूरी के बाद भी परियोजना को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। वर्ष 1980 में कांग्रेस समर्थित महाराज मार्तंड सिंह रीवा से फिर सांसद बने। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से महाराज के अच्छे संबंधों का लाभ रीवा को मिला और सतना से रीवा तक रेलवे लाइन को मंजूरी मिल गई। इस परियोजना की नींव 31 मई 1982 को इंदिरा गांधी ने रखी। हालांकि, यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है, उस समय तक ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना को औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं मिली थी।

दस साल में पूरी हुई रीवा-सतना रेल लाइन

वर्ष 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और उनके सहयोगी ग्वालियर राज परिवार के प्रमुख माधवराव सिंधिया रेल मंत्री बने। सिंधिया ने सतना-रीवा रेल परियोजना में विशेष रुचि दिखाई, जिससे निर्माण कार्य को गति मिली। अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री होने के कारण सर्वेक्षण और अधिग्रहण के कार्य भी तेजी से हुए। इन मिले जुले प्रयासों का ही परिणाम था, कि शिलान्यास के लगभग एक दशक के भीतर रीवा तक रेलवे लाइन का निर्माण पूरा हुआ और वर्ष 1993 में यहाँ से रेल संचालन शुरू भी हो गया। तत्कालीन रेलवे मिनिस्टर सी. के. जाफ़र शरीफ, मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह और पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री माधवराव सिंधिया ने रीवा स्टेशन का उद्घाटन किया था। इस तरह रीवा को रेलवे के नक्शे पर लाने का सपना साकार हुआ। लेकिन सीधी और विंध्य के दूसरे हिस्सों को रेल नेटवर्क से जोड़ने के साथ-साथ ललितपुर से सिंगरौली तक सीधा रेल संपर्क स्थापित करने की मांग अभी भी अधूरी थी।

उमा भारती ने उठाया ललितपुर-सिंगरौली का मुद्दा

वर्ष 1989 में बुंदेलखंड से आने वाली तेजतर्रार नेत्री, खजुराहो से सांसद बनीं उमा भारती ने ललितपुर-सिंगरौली रेलवे के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से इस रेल मार्ग का नए सिरे से सर्वेक्षण कराने की मांग की। इसी दौरान रीवा सांसद यमुना प्रसाद शास्त्री, सतना सांसद सुखेन्द्र सिंह, सीधी से सांसद बने जगन्नाथ सिंह, दमोह के सांसद लोकेन्द्र सिंह और झांसी से सांसद राजेंद्र अग्निहोत्री ने भी संसद भी इस परियोजना के लिए साथ मिलकर आवाज उठाई। ध्यान दें तो इन्हीं सांसदों के क्षेत्र से होकर इस परियोजना को गुजरना था। सांसदों की मांग पर जॉर्ज फर्नांडीस ने परियोजना के नए सिरे से सर्वेक्षण और उसकी प्रगति को लेकर आश्वासन दिया।

1997 में हुई ललितपुर-सिंगरौली की घोषणा

लेकिन सरकारें बदलती रहीं और यह परियोजना लंबे समय तक फाइलों में अटकी रही। हालांकि जनप्रतिनिधि लगातार इस परियोजना को आगे बढ़ाने की मांग करते रहे। आखिरकार, लगातार उठती मांगों के बीच 26 फरवरी 1997 को रेल बजट में तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान ने इस परियोजना की घोषणा की। इसके बाद प्रारंभिक आवश्यक प्रक्रियाएँ आगे बढ़ीं और 3 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ललितपुर-सिंगरौली रेलवे परियोजना का शिलान्यास किया। लेकिन शिलान्यास के बाद भी पूर्ण होने में अभी इस परियोजना को एक लंबा सफर तय करना बाकी था। ध्यान देने वाली बात यह भी, कि उमा भारती के प्रयासों के कारण महोबा से खजुराहो तक एक अलग से लाइन भी इसमें जोड़ी गई, जो संयुक्त रूप से ललितपुर-सिंगरौली परियोजना का ही हिस्सा है।

25 साल तक अटकी रही ललितपुर-सिंगरौली रेलवे

लेकिन ललितपुर-सिंगरौली रेलवे परियोजना का सफर इतना आसान नहीं रहा। वर्ष 1999 में शिलान्यास के बाद वर्ष 2001 में इसके लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, शुरुआती दौर में ही धन की कमी ने इस परियोजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। रेल बजट में इसके लिए पर्याप्त राशि आवंटित नहीं हो पा रही थी, जिसके कारण निर्माण की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। दूसरी ओर, भूमि अधिग्रहण की जटिलताओं के साथ-साथ वन भूमि और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों ने भी परियोजना की राह मुश्किल बनाई। नतीजा यह हुआ कि यह वर्षों तक धीमी गति से ही आगे बढ़ता रहा। हर साल मिलने वाला सीमित बजट इस विशाल परियोजना की जरूरतों के मुकाबले ऊँट के मुँह में जीरे के समान था। ऐसे में परियोजना कभी आगे बढ़ती, तो कभी संसाधनों की कमी के कारण ठहर जाती।

2014 के बाद आई काम में तेजी

हालांकि, वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद इस परियोजना को लेकर परिस्थितियाँ बदलने लगीं। वर्ष 2016 में तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कार्यकाल में इसके लिए लगभग 400 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। कोविड के समय के वित्तीय वर्ष को छोड़ दें, तो इसके बाद परियोजना के लिए बजट बढ़ता ही रहा। पिछले 2025-26 में इसे 1713 करोड़ रुपए आवंटित हुए थे। साथ ही मध्यप्रदेश सरकार ने भी इस परियोजना पर बड़ी तेजी से कार्य किए। परिणामस्वरूप बेहतर संसाधन उपलब्ध होने के कारण वर्षों से धीमी गति से चल रही यह परियोजना बड़ी तेजी से पूर्ण होने की कगार पर है।

परियोजना की लागत

इस लंबे विलंब का असर इसकी लागत पर भी पड़ा। वर्ष 1997 में परियोजना की घोषणा के समय इसकी अनुमानित लागत लगभग 828 करोड़ रुपये अनुमान की गई थी। लेकिन वर्षों तक निर्माण में देरी, लागत में वृद्धि और परियोजना के विस्तृत कार्यों के चलते रेलवे की रिपोर्टों में इसकी लागत बढ़कर लगभग 8,914 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। यानी जिस परियोजना की शुरुआत सैकड़ों करोड़ रुपये के अनुमान से हुई थी, उसकी लागत बढ़ते-बढ़ते कई गुना हो गई। नवीनतम उपलब्ध सरकारी परियोजना रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 तक इस परियोजना में लगभग 6,807 करोड़ खर्च हो चुके हैं।

निर्माण के समय थी कई चुनौतियाँ

ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना की कुल लंबाई लगभग 541 किलोमीटर है और इसका निर्माण 1676 मिलीमीटर चौड़े ब्रॉडगेज रेलवे ट्रैक पर किया जा रहा है। परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण लगभग पूरा हो चुका है। विंध्य के पहाड़ी और दुर्गम भूभाग से गुजरने के कारण इस रेलमार्ग का निर्माण इंजीनियरिंग की दृष्टि से भी चुनौतीपूर्ण रहा है। पुराने सर्वेक्षण में पहाड़ी क्षेत्रों से गुजरने के कारण रेलमार्ग पर कई तीखे मोड़ प्रस्तावित थे। लेकिन सुरक्षा और बेहतर परिचालन को ध्यान में रखते हुए नए अलाइनमेंट में बदलाव किए गए और मोड़ों की संख्या कम करने के साथ कुछ संरचनाओं में भी बदलाव किए गए। परियोजना में सात सुरंगों प्रस्तावित थीं, जिनमें छुहिया घाटी की लगभग साढ़े तीन किलोमीटर लंबी सुरंग सबसे प्रमुख है। इसके अलावा, रेलमार्ग पर करीब दस बड़े पुलों का निर्माण भी किया जा रहा है या पूरा हो चुका है। ये सुरंगें और पुल इस बात का प्रमाण हैं कि विंध्य के कठिन भूभाग को पार करते हुए रेल संपर्क स्थापित करना कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है।

सबसे पहले शुरू हुई महोबा-खजुराहो लाइन

सबसे पहले 64 किलोमीटर लंबी खजुराहो-महोबा लाइन 2008 में प्रारंभ हुई। उसके बाद ललितपुर से खजुराहो तक तक 165 किलोमीटर का कार्य पूरा होने के बाद 2019 से वहाँ रेलवे का संचालन होने लगा। और अब देवेंद्रनगर-चुरहट लाइन भी प्रारंभ हो चुकी है, जिस पर पिछले दिनों मेमू ट्रेन का संचालन शुरू हुआ है। सीधी रेलवे स्टेशन भी जल्द निर्मित हो जाएगा। सीधी-सिंगरौली और देवेन्द्रनगर-खजुराहो लाइन निर्माणाधीन है, उम्मीद है यह जल्द ही पूरे हो जाएंगे। राज्य सरकार और रेल मंत्रालय के अनुसार अनुमानतः वर्ष 2028 तक में संभवतः यह परियोजना पूरी तरह पूर्ण हो जाएगी।

ललितपुर-सिंगरौली रेल लाइन नहीं, विंध्य की नई उम्मीद

इस परियोजना के पूरा होने पर बुंदेलखंड और बघेलखंड के अनेक क्षेत्रों को रेलवे के माध्यम से देश के दूसरे हिस्सों और बड़े शहरों तक पहुँचने का बेहतर अवसर मिलेगा। इससे यात्रियों का आवागमन आसान होने के साथ-साथ व्यापार, पर्यटन, उद्योग और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। लेकिन ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना का महत्त्व केवल विकास और आवागमन तक सीमित नहीं है। यह उस ऐतिहासिक विंध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को फिर से एक सूत्र में पिरोएगी, जिसकी क्षेत्रीय एकता और विकास की चिंता आज से कई दशक पहले विंध्य विलय के समय बताई गई थी। यह रेलमार्ग विंध्य के विकास को गति देगा। शहरों और स्टेशनों को जोड़ेगा, बिखरे हुए हिस्सों को करीब लाते हुए उन इलाकों के बीच की दूरियाँ कम करते हुए क्षेत्र के जुड़ाव को मजबूती देगा। क्षेत्र जुड़ेंगे, तो रास्ते ही नहीं, दिल भी आपास में जुड़ेंगे। और यही ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना की सबसे बड़ी उम्मीद है।

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