Vindhya Pradesh History In Hindi: आज 1 नवंबर को मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस है, विंध्य समेत चार राज्यों को मिलाकर इस राज्य का निर्माण किया गया था। क्या आप जानते हैं कि आज के मध्य प्रदेश का विंध्य क्षेत्र कभी अलग राज्य हुआ करता था? लेकिन महज आठ साल में यह राज्य देश के नक्शे से गायब हो गया।
1948 में संयुक्त विंध्य प्रदेश का गठन
दरअसल, विंध्य प्रदेश का इतिहास बुंदेलखंड एजेंसी से जुड़ा है। इसका गठन द्वितीय मराठा युद्ध के बाद 1811 में हुआ था। इसका मुख्यालय पहले बांदा, फिर 1824 में कालपी और 1832 में दोबारा बांदा बनाया गया। उस समय यह आगरा मुख्यालय वाले उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन था। लेकिन 1849 में इसे जबलपुर मुख्यालय वाले नर्मदा-सागर क्षेत्र के चीफ कमिश्नर के अधिकार में दे दिया गया और इंदौर मुख्यालय वाले सेंट्रल इंडिया एजेंसी में शामिल कर दिया गया। 1857 की क्रांति के बाद झांसी, कालपी, बांदा, चंदेरी और विजयराघवगढ़ जैसे क्षेत्र ब्रिटिश सरकार के अधीन आ गए, जबकि शेष क्षेत्र सेंट्रल इंडिया एजेंसी में रहे। इसके बाद 1871 में बुंदेलखंड एजेंसी से अलग कर बघेलखंड एजेंसी बनाई गई। इसमें रीवा, नागौद, मैहर, कोठी, सोहावल, जसो, बरौंधा और कालिंजर की चौबे जागीर शामिल थीं। लेकिन 1933 में बघेलखंड एजेंसी समाप्त कर उसे फिर बुंदेलखंड एजेंसी में मिला दिया गया, जिसका मुख्यालय नौगाँव था।
इंदौर रेजिडेंसी के अधीन था रीवा
लेकिन रीवा को अव्यावहारिक रूप से लगभग 800 किलोमीटर दूर इंदौर रेसीडेंसी के अधीन रखा गया। यह व्यवस्था आजादी तक बनी रही। आजादी के बाद बुंदेलखंड और बघेलखंड की 35 छोटी-बड़ी रियासतों के शासकों ने 12 मार्च 1948 को नौगांव में समझौते पर हस्ताक्षर किए और 4 अप्रैल को संयुक्त विंध्य प्रदेश का गठन हुआ। बाद में रीवा भी इसमें शामिल हुआ और इसकी राजधानी बना। रीवा के महाराजा मार्तण्ड सिंह राजप्रमुख और पन्ना के महाराजा यादवेन्द्र सिंह उपराजप्रमुख बने।
दो क्षेत्रों के अलग-अलग मंत्रिमंडल
प्रशासन के लिए दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग मंत्रिमंडल बनाए गए, बघेलखंड का नेतृत्व अवधेश प्रताप सिंह और बुंदेलखंड का कामता प्रसाद सक्सेना ने किया। लेकिन दोनों क्षेत्रों के बीच राज्य तो मिल गए थे, पर शायद दिल नहीं मिले थे। इसीलिए राजनीतिक खींचतान और प्रशासनिक मतभेद बढ़ने लगे। नतीजा यह हुआ कि 14 अप्रैल 1949 को मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया और 15 अप्रैल से केंद्र सरकार ने प्रशासन संभाल लिया। इसके बाद 26 दिसंबर 1949 को रियासतों के शासकों ने विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर अपने शासन संबंधी अधिकार भारत सरकार को सौंप दिए। फलस्वरूप 1 जनवरी 1950 से विंध्य प्रदेश चीफ कमिश्नर के अधीन आ गया और सीधे केंद्र से संचालित होने लगा।
विंध्य प्रदेश के विलय की तैयारी
इसी दौरान 1950 में विंध्य प्रदेश, यूनाइटेड प्रोविन्स और सेंट्रल प्रोविन्स के बीच सीमाई क्षेत्रों और एन्क्लेव की अदला-बदली हुई। यानी दूसरे प्रदेशों से घिरे विंध्य प्रदेश के कई छोटे-छोटे क्षेत्र और स्टेट संबंधित प्रदेशों को हस्तांतरित किए गए। इसके बाद 1951-52 में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को बहुमत मिला और 13 मार्च 1952 को पंडित शंभूनाथ शुक्ला विंध्य प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। लेकिन छोटे राज्यों के प्रशासन, सीमित आर्थिक संसाधनों और विकास की चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार ने राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की। वर्ष 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर विंध्य प्रदेश को मध्यभारत, भोपाल और पुराने मध्य प्रदेश के साथ मिलाकर नया मध्य प्रदेश बनाने का फैसला हुआ।
विंध्य प्रदेश का हुआ मध्यप्रदेश में विलय
इस फैसले का विंध्य के कई नेताओं और संगठनों ने विरोध किया। उनका तर्क था कि अलग विंध्य प्रदेश की अपनी पहचान और विकास की संभावनाएं हैं। लेकिन विरोध के बावजूद संसद ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 पारित कर दिया और आखिरकार 1 नवंबर 1956 को विंध्य प्रदेश का मध्य प्रदेश में विलय हो गया। इस तरह 35 रियासतों से मिलकर बना विंध्य प्रदेश महज आठ साल में इतिहास बन गया। लेकिन सवाल आज भी है, क्या इस विलय के पीछे केवल प्रशासनिक और आर्थिक जरूरतें थीं या कुछ ऐसे राजनीतिक कारण भी थे, जिनकी कहानी अब तक पूरी तरह सामने नहीं आई है?




