बघेली के ‘हुलकी पड़ना’ का मतलब जानते हैं? भूली-बिसरी महामारी की कहानी

‘Hulki Padna’ Itihas Hindi Mein: हम सबने कभी न कभी अपने घर-परिवार या आस-पड़ोस के बड़े-बुजुर्गों और सयानों को बघेली में एक कहावत बोलते जरूर सुना होगा- “तोहि हुलकी परय”, “तोरे हुलकी परय” या “जा हुलकी मा”! कभी गुस्से में, तो कभी हँसी-मजाक में कही जाने वाली इन बातों को सुनकर आपके मन में भी यह सवाल जरूर उठा होगा कि आखिर यह ‘हुलकी पड़ना’ या हुलकी है क्या? पर आप यह सुनकर शायद हैरान होंगे वास्तव में हुलकी पड़ना का अर्थ अतीत में एक महामारी के प्रकोप से है, जैसे कोरोना।

‘हुलकी पड़ना’ का मतलब क्या है?

दरअसल, ‘हुलकी’ शब्द उल्टी का देशज रूप है, उल्टी से तात्पर्य उल्टी करना से है। जिसे कै या वमन भी कहा जाता है। बघेली में प्रचलित इस शब्द के पीछे हैजे की एक ऐसी भयावह कहानी जुड़ी हुई है, जिसने कभी रीवा राज्य के लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया था। हैजा, जिसे अंग्रेजी में कॉलेरा कहा जाता है, एक ऐसी महामारी थी, जिसने समय-समय पर भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई।

भारत से शुरू हुआ था हैजा

वर्ष 1817 में बंगाल प्रांत के गंगा डेल्टा क्षेत्र से हैजे की पहली महामारी शुरू हुई और धीरे-धीरे दुनिया के अनेक हिस्सों में फैल गई। इसके बाद भी अलग-अलग समय पर हैजे की महामारियाँ फैलती रहीं। वर्ष 1881 में पाँचवीं बार इस महामारी का प्रकोप शुरू हुआ। इसी दौर में, वर्ष 1885 में, रीवा राज्य में भी हैजे का भयंकर प्रकोप हुआ। दरअसल, वर्ष 1882 में इलाहाबाद में कुंभ मेले का आयोजन हुआ था। कहा जाता है कि कुंभ मेले में आने-जाने वाले यात्रियों के माध्यम से हैजा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगा।

प्रयाग कुंभ से रीवा में आया हैजा

रीवा, मध्य भारत से प्रयागराज जाने वाले मार्ग पर स्थित था। इस कारण इस मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों के दल अक्सर रीवा में पड़ाव डाला करते थे। इसी बीच एक यात्री दल रीवा से गुजर रहा था, उस दल में एक व्यक्ति हैजे से संक्रमित था, जिसकी रास्ते में ही रीवा के पास मृत्यु हो गई। संक्रमण के भय से उसके साथियों ने शव का अंतिम संस्कार नहीं किया, बल्कि उसे शव को सड़क किनारे ही छोड़ दिया। जिसके बाद रीवा राज्य में हैजे का प्रकोप फैलने लगा।

महामारी का भयावह दौर

हैजा दूषित पानी और भोजन के माध्यम से फैलने वाली बीमारी है। उस समय पीने के साफ पानी और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव था। ऐसे में बीमारी धीरे-धीरे राज्य के गाँवों तक फैलने लगी। लोगों को बार-बार उल्टी और दस्त होते थे। शरीर में पानी की अत्यधिक कमी हो जाने के कारण कई लोगों की मृत्यु हो जाती थी। अब उस समय तक न तो हैजे के रोकथाम के लिए टीका विकसित हो पाया था न ही ओआरएस का घोल बन पाया था। बताया जाता है, इस महामारी का प्रकोप इतना भयानक था कि एक ही परिवार के कई-कई लोग इसकी चपेट में आकर दम तोड़ देते थे। गाँवों में हालात ऐसे हो जाते थे कि एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी नहीं हो पाता था कि परिवार में किसी दूसरे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी।

हैजे के साथ चेचक और मलेरिया का भी कहर

लेकिन रीवा राज्य की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। हैजे के प्रकोप के बीच एक दूसरी गंभीर बीमारी ने भी राज्य में दस्तक दे दी। यह थी चेचक, जिसे आम बोलचाल में ‘माता निकलना’ कहा जाता था। इसके साथ ही मलेरिया और दूषित पानी के कारण होने वाले डायरियाँ ने भी लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। इस तरह एक के बाद एक कई बीमारियों के फैलने से राज्य में आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होने लगा। हैजा का प्रकोप रीवा राज्य में आठ महीने रहा और चेचक का लगभग सात महीने। उस दौर में इस महामारी से रीवा राज्य में लाखों लोग प्रभावित हुए और हजारों लोगों की मृत्यु हुई।

अंग्रेजों ने प्रारंभ किए प्रयास

उस समय रीवा के महाराज व्यंकट रमण सिंह बालक थे, इसलिए राज्य का प्रशासन अंग्रेजों के नियंत्रण में था। बताया जाता है कि महामारी से निपटने के लिए तत्काल प्रयास शुरू किए गए। अंग्रेजों द्वारा रीवा में स्थापित डिस्पेंसरी ने भी इस दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बड़ी संख्या में बीमार लोगों का उपचार किया।

कैसे लोगों की याद में रह गई ‘हुलकी परय’

हालांकि बीमारियाँ कई थीं, लेकिन सबसे भयंकर प्रकोप हैजे का ही था। इस बीमारी में बार-बार उल्टी और दस्त होते थे। हैजे के साथ कई गंभीर बीमारियाँ एक साथ आ गईं। जिससे बहुत जनहानि हुई, ऐसे में इस हैजे और चेचक के प्रकोप और उससे जुड़ी घटनाओं ने लोगों की दिल-दिमाग में गहरी जगह बना ली। जिसके बाद बीमारी के इस भयानक दौर को जनस्मृति में लोगों ने ‘हुलकी आना’ या ‘हुलकी पड़ना’ कहकर याद करने लगे। इसके बाद भी कई बार इन महामारियों ने रीवा के लोगों को प्रभावित किया जिससे हुलकी की याद याद बनी ही रही। हालांकि समय के साथ विज्ञान ने प्रगति की और इन बीमारियों का उपचार खोज लिए गए और टीके विकसित हो गए।

महामारी को देवी-देवताओं के प्रकोप थे लोग

उस दौर में, जब बीमारियों के कारणों और उनके फैलने के तरीकों को लेकर वैज्ञानिक समझ सीमित थी, तब लोग ऐसी विपत्तियों को देवी-देवताओं के प्रकोप से जोड़कर देखते थे। लगातार फैलती महामारी, अपनों की मृत्यु और चारों ओर व्याप्त भय ने लोगों के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया था कि यह किसी देवी का प्रकोप है। ऐसे में लोग देवी की पूजा-अर्चना करने लगे और उनसे महामारी से रक्षा की प्रार्थना करने लगे। इसी विश्वास और भय से जुड़ी कई कहानियाँ बघेली लोक परंपरा में भी प्रचलित हुईं। इन लोककथाओं में स्थानीय और क्षेत्रीय देवियों को महामारी फैलाने वाली हैजा और चेचक की देवियों से युद्ध करते हुए बताया गया है। मान्यता थी कि स्थानीय देवियाँ इन महामारी की देवियों को पराजित करके अपने खेर यानी गाँव और उसके क्षेत्र की रक्षा करती थीं।

महामारी को लेकर भैंसोखर मंदिर की लोककथा

ऐसी ही एक कथा रीवा जिले के टीकर गाँव स्थित भैंसोखर मंदिर से जुड़ी हुई है। कहते हैं, यह उस समय की बात है, जब महामारी की देवी इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहती थी। वह स्थानीय देवी के पास पहुँची और उससे केवल एक दिन के लिए उसके इलाके से गुजरने का रास्ता माँगा। लेकिन क्षेत्र की रक्षा करने वाली देवी ने उसकी यह माँग ठुकरा दी। उसने महामारी की देवी को अपने क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी।माना जाता है रास्ता देने से शुरू हुआ यह विवाद देखते ही देखते दोनों देवियों के बीच भीषण संघर्ष में बदल गया। एक ओर महामारी फैलाने वाली देवी थी, तो दूसरी ओर अपने क्षेत्र के लोगों की रक्षा के लिए खड़ी स्थानीय देवी। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। अंततः स्थानीय देवी ने महामारी की देवी को पराजित कर दिया और उसे अपने क्षेत्र से आगे बढ़ने से रोक दिया। लोकमान्यता के अनुसार, इस विजय के साथ ही देवी ने अपने इलाके को महामारी के प्रकोप से बचा लिया। आज भी टीकर गाँव के भैंसोखर मंदिर से जुड़ी यह कथा और लोकविश्वास अत्यंत प्रचलित है

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