Why Mamta Banerjee Lose Election : पश्चिम बंगाल ममता बनर्जी का किला धव्स्त हो गया है। विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने ममता दीदी की नींद उड़ाई दी है। भारतीय जनता पार्टी ने 294 में से 206 सीटें जीतकर पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। वहीं तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई। इस परिणाम ने बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
हार के बाद ममता बनर्जी बोली- वोट लूट हुई है
भाजपा के सुपर हीरो सुवेंदु अधिकारी ने तो साफ कह दिया है कि बंगाल में हिंदुओं की सरकार चलेगी। हिंदुओं के लिए काम करेंगे। जिसके बाद ममता बनर्जी के लिए हालात अपने ही राज्य में आम आदमी पार्टी जैसै होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतगणना प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि चुनाव में “वोट लूट” हुई है और चुनाव आयोग व केंद्र सरकार की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि 100 से अधिक सीटों पर अनैतिक तरीके से परिणाम प्रभावित किए गए।
ममता बनर्जी की हार के पांच फैक्टर
बंगाल में टीएमसी की इस हार के पीछे 5 बड़े फैक्टर जिम्मेदार हैं।
पहला फैक्टर – महिला सुरक्षा पर बीजेपी का सवाल खड़ना : बंगाल में टीएमसी सरकार ने महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं जैसे कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार और सबुज साथी चलाई थीं, जिससे एक बड़ा वोट बैंक तैयार हुआ था। लेकिन इस बार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में 2024 में हुए रेप-हत्या कांड और उसके बाद हुए आंदोलन ने जनता की भावनाओं को गहराई से प्रभावित किया। पानीहाटी जैसे पारंपरिक टीएमसी गढ़ में भी असर दिखा, जहां पीड़िता की मां रत्ना देवनाथ ने बीजेपी के टिकट पर बड़ी जीत दर्ज की।
दूसरा फैक्टर – एसआईआर : SIR प्रक्रिया ने बंगाल में चुनाव की प्रक्रिया ही बदल दी है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में लगभग 90 लाख नाम हटाए गए। इससे चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए। बीजेपी का दावा था कि फर्जी और मृत मतदाताओं के नाम हटने से टीएमसी को मिलने वाला फायदा खत्म हो जाएगा। विश्लेषकों के अनुसार, इस प्रक्रिया ने टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक को कमजोर किया।
तीसरा फैक्टर- ममता सरकार की प्रशासनिक विफलता : लगातार लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों ने टीएमसी का सारा खेल बिगाड़ दिया। पिछले 15 वर्षों के शासन में टीएमसी सरकार पर भ्रष्टाचार, कट-मनी, सिंडिकेट राज और प्रशासनिक लापरवाही के गंभीर आरोप लगे। हालांकि 2016 और 2021 में पार्टी ने कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार ये रणनीति प्रभावी नहीं रही।
चौथा फैक्टर- हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण : इस चुनाव में हिंदू वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में एकजुट होता दिखाई दिया। वहीं मुस्लिम वोट लगभग पूरी तरह टीएमसी के साथ रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह ध्रुवीकरण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बीजेपी के पक्ष में गया। इसका असर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में भी दिखा। शुभेंदु अधिकारी ने नतीजों के बाद इसे “हिंदुत्व की जीत” बताया।
पांचवा फैक्टर – ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं का बगावत करना और कांग्रेस से मुकाबला : कहीं न कहीं ये बंगाल में टीएमसी की हार का सबसे बड़ा हार का कारण माना जा सकता है कि बंगाल में भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और हिंदुत्व एजेंडे के सामने ममता बनर्जी अकेले ही चुनाव लड़ रही थी। विपक्षी दलों में इंडिया गठबंधन बनाने वाली कांग्रेस ने भी बंगाल में ममता बनर्जी का साथ देने के बजाय उनकी पार्टी के खिलाफ न सिर्फ चुनाव लड़ा बल्कि ममता बनर्जी पर लगातार कई आरोप भी लगाती रहीं। जिसका फायदा बीजेपी ने उठा लिया। यही नहीं ममता की पार्टी के बड़े और नामी नेता हिमायूं कबीर ने भी ममता के खिलाफ बगावत कर दी। जिससे मुस्लिम वोटर्स टीएमसी से बंट गए और सुवेंदु अधिकारी ने हिंदू वोट पहले ही काट दिए। शायद वही वजह रही कि ममता बनर्जी राज्य तो छोड़िए खुद अपनी सीट भवानीपुर भी नहीं बचा पाईं।
चुनाव परिणामों के बाद बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है, जबकि टीएमसी हार की समीक्षा में जुट गई है। विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि बीजेपी इसे जनता का “जनादेश” बता रही है। अब ममता के लिए मुशकिलें और भी बढ़ गई है। क्योंकि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद टीएमसी जांच के घेरे में आ सकती है।




