West Bengal Election : बंगाल की सरकार का सिंहासन इस बार उन 84 गलियों से होकर जाएगा जहां आदिवासियों और अनुसूचित जातियों की जमीन को लेकर बड़ा संघर्ष चल रहा है। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से, 68 एससी और 16 एसटी सीटें हैं, जो बंगाल की चुनावी राजनीति का तापमान तय कर रही हैं।
इन तीन सीटों पर सियासी तापमान बढ़ा
रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंगलमहल के पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम में बड़ी रैलियों को संबोधित किया। इन सीटों पर राजनीतिक तापमान तेज हो गया है और ये क्षेत्र अब सबसे अहम और अनिश्चित क्षेत्र बन चुके हैं। कभी वाम मोर्चा का मजबूत गढ़ रहे इन 84 सीटों पर अब दोनों बड़े दलों के बीच कड़ी टक्कर हो रही है।
कैसा रहा है इन सीटों का समीकरण?
2006 में वाम मोर्चा ने इन सीटों पर 72 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी। 2011 में बदलाव आया और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इन सीटों पर सेंध लगाई। उसने 41 एससी और 13 एसटी सीटें जीतकर 34 साल के वाम शासन को उखाड़ फेंका। फिर 2016 में, तृणमूल ने शानदार प्रदर्शन किया और सभी 16 एसटी और 50 एससी सीटें जीत लीं। लेकिन 2021 के चुनाव में स्थिति पलट गई। भाजपा ने इन सीटों पर कदम जमाने शुरू किए। भाजपा ने एससी सीटों पर 32 और एसटी पर 7 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल ने 36 एससी और 9 एसटी सीटें हासिल कीं। इसका साफ संकेत था कि आदिवासी और अनुसूचित जाति का बड़ा वर्ग भाजपा की तरफ झुका रहा है।
भाजपा के बड़े नेताओं ने इन सीटों पर झोंकी ताकत
प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने इन इलाकों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मोदी ने अस्मिता और भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया है, तो ममता बनर्जी अपने क्षेत्रीय गौरव और विकास के दावों के साथ मैदान में डटी हैं। मंगलवार को अभिषेक बनर्जी का झाड़ग्राम दौरा भी इसी बात का संकेत है कि सत्ताधारी पार्टी अपनी खोई हुई जमीन हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। भाजपा सीएए जैसे मुद्दों के जरिए मतुआ और राजबंशी समुदाय को अपने पक्ष में कर रही है, वहीं तृणमूल क्षेत्रीय अस्मिता और लक्ष्मी मइया के विकास के नाम पर पलटवार कर रही है।
बंगाल की इस सियासी रेस से कांग्रेस बाहर
यह भी हैरान कर देने वाली बात है कि इन इलाकों में कांग्रेस और वामपंथी दलों का सन्नाटा पसरा है। कांग्रेस का प्रभावशाली नेता इन क्षेत्रों में दिखाई नहीं दे रहा है। अब यह मुकाबला सीधे तौर पर मोदी की छवि बनाम ममता की योजनाओं का संघर्ष बन चुका है। 2021 में इन सीटों पर भाजपा का वोट शेयर 45 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो तृणमूल के लिए खतरे की घंटी थी। अगर विपक्षी गठबंधन के बीच खींचतान और स्थानीय मुद्दों का फायदा भाजपा को हुआ, तो यह क्षेत्र इतिहास रच सकता है।
इन तीन मुद्दों पर टिका है बंगाल का चुनाव
यहां खामोश गलियों, लाल मिट्टी और आदिवासी बहुल इलाकों में एक मतदाता खड़ा है, जो तय करेगा कि 2026 का बंगाल किसके सिर ताज सजाएगा। इस चुनावी महासंग्राम के तीन मुख्य मुद्दे हैं, जो सरकार के समीकरण बदल सकते हैं।
- पहला- विस्थापन का दंश : जिन आदिवासियों को 1947 से 2000 के बीच विस्थापित किया गया, उनकी पीड़ा आज भी चुनावी मुद्दा है।
- दूसरा- फर्जी प्रमाणपत्र और कुड़मी आंदोलन : जिसमें कुड़मी समुदाय को एसटी का दर्जा देने की मांग है, और फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के खिलाफ संताल समुदाय का गुस्सा फूट रहा है।
- तीसरा – विकास की खाई : चाय बागानों में काम करने वाले दलित और आदिवासी कर्मचारी, जिनकी आय राज्य के औसत से बहुत कम है, यह आर्थिक असमानता चुनाव का बड़ा मुद्दा बन रही है।
अब देखना यह है कि इन चुनावी मुकाबले में कौन बाजी मारेगा, कौन हार जाएगा। बंगाल की इस नई जंग का फैसला इन 84 सीटों के मतदाता ही करेंगे। यह था बंगाल के इस खास चुनावी संघर्ष का विश्लेषण। पूरा देश बेसब्री से इंतजार कर रहा है कि आखिरकार कौन बनेगा बंगाल का अगला मुख्यमंत्री और किसके सिर सजेगा इस बार का ताज।




