West Bengal Election 2026 : बंगाल में वोटिंग का इतिहास समझें, कब हुआ था सबसे अधिक मतदान 

West Bengal Election 2026 : आज पश्चिम बंगाल में पहले चरण की वोटिंग में बंपर मतदान हुआ। शाम 6 बजे तक 80 फीसदी से अधिक वोटिंग हो चुकी है। जिससे मतदान के परिणाम का अंदाजा लगना शुरू हो गया है। ममता बनर्जी के राज्य पश्चिम बंगाल की राजनीति और वहां के मतदाताओं का मिजाज हमेशा से विश्लेषकों के लिए रुचि का विषय रहा है। राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि जब-जब मतदान का प्रतिशत बहुत बढ़ा है, तब-तब सरकार में बड़े बदलाव हुए हैं।

बंगाल में बदलाव का बज गया बिगुल 

राजनीतिक विशेषज्ञ की मानें तो जब भी किसी राज्य में बड़े स्तर पर वोटिंग होती है तो वह बड़े बदलाव का संकेत होता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो, सरकार का लंबे समय तक टिके रहना आमतौर पर मतदाताओं की उदासीनता पर निर्भर करता है। इस बार पहले चरण के मतदान में जनता ने बढ़-चढ़ कर वोट डालें हैं। कड़ी धूप में भी लोग लंबी कतारों में दिखाई दिये। ये बंगाल में बदलाव का संकेत हो सकता है। 

2026 से पहले 1960 में दिखी थी ऐसी लहर 

बंगाल में इस तरह का पैटर्न 1960 के दशक से शुरू हुआ। 1962 में, जब कांग्रेस का दबदबा था, तब मतदान सिर्फ 53% था। लेकिन 1967 में, जब यूनाइटेड फ्रंट उभरा, तो मतदान बढ़कर 62.5% हो गया। साथ ही सरकार भी बदल गई। तब से ही माना जाने लगा कि जब मतदान ज्यादा होता है, तो सरकार भी बदलती है।  

1977 में पलट गया था सभी का खेल 

हालांकि, 1977 का चुनाव एक अपवाद है। उस समय मतदान केवल 55.2% था, फिर भी लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कम मतदान नहीं था, बल्कि उस समय के आपातकाल और डर के माहौल की वजह से था। उसके बाद, 1982 तक मतदान 75.1% तक पहुंच गया, जिससे लेफ्ट फ्रंट की सरकार मजबूत हुई।  

2011 में हुआ था इतिहास का सबसे अधिक मतदान 

2011 का चुनाव सबसे खास रहा। उस वक्त 84.5% मतदान हुआ, जो इतिहास में सबसे अधिक था। उस समय भूमि अधिग्रहण के विवादों के कारण जनता में भारी असंतोष था। इस वजह से लेफ्ट का शासन खत्म हुआ और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापस आई।  2011 के बाद से, बंगाल का मतदाता बहुत ही जागरूक और सक्रिय हो गया है।

बता दें कि 2016 और 2021 के चुनावों में भी मतदान 80% से ऊपर रहा है। अब चर्चा हो रही है कि 2026 में भी यही रुझान देखने को मिलेगा या नहीं। क्या विपक्षी दल इस बड़ी भागीदारी का फायदा उठा पाएंगे?  

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