सुवेंदु अधिकारी की कहानी: नंदीग्राम की गलियों से सत्ता के शिखर तक

Story Of Suvendu Adhikari: किसने सोचा था… कि कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में गिना जाने वाला एक नेता, एक दिन उन्हीं की सत्ता का अंत करने वाला सबसे बड़ा चेहरा बन जाएगा? किसने सोचा था…कि नंदीग्राम की गलियों में किसानों के बीच रातें गुजारने वाला एक जमीनी कार्यकर्ता… आज पश्चिम बंगाल का पहला भाजपाई मुख्यमंत्री (Suvendu Adhikari Bengal CM) बन जाएगा। ये कहानी है… सुवेंदु अधिकारी की। उस नेता की… जिसने कभी ममता बनर्जी के लिए बंगाल की जमीन तैयार की… और फिर उसी जमीन पर बीजेपी (BJP) का कमल खिला दिया।

सुवेंदु अधिकारी की जीवनी

Biography Of Suvendu Adhikari: 15 दिसंबर 1970… पूर्वी मेदिनीपुर का कांथी इलाका, एक ऐसा परिवार, जिसका राजनीति में दशकों से दबदबा रहा। सुवेंदु अधिकारी का जन्म शिशिर अधिकारी (Shishir Adhikari) के घर हुआ. तब शिशिर अधिकारी, बंगाल की राजनीति के बड़े नेता थे, कई बार सांसद बनें। अधिकारी परिवार का मेदिनीपुर और बंगाल की राजनीति में दबदबा था.

लिहाजा राजनीति, सुवेंदु ने किताबों से नहीं सीखी… उन्होंने राजनीति घर के माहौल से सीखी… लोगों के बीच रहकर सीखी और संघर्ष देखकर सीखी। 1989 में उन्होंने कांग्रेस की छात्र परिषद से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। उस दौर में पूरे बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था। ऐसे माहौल में विपक्षी छात्र नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन सुवेंदु भीड़ में खोने वालों में नहीं थे।

सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर

Suvendu Adhikari Political Journey: फिर आया 1998… जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई… और अधिकारी परिवार उनके साथ खड़ा हो गया। उस समय ममता को ऐसे नेताओं की जरूरत थी जो गांव-गांव जाकर संगठन को मजबूत बना सकें
और सुवेंदु ने यही किया। पूर्वी मेदिनीपुर से लेकर नंदीग्राम तक…उन्होंने टीएमसी को जमीनी ताकत देने में बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन… सुवेंदु अधिकारी की असली पहचान बनी साल 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से। जब वाम सरकार किसानों की जमीन अधिग्रहित करना चाहती थी…तब नंदीग्राम में विरोध की आग भड़क उठी। ममता बनर्जी कोलकाता और दिल्ली में आंदोलन की आवाज बुलंद कर रही थीं… लेकिन गांवों की पगडंडियों पर… किसानों के बीच… पुलिस और काडर के डर के सामने जो चेहरा सबसे ज्यादा दिखाई देता था… वो था सुवेंदु अधिकारी।

उन्होंने ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी’ बनाई। रातों को गांवों में रुकते… किसानों से स्थानीय भाषा में बात करते…
लोगों को भरोसा दिलाते कि उनकी जमीन बचाई जाएगी।

14 मार्च 2007…जब नंदीग्राम में गोली चली… लोग मारे गए… पूरा बंगाल दहल गया…लेकिन सुवेंदु पीछे नहीं हटे। घायलों की मदद की… आंदोलन को टूटने नहीं दिया… और यही आंदोलन आगे चलकर 34 साल पुरानी वाम सरकार के पतन की सबसे बड़ी वजह बना।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2011 में ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने वाले सबसे अहम जमीनी चेहरों में सुवेंदु अधिकारी का नाम जरूर शामिल था। लेकिन राजनीति… सिर्फ साथ निभाने की कहानी नहीं होती।
यहां दोस्ती भी बदलती है… और रास्ते भी। समय बीता…और टीएमसी में सुवेंदु अधिकारी की नाराजगी बढ़ने लगी। उन्हें लगने लगा कि पार्टी में उनकी भूमिका सीमित की जा रही है। सुवेंदु ने अपना रास्ता अलग कर लिया और बीजेपी के साथ मिल गए.

जब सुवेंदु ने ममता को हराया

फिर आया 2021 का चुनाव…और बंगाल की राजनीति ने सबसे बड़ा मोड़ देखा। ममता बनर्जी ने अपनी सुरक्षित भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया और उनके सामने थे… उनके ही पुराने साथी… सुवेंदु अधिकारी। पूरा देश देख रहा था। ये सिर्फ चुनाव नहीं था… ये भरोसे और बगावत की लड़ाई थी. और जब नतीजे आए… तो नंदीग्राम ने ममता नहीं… सुवेंदु को चुना।

यहीं से बंगाल की राजनीति में बीजेपी के सबसे बड़े बंगाली चेहरे का उदय हुआ। सुवेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता बने…और उन्होंने ममता सरकार को लगातार घेरना शुरू किया। संदेशखाली… आरजी कर अस्पताल… भ्रष्टाचार… कानून व्यवस्था… हर मुद्दे पर सुवेंदु आक्रामक नजर आए। लेकिन सिर्फ राजनीति नहीं…
उन्होंने बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति को भी नई धार दी। जय श्रीराम के नारों से लेकर दुर्गा पूजा और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान तक… सुवेंदु ने बीजेपी की विचारधारा को बंगाल की जमीन से जोड़ने की कोशिश की।

दिलचस्प बात ये भी है कि सुवेंदु अधिकारी ने शादी नहीं की। उन्होंने खुद को पूरी तरह राजनीति के लिए समर्पित कर दिया। उनके भाई सौमेंदु अधिकारी भी बीजेपी में हैं… जबकि परिवार के दूसरे सदस्य लंबे समय तक टीएमसी से जुड़े रहे।

सुवेंदु अधिकारी ने अपनों को खोया

इस राजनीति में सुवेंदु अधिकारी ने कई करीबियों को हमेशा के लिए खो भी दिया। 2013 में उनके PA प्रदीप का शव फंदे में लटका मिला, 2018 में उनके बॉडीगार्ड सुभब्रत की हत्या कर दी गई, 2021 में ड्राइवर पुलक को मार दिया गया और जब सुवेंदु अधिकारी बंगाल के सीएम की कुर्सी पर बैठने जा रहे थे तो उनके भाई जैसे हमसाए PA चन्द्रनाथ रथ की बेरहमी से हत्या कर दी गई. एक तरफ ममता बनर्जी की क्रूर सरकार को उखाड़ फेकने का जश्न मनाया जा रहा है, सुवेंदु अधिकारी की ताजपोशी की तैयारी चल रही है और उधर वे अपने सबसे करीबी शख्स के अंतिम संस्कार में फूट फूट कर रो रहे हैं.

और शायद… यही राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई भी है। सत्ता मिलती है… ताज पहनाए जाते हैं… नारे लगते हैं… जुलूस निकलते हैं. लेकिन उन नारों के पीछे… एक ऐसा आदमी भी खड़ा होता है, जिसने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए सिर्फ राजनीतिक लड़ाइयां नहीं लड़ीं… बल्कि निजी जिंदगी में भी बहुत कुछ खोया। आज…
जब पश्चिम बंगाल पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री देखने जा रहा है… तो नंदीग्राम का वही नेता…
जिसने कभी गांवों की कच्ची सड़कों पर किसानों के साथ आंदोलन किया था…वही अब सत्ता के सबसे बड़े शिखर पर खड़ा है। और अब… बंगाल की जनता जो दशकों से सत्ता पोषित गुंडों और दंगाइयों के खौफ में जी रही थी उन्हें उम्मीद की नई किरण सुवेंदु अधिकारी में दिखाई दे रही है.

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