Rewa Raksha Bandhan History: भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व रक्षाबंधन पूरे भारत के साथ-साथ रीवा और विंध्य क्षेत्र की संस्कृति में भी विशेष महत्व रखता है। और बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। क्या आप जानते हैं, कभी रीवा में रक्षाबंधन के दिन प्रजा अपने महाराजा की कलाई पर राखी बांधा करती थी? तो आइए आज जानते हैं रीवा के राखी पर्व और परंपराओं के बारे में।
श्रावणी पर्व और वैदिक परंपरा
जीतन सिंह जी की पुस्तक रीवा राज्य दर्पण के अनुसार, मूलतः विंध्य और बघेलखंड में यह पर्व ब्राह्मण समुदाय द्वारा मनाया जाता था, क्योंकि इसका संबंध श्रावणी पर्व से था। श्रावणी एक प्राचीन वैदिक परंपरा थी, जिसमें विद्यार्थी इसी दिन से अध्ययन का प्रारंभ करते थे। वैदिक काल में आचार्य श्रावणी उपाकर्म के बाद अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधकर अपने शिष्यों को एक प्रकार से वचनबद्ध करते हुए उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार किया करते थे। वहीं रविरंजन सिंह जी की पुस्तक अब और तब रीवा के अनुसार, रक्षाबंधन मूलतः ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा अपने यजमानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर मनाया जाता था।
रीवा महाराज को पुरोहित बांधते थे राखी
समय के साथ रक्षाबंधन की यह परंपरा राजपरिवार और रीवा रियासत के सामाजिक जीवन से भी जुड़ गई। रीवा रियासत के इतिहास और परंपराओं के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन रीवा के किले में तत्कालीन महाराजाओं का विशेष दरबार सजता था। इस अवसर पर सबसे पहले राजगुरु और कुल पुरोहित द्वारा महाराजा की कलाई पर अभिमंत्रित रक्षा सूत्र, यानी राखी, बांधते थे। इसके बाद राजपरिवार के अन्य सदस्यों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा जाता था।
प्रजा भी बांधती थी महाराज को राखी
इसके बाद राज्य के सामंतों और दूसरे राज्याधिकारियों को भी रक्षा सूत्र बांधकर उनसे राज्य की सुरक्षा और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहने की कामना की जाती थी। चूंकि राजा को प्रजा का पालक और रक्षक माना जाता है जिसके कारण इस उत्सव में राजधानी के निवासी प्रजाजन भी शामिल होते और महाराज के हाथ में रक्षासूत्र बांधते थे उनकी दीर्घायु की कामना करते थे। रीवा के इतिहासकार असद खान बताते हैं- महाराज रघुराज सिंह के समय से प्रारंभ हुई यह परंपरा महाराज व्यंकट रमण सिंह और महाराज गुलाब सिंह से होते हुए महाराज मार्तंड सिंह के समय तक चलती ही रही। पहले महाराज द्वारा भगवान महामृत्युंजय की पूजा अर्चना की जाती थी और दरबार हाल में आकर महाराज बैठते और प्रजाजनों द्वारा उनके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा जाता था।
रानी अजब कुंवरि ने बांधी थी लमानों को राखी
राखी के पर्व को लेकर रीवा में एक ऐतिहासिक कथा भी मिलती है, जिसका संबंध रीवा के महाराज भाव सिंह की पत्नी महारानी अजब कुंवरि से संबंधित है। महारानी मेवाड़-उदयपुर के महाराणा राज सिंह की पुत्री थीं और उनका विवाह रीवा के महाराज भाव सिंह के साथ हुआ था। उस समय रीवा और आसपास के क्षेत्र में नमक का व्यापार करने वाले बंजारा समुदाय के लोग आया-जाया करते थे। इन्हें इस क्षेत्र में ‘लमाना’ कहा जाता था। राजपूताना से सबंधित होने के कारण इन लमाना बंजारों का महारानी अजब कुंवरि के साथ एक आत्मीय रिश्ता स्थापित हुआ और वे उन्हें अपनी बहन मानकर उनसे राखी बंधवाया करते थे। लोकपरंपरा के अनुसार, महारानी के आग्रह पर इन्हीं बंजारों ने लोकहित के लिए अपने श्रम से रीवा में एक तालाब का निर्माण किया और उसे महारानी को समर्पित कर दिया। यही तालाब आज ‘रानी तालाब’ के नाम से जाना जाता है।
कर्नल टॉड ने भी किया राखी का जिक्र
हालांकि रानी तालाब के निर्माण को लेकर इतिहासकारों के मत भिन्न हैं, लेकिन महारानी अजब कुंवरि और लमाना बंजारों के बीच राखी की कथा को पूरी तरह निराधार नहीं माना जा सकता है। क्योंकि इस परंपरा के पीछे तत्कालीन राजपूताना की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी दिखाई देता है। राजपूताना की रियासतों में राजनीतिक एजेंट के रूप में कार्य कर चुके कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी 1829 में प्रकाशित पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान’ में राजपूत समाज की एक ऐसी परंपरा का उल्लेख किया है, जिसमें स्त्रियां ‘कंगन’ नामक एक पर्व मनाती थीं। इस अवसर पर वे किसी पुरुष को रक्षा सूत्र बांधकर अपना मुंहबोला भाई बना लेती थीं और बदले में वह पुरुष उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध माना जाता था।
रीवा और राजपूताना के वैवाहिक संबंध
अब चूंकि महारानी स्वयं उस क्षेत्र से संबंध रखती थीं, इसीलिए इसमें कोई दोराय नहीं कि महारानी अजब कुंवर द्वारा इसी परंपरा का पालन करते हुए बंजारों को राखी बांधी गई होगी। इसके अलावा रीवा राजपरिवार के वैवाहिक संबंध केवल मेवाड़ तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि राजपूताना की जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और बूंदी जैसी रियासतों से भी वैवाहिक संबंध बने हुए थे। ऐसे संबंधों के माध्यम से वहां की कई परंपराओं का प्रभाव रीवा तक पहुंचना स्वाभाविक था। संभवतः ऐसे सांस्कृतिक मेल और विभिन्न क्षेत्रों की परंपराओं के एक-दूसरे से जुड़ने के कारण रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा पूरे देश के साथ-साथ रीवा और बघेलखंड के सामाजिक जीवन में भी अपना स्थान बनाती गई।
रक्षासूत्र से भाई-बहन के प्रेम तक
हालांकि उस समय राखी का स्वरूप आज के भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं था, बल्कि यह रक्षा, विश्वास, सामाजिक संबंध और पारस्परिक दायित्व का प्रतीक भी थी, जिसका उल्लेख हमारी पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। लेकिन बाद के काल में यही परंपरा धीरे-धीरे जनसमुदाय में भाई-बहन के स्नेह और प्रेम के पर्व के रूप में लोकप्रिय होती चली गई और रक्षाबंधन ने अपने वर्तमान स्वरूप ग्रहण कर लिया।




