भारत के राज्यसभा अध्यक्ष ने वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे के अवसर पर कहा कि Autistic व्यक्तियों को केवल समाज में सहन करना पर्याप्त नहीं होता है उन्हें समान अवसर और सशक्त बनाने के लिए शिक्षा कौशल और रोजगार के मौके भी मिलनी चाहिए। राज्यसभा के अध्यक्ष ने यह भी बताया कि उनके लिए भी कानून मौजूद है लेकिन उनका वास्तविक क्रियान्वन होना बहुत जरूरी है।

Autistic व्यक्तियों का सशक्तिकरण क्यों माना गया जरूरी
राज्यसभा अध्यक्ष ने जोर देकर बताया कि ऑटिज्म केवल एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति नहीं होती है बल्कि मानव विविधता का ही एक हिस्सा होता है। उन्होंने कहा कि Autistic व्यक्तियों को सिर्फ स्वीकार करने के बजाय उन्हें शिक्षा कौशल और रोजगार के भी हमें अवसर देने चाहिए इससे वह समझ में आत्मनिर्भर बनकर जी पाएंगे।
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Autistic व्यक्ति के लिए कानून और नीतियां मौजूद हैं
हमारे भारत में राइट ऑफ पर्सन विद डिसेबिलिटीज एक्ट 2016 और नेशनल ट्रस्ट 1999 जैसे कानून Autistic व्यक्तियों के अधिकार को ही सुरक्षित करते हैं। लेकिन राज्यसभा के अध्यक्ष ने स्पष्ट बताया कि केवल कानून बनाने से ही काम नहीं होता है असली बदलाव तब आएगा जब हम इन सभी अधिकारों का लाभ सभी ऑटिस्टिक व्यक्तियों तक पहुंच पाएंगे और उनके जीवन में वास्तविक सुधार ला पाएंगे।
Autistic व्यक्ति के शिक्षा और कौशल विकास पर ध्यान
अध्यक्ष ने कहा कि स्कूल और कॉलेज में समावेशी शिक्षा बहुत जरूरी है और जिला छात्रों को उनकी क्षमताओं के अनुसार शिक्षा और प्रशिक्षण देकर सशक्त बनाना चाहिए साथ ही उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के जरिए रोजगार के अवसर देने से वह समाज में सम्मानजनक और आत्मनिर्भर भूमिका निभा पायेंगे।
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क्या है समाज की जागरूकता और जिम्मेदारी
राज्यसभा के अध्यक्ष ने सभी भारत की नागरिकों से अपील की कि वह Autistic व्यक्तियों को समझें और उनके साथ सहानुभूति दिखाकररहे। उन्होंने कहा कि जागरूकता बढ़ाने और सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए हमें कई सामुदायिक पहला और कार्यक्रम करने होंगे केवल सहनशीलता से काम नहीं चलेगा एक सक्रिय समर्थन और अवसर प्रदान करना ही सच्चा समावेशन होगा।




