भारतीय शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, व्यावहारिक और समावेशी बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत कई ऐतिहासिक बदलाव किए जा रहे हैं। इन्हीं बदलावों में से एक प्रमुख पहल है—स्कूली शिक्षा में ‘तीन-भाषा फॉर्मूला’ (Three-Language Formula) को प्रभावी ढंग से लागू करना। हालांकि, हाल ही में संसद में पेश की गई एस्टीमेट्स कमेटी (2026-27) की दसवीं रिपोर्ट ने इस नीति के क्रियान्वयन की गति और तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
संसदीय समिति का मानना है कि कक्षा 6 से तीसरी भाषा शुरू करने का फैसला तो सही दिशा में है, लेकिन इसके लिए स्कूलों को पर्याप्त समय और संसाधन नहीं दिए गए। नतीजा यह हुआ कि देश के विभिन्न स्कूलों, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों पर अचानक एक अतिरिक्त दबाव बन गया है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि इस रिपोर्ट में शिक्षा मंत्रालय की कोशिशों, स्कूलों की व्यावहारिक चुनौतियों और समिति के सुझावों के बारे में क्या बातें सामने आई हैं।
संसदीय समिति (Estimates Committee) की रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए?
लोकसभा में पेश की गई एस्टीमेट्स कमेटी की रिपोर्ट का मुख्य विषय “देश में सस्ती और अच्छी शिक्षा देने के लिए बजट और नीतिगत पहलुओं, जिसमें सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) की समीक्षा भी शामिल है” पर आधारित है।
इस रिपोर्ट में समिति ने स्पष्ट किया कि जब कोई नया भाषाई फॉर्मूला लागू किया जाता है, तो उसके लिए जमीनी स्तर पर प्रशासनिक और अकादमिक तैयारी अनिवार्य होती है। समिति के अनुसार, शिक्षा मंत्रालय ने यह आकलन करने में चूक की कि अचानक कक्षा 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य करने पर अध्ययन सामग्री, शिक्षक प्रशिक्षण और स्टाफ की मांग में कितना उछाल आएगा।
कक्षा 6 से तीसरी भाषा लागू करने में जल्दबाजी का आरोप
समिति ने कहा कि स्कूलों को इस नई व्यवस्था को अपनाने के लिए जितना समय चाहिए था, वह नहीं मिला। अचानक भाषा चुनने का विकल्प देने और उपयुक्त भाषा शिक्षकों की उपलब्धता न होने के कारण स्कूल प्रशासन भ्रमित रहा, जिसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई और मानसिक तनाव के रूप में देखने को मिला।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और तीन-भाषा फॉर्मूला
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का एक मूल उद्देश्य बहुभाषी शिक्षा (Multilingual Education) को प्रोत्साहन देना है। शोध बताते हैं कि शुरुआती और माध्यमिक स्तर पर बच्चा यदि अपनी मातृभाषा या विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के संपर्क में आता है, तो उसका संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास तेजी से होता है।
मातृभाषा और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयास
संसदीय समिति ने स्वीकार किया कि शिक्षा मंत्रालय ने इस दिशा में कई सराहनीय कदम उठाए हैं। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर R1, R2, और R3 भाषा व्यवस्था को स्थापित करने में प्रगति हुई है।
22 भाषाओं में किताबों का अनुवाद और ई-कंटेंट की स्थिति
मंत्रालय द्वारा किए गए प्रमुख सुधारों में शामिल हैं:
- किताबों का अनुवाद: गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे जटिल विषयों की पाठ्यपुस्तकों का संविधान की 22 अनुसूचित भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
- ब्रिज कोर्स और ई-कंटेंट: नए पाठ्यक्रम के अनुसार छात्रों को ढलने में मदद करने के लिए डिजिटल सामग्री तैयार की गई है।
- जादुई पिटारा (Jaadui Pitara): खेल-खेल में सीखने वाली 22 भाषाओं की विशेष शिक्षण किट।
- भाषा संगम (Bhasha Sangam): पूरे देश में विभिन्न भारतीय भाषाओं की बुनियादी जानकारी देने वाला एक अनूठा कार्यक्रम।
- मातृभाषा की शुरुआती किताबें: सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेस (CIIL) के सहयोग से 121 मातृभाषाओं की शुरुआती किताबें (Primers) तैयार की गई हैं।
स्कूलों, शिक्षकों और छात्रों के सामने मुख्य चुनौतियां क्या हैं?
इतने सारे संसाधन और योजनाएं होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर शिक्षा का ढांचा इस नीति को संभालने में संघर्ष कर रहा है। संसदीय समिति ने निम्नलिखित तीन मुख्य चुनौतियों को रेखांकित किया है:
1. भाषा शिक्षकों (Staff) की भारी कमी
किसी भी नई भाषा को सिखाने के लिए योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में, कई राज्यों के स्कूलों में क्षेत्रीय या तीसरी भाषा के स्थायी शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। अचानक नियम लागू होने से स्कूलों के पास योग्य संकाय चुनने का समय ही नहीं बचा।
2. अध्ययन सामग्री और टेक्स्टबुक्स की अनुपलब्धता
यद्यपि अनुवाद कार्य हुआ है, लेकिन सत्र की शुरुआत में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में ये पुस्तकें समय पर नहीं पहुंच पातीं। हैंडबुक, वर्कबुक और सहायक सामग्री की कमी से कक्षा में पढ़ाई बाधित हो रही है।
3. भाषा चुनने को लेकर असमंजस और मानसिक तनाव
छात्रों और अभिभावकों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई कि उन्हें कौन सी तीसरी भाषा चुननी चाहिए और उस भाषा का भविष्य के करियर या अकादमिक मूल्यांकन में क्या योगदान होगा। स्पष्टता की इस कमी ने छात्रों और शिक्षकों दोनों में अनावश्यक तनाव पैदा किया।
केंद्रीय विद्यालयों और अन्य सरकारी संस्थानों का वर्तमान मॉडल
संसदीय रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) जैसे प्रमुख संस्थानों ने इस चुनौती से निपटने के लिए एक अस्थायी रास्ता निकाला। KVS ने स्थानीय भाषाओं के लिए कॉन्ट्रैक्ट-आधारित (अनुबंध आधारित) भाषा शिक्षकों को नियुक्त कर पढ़ाई-लिखाई की प्रक्रिया को जारी रखने में मदद की।
हालांकि, यह एक अल्पकालिक समाधान है। पूरे देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में शिक्षा के समान स्तर को बनाए रखने के लिए स्थायी और दीर्घकालिक कदम उठाने की जरूरत है।
संसदीय समिति ने शिक्षा मंत्रालय को क्या सलाह दी?
समिति ने यह साफ किया कि नीति की मंशा पर कोई सवाल नहीं है, लेकिन इसके क्रियान्वयन (Implementation) की रणनीति में सुधार आवश्यक है। समिति द्वारा दी गई मुख्य सिफारिशें निम्नलिखित हैं:
- अनुवाद कार्य में तेजी: मंत्रालय टेक्स्टबुक, स्टडी मटेरियल और टीचर हैंडबुक का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद का काम जल्द से जल्द पूरा करे और इसे राज्यों के साथ साझा करे।
- शिक्षक भर्ती में राज्यों की मदद: राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों को आर्थिक व नीतिगत सहायता दी जाए, ताकि वे शुरुआती और तैयारी के चरणों के लिए मातृभाषा व भाषा शिक्षकों की समय पर भर्ती कर सकें।
- मजबूत राज्य-वार वितरण योजना: एक पारदर्शी और प्रभावी आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बनाई जाए, ताकि हर शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही अनुवादित पुस्तकें, ‘जादुई पिटारा’ किट और ई-कंटेंट हर ग्रामीण व दूरस्थ स्कूल तक पहुंच जाएं।
निष्कर्ष (Conclusion)
बहुभाषी शिक्षा भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए अत्यंत लाभकारी है और NEP 2020 का तीन-भाषा फॉर्मूला बच्चों के भाषाई कौशल को निखारने का एक बेहतरीन माध्यम है। लेकिन, बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित शिक्षकों और अध्ययन सामग्री के किसी भी नीति को जबरन लागू करना शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। संसदीय समिति की यह रिपोर्ट सरकार और शिक्षा मंत्रालय के लिए एक चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है। यदि समय रहते शिक्षकों की भर्ती और पुस्तकों का समयबद्ध वितरण सुनिश्चित कर लिया जाए, तो यह योजना देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. संसदीय समिति ने तीसरी भाषा नीति को लेकर क्या चिंता जताई है?
उत्तर: संसदीय समिति ने कहा कि कक्षा 6 से तीसरी भाषा लागू करने के लिए स्कूलों को पर्याप्त समय नहीं दिया गया। भाषा शिक्षकों की कमी, अध्ययन सामग्री की अनुपलब्धता और भाषा चयन को लेकर स्पष्टता न होने से छात्रों, अभिभावकों और स्कूल प्रशासन पर तनाव बढ़ा है।
Q2. NEP 2020 के तहत तीन-भाषा फॉर्मूला क्या है?
उत्तर: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का तीन-भाषा फॉर्मूला स्कूलों में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देता है। इसके तहत छात्रों को मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ दो अन्य भारतीय या विदेशी भाषाओं को सीखने का अवसर दिया जाता है, जिससे उनकी भाषाई और संज्ञानात्मक क्षमता का विकास हो सके।
Q3. क्या शिक्षा मंत्रालय ने क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार की है?
उत्तर: हां, शिक्षा मंत्रालय ने गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की किताबों का 22 अनुसूचित भाषाओं में अनुवाद किया है। इसके अलावा 121 मातृभाषाओं की शुरुआती किताबें (Primers), ‘जादुई पिटारा’ किट, ब्रिज कोर्स और ‘भाषा संगम’ जैसे डिजिटल और भौतिक संसाधन विकसित किए गए हैं।
Q4. स्कूलों में भाषा शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
उत्तर: केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) जैसे संस्थानों ने अस्थायी रूप से कॉन्ट्रैक्ट-आधारित स्थानीय भाषा शिक्षकों की भर्ती की है। संसदीय समिति ने सलाह दी है कि केंद्र सरकार राज्यों को स्थायी भाषा शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में मदद करे ताकि पढ़ाई प्रभावित न हो।
Q5. संसदीय समिति ने सुधार के लिए क्या मुख्य सुझाव दिए हैं?
उत्तर: समिति ने सिफारिश की है कि सत्र शुरू होने से पहले सभी अनुवादित पुस्तकें और किट ग्रामीण व सरकारी स्कूलों तक पहुंचनी चाहिए। साथ ही राज्यों को शिक्षक भर्ती में मदद देने और पाठ्यसामग्री के तेजी से अनुवाद के लिए एक मजबूत वितरण योजना बनाने का सुझाव दिया गया है।
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