MP: मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव, 24 हजार से अधिक जनजातीय स्कूलों का शिक्षा विभाग में होगा विलय

MP Tribal Schools Merger News: मध्य प्रदेश सरकार शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसके तहत जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित स्कूलों को भी स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन लाने की तैयारी की जा रही है, ताकि राज्य की पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक ही विभाग के नियंत्रण में संचालित हो सके। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग ने कैबिनेट के लिए प्रस्ताव तैयार कर लिया है, हालांकि अंतिम निर्णय से पहले जनजातीय कार्य विभाग और वित्त विभाग का अभिमत प्राप्त किया जाना बाकी है।

MP Tribal Schools Merger News: मध्य प्रदेश सरकार राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक बदलाव करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मंशा के अनुरूप अब प्रदेश की पूरी School Education System को एक ही विभाग के अधीन लाने की दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। इसके तहत जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित 24,196 स्कूलों का चरणबद्ध तरीके से स्कूल शिक्षा विभाग में विलय (Merger) किया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार, इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग ने कैबिनेट के लिए प्रस्ताव तैयार कर लिया है। प्रस्ताव को अभिमत (Opinion) के लिए जनजातीय कार्य विभाग को भेजा जा रहा है। दोनों विभागों की सहमति के बाद मामला वित्त विभाग और फिर कैबिनेट के समक्ष अंतिम निर्णय के लिए रखा जाएगा।

क्यों लिया जा रहा है यह फैसला?

राज्य सरकार का मानना है कि वर्तमान में स्कूल शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग अलग-अलग स्कूलों का संचालन कर रहे हैं, जिससे प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियां सामने आती हैं। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में Uniformity, बेहतर Administrative Control और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित हो। सरकार का तर्क है कि जब तक स्कूलों का संचालन अलग-अलग विभागों के अधीन रहेगा, तब तक नीतियों और निर्देशों का एक समान क्रियान्वयन संभव नहीं हो पाएगा। इसी कारण पूरे स्कूल शिक्षा तंत्र को एक विभाग के अधीन लाने की योजना बनाई गई है।

आदिवासी क्षेत्रों के लिए बनाई गई थी अलग व्यवस्था

प्रदेश के 89 आदिवासी विकासखंडों में शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी पहले जनजातीय कार्य विभाग को इस उद्देश्य से सौंपी गई थी कि आदिवासी छात्रों की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जा सके। उम्मीद थी कि इससे आदिवासी समुदाय को बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलेंगे। हालांकि, समय के साथ यह व्यवस्था अलग प्रशासनिक ढांचे के रूप में विकसित हो गई। कई मामलों में शिक्षक उसी विभागीय संरचना तक सीमित रह गए, जिससे स्थानांतरण और संसाधनों के बेहतर उपयोग में कठिनाइयाँ आईं। सरकार का मानना है कि इसका असर शिक्षा की गुणवत्ता (Quality Education) पर भी पड़ा।

ऐसे आगे बढ़ेगी मर्जर की प्रक्रिया

सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी स्कूलों का विलय एक साथ नहीं किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से लागू होगी।
पहले चरण में जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों का प्रशासनिक नियंत्रण स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन लाया जाएगा। इसके बाद स्कूलों में लागू होने वाले दिशा-निर्देश, शैक्षणिक नीतियां और अन्य व्यवस्थाएं स्कूल शिक्षा विभाग के अनुसार संचालित होंगी। नई शिक्षक भर्तियां भी भविष्य में स्कूल शिक्षा विभाग के माध्यम से की जाएंगी। वहीं, कर्मचारियों और शिक्षकों की वर्तमान स्थापना (Establishment) को लेकर अलग प्रक्रिया तैयार की जाएगी क्योंकि दोनों विभागों के भर्ती नियम और सेवा शर्तें पूरी तरह समान नहीं हैं।

जिला स्तर पर बनेगी कमेटी

मर्जर प्रक्रिया के दौरान विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं की समीक्षा के लिए जिला स्तर पर समितियां गठित की जाएंगी। ये समितियां सेवा नियमों, लंबित न्यायालयीन मामलों (Court Cases) और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों का परीक्षण करेंगी ताकि विलय प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा न आए।

सरकार के सामने आसान नहीं है राह

विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य विभागीय पुनर्गठन की तुलना में यह प्रक्रिया कहीं अधिक संवेदनशील है। चूंकि मामला आदिवासी समुदाय और उनसे जुड़ी शैक्षणिक व्यवस्थाओं का है, इसलिए सरकार को बेहद सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। अभी प्रक्रिया शुरुआती चरण में है, लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं।

कांग्रेस और आदिवासी संगठनों ने जताई आपत्ति

धार जिले की मनावर विधानसभा सीट से विधायक और जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन (JAYS) से जुड़े डॉ. हिरालाल अलावा ने प्रस्तावित मर्जर का विरोध किया है। उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा और विकास को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ही जनजातीय कार्य विभाग की स्थापना की गई थी। उन्होंने कहा कि विभाग के माध्यम से संचालित स्कूलों को केंद्र सरकार से विशेष वित्तीय सहायता (Special Funding) प्राप्त होती है। यदि इन स्कूलों का स्कूल शिक्षा विभाग में विलय कर दिया जाता है तो उनकी स्वायत्तता (Autonomy) प्रभावित हो सकती है और आदिवासी छात्रों पर केंद्रित कार्यों का असर कम हो सकता है। डॉ. अलावा ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस निर्णय को आगे बढ़ाती है तो इसका विभिन्न स्तरों पर विरोध किया जाएगा।

क्या होगा आगे?

फिलहाल प्रस्ताव जनजातीय कार्य विभाग के अभिमत का इंतजार कर रहा है। विभागीय सहमति मिलने के बाद इसे वित्त विभाग भेजा जाएगा और फिर राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। यदि कैबिनेट से मंजूरी मिलती है तो अगले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश की पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक ही विभाग के नियंत्रण में आ सकती है।

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