सोलापुर, अकोला और धाराशिव में सूखे के कारण सोयाबीन की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। जानिए कैसे 21 जिलों में फैला है यह भयानक कृषि संकट।

मॉनसून की लंबी बेरुखी ने सोयाबीन उत्पादक किसानों की कमर तोड़ दी है

पुणे, 18 सितंबर 2026: महाराष्ट्र में खरीफ सीजन के अंतिम चरण में मॉनसून की लंबी बेरुखी ने सोयाबीन उत्पादक किसानों की कमर तोड़ दी है। सोलापुर, मराठवाड़ा और विदर्भ के क्षेत्रों में बारिश न होने से खेतों की नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। सिंचाई का कोई अन्य साधन न होने के कारण निराश किसान अब अपनी लहलहाती फसल की कटाई करने के बजाय उस पर खुद ट्रैक्टर चलाकर फसल नष्ट कर रहे हैं।

प्रगति का प्रतीक ट्रैक्टर अब बना किसानों की लाचारी का संकेत

महाराष्ट्र के मुख्य सोयाबीन बेल्ट में जो ट्रैक्टर कभी कृषि समृद्धि और अच्छी पैदावार का प्रतीक माना जाता था, वह अब किसानों की लाचारी और आर्थिक संकट का प्रतीक बन गया है। बारिश के लंबे ब्रेक के कारण पौधे सूख रहे हैं और किसानों के पास फसल बचाने या लागत निकालने का कोई रास्ता नहीं बचा है।

सोलापुर जिले की अक्कलकोट तहसील स्थित घोलसगांव के किसान पंडित बडोले की आपबीती इस संकट की भयानक तस्वीर पेश करती है।

“हमने 5 एकड़ में सोयाबीन की फसल बोई थी। महीनों तक खून-पसीना बहाकर इसे पाला-पोसा। अब बारिश न होने से पूरी फसल बर्बाद हो गई है। खाद, बीज और कीटनाशकों पर लगाया गया सारा पैसा डूब चुका है। जब लागत वसूलने की भी उम्मीद नहीं बची, तो भारी मन से खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाना पड़ा।” — पंडित बडोले, सोयाबीन किसान (घोलसगांव, सोलापुर)

मिट्टी में नमी खत्म: कर्ज के तले दबते विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान

मराठवाड़ा के जालना जिले (घनसावंगी तहसील, गुंज बुद्रुक गांव) और विदर्भ के अकोला जिले से भी ऐसी ही दुखद तस्वीरें सामने आ रही हैं। किसानों ने खेती की शुरुआत के लिए महाजनों और बैंकों से भारी कर्ज लिया था। अब सूखती फसल पर और पैसे खर्च करने का कोई औचित्य नहीं दिख रहा है।

अकोला के कृषि कार्यकर्ता और किसान लक्ष्मीकांत कौथकर ने बताया कि मिट्टी से नमी पूरी तरह गायब होने के बाद पौधों की वृद्धि पूरी तरह रुक गई है। जो किसान पूरी तरह से केवल बारिश के पानी पर निर्भर थे, उनके लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो रही है।

राज्य कृषि विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र के 21 जिलों में सोयाबीन की फसल गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। अधिकारियों का मानना है कि यदि अब बारिश होती भी है, तो इसका फायदा केवल उन्हीं चुनिंदा किसानों को मिल सकेगा जिन्होंने बहुत देर से बुआई की थी।

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कृषि वैज्ञानिकों की चेतावनी: पैदावार क्षमता पूरी तरह प्रभावित

सोयाबीन की फसल में दाने बनने और फलियां आने का समय सबसे संवेदनशील होता है। इस दौरान यदि पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो पौधे बाहर से हरे दिखने के बावजूद उनके अंदर दाने नहीं बनते।

प्रसिद्ध सोयाबीन वैज्ञानिक मिलिंद देशमुख के अनुसार:

“फूल आने और फलियां बनने के नाजुक समय पर सोयाबीन को मिट्टी में प्रचुर नमी की आवश्यकता होती है। यदि इस चरण में सूखा पड़ता है, तो खेत भले ही दूर से हरे दिखाई दें, लेकिन उनकी पैदावार क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाती है। इससे बीजों का वजन और गुणवत्ता बेहद खराब हो जाती है।”

प्रति एकड़ 30 हजार का नुकसान: मुआवजे और फसल बीमा की तेज मांग

धाराशिव जिले के म्हात्रेवाड़ी गांव के किसान बापू पवार ने बताया कि किसानों ने इस बार सोयाबीन की बुआई से लेकर रखरखाव तक प्रति एकड़ 25,000 से 30,000 रुपये तक खर्च किए हैं। अब बारिश न होने से यह पूरी रकम डूब चुकी है।

विभिन्न किसान संगठनों और कृषि कार्यकर्ताओं, जैसे नागपुर के विजय जावंधिया, ने राज्य सरकार से तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है।

किसान संगठनों की प्रमुख मांगे:

  • तत्काल पंचनामा: राजस्व और कृषि विभाग तुरंत खेतों का दौरा कर फसल नुकसान का पंचनामा (मूल्यांकन) करे।
  • फसल बीमा का त्वरित भुगतान: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत बीमा कंपनियों को तुरंत दावों का निपटारा करने का निर्देश दिया जाए।
  • सरकारी आर्थिक सहायता: राज्य सरकार प्रति एकड़ हुए नुकसान के आधार पर किसानों को सीधा मुआवजा प्रदान करे।
  • आपातकालीन योजना: यदि बारिश पूरी तरह विफल रहती है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़े वित्तीय संकट से बचाने के लिए सूखा राहत योजनाएं लागू की जाएं।

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1: महाराष्ट्र के किन क्षेत्रों में सोयाबीन की फसल पर ट्रैक्टर चलाया जा रहा है?

Ans: महाराष्ट्र के सोलापुर, विदर्भ (अकोला) और मराठवाड़ा (जालना, धाराशिव) क्षेत्रों में किसान सोयाबीन पर ट्रैक्टर चला रहे हैं। बारिश न होने और मिट्टी की नमी खत्म होने के कारण फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है, जिससे लागत निकालना भी असंभव हो गया है।

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Q2: महाराष्ट्र के कितने जिले इस सोयाबीन फसल संकट से प्रभावित हैं?

Ans: राज्य कृषि विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र के कुल 21 जिले इस सोयाबीन संकट से प्रभावित हुए हैं। अधिकांश प्रभावित क्षेत्र वे हैं जो सिंचाई सुविधाओं के अभाव में केवल प्राकृतिक बारिश पर ही निर्भर थे।

Q3: किसानों को प्रति एकड़ सोयाबीन की खेती में कितना नुकसान हुआ है?

Ans: किसानों के अनुसार, सोयाबीन की बुआई, खाद, बीज और कीटनाशकों पर प्रति एकड़ लगभग 25,000 से 30,000 रुपये का खर्च आया है। सूखा पड़ने के कारण यह पूरी निवेश राशि शून्य हो गई है और लागत वसूलने की कोई उम्मीद नहीं बची है।

Q4: सोयाबीन फसल की बर्बादी का मुख्य तकनीकी कारण क्या है?

Ans: सोयाबीन वैज्ञानिक मिलिंद देशमुख के अनुसार, फूल आने और फलियां बनने के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी की कमी मुख्य कारण है। नमी न होने से पौधे का विकास रुक जाता है और पैदावार क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है।

Q5: पीड़ित किसानों ने सरकार से क्या मुख्य मांगें रखी हैं?

Ans: किसान संगठनों ने राज्य सरकार से नुकसान का तत्काल पंचनामा करने, फसल बीमा दावों का तेजी से भुगतान करने और प्रत्यक्ष मुआवजा देने की मांग की है। इसके अलावा प्रशासन से बड़े कृषि संकट से निपटने की तैयारी करने का आग्रह किया है।

निष्कर्ष: क्या होगा आगे?

महाराष्ट्र का यह कृषि संकट केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरे ग्रामीण अर्थशास्त्र और बाजार पर पड़ेगा। सोयाबीन की पैदावार घटने से खाद्य तेलों की कीमतों में उछाल आ सकता है और स्थानीय बाजारों में व्यापार प्रभावित होगा। यदि राज्य सरकार और बीमा कंपनियां तुरंत पंचनामा करके वित्तीय सहायता प्रदान नहीं करती हैं, तो विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान एक बार फिर गंभीर ऋण संकट (Debt Trap) में फंस सकते हैं। आने वाले हफ्तों में प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले राहत कदम ही तय करेंगे कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था इस धक्के से उबर पाती है या नहीं।

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