कैसे शुरू हुई विंध्य में पत्रकारिता?

Journalism History Of Vindhya: आज के डिजिटल युग में देश-विदेश की ताज़ा खबरें हरपल आपके मोबाइल तक तुरंत पहुँच जाती हैं। रीवा और विंध्य क्षेत्र में भी कई कई क्षेत्रीय और प्रादेशिक न्यूज पोर्टल और यूट्यूब चैनल सक्रिय हैं, जो हर क्षण आपको अपडेट दे रहे हैं। टीवी और रेडियो भी हैं। लेकिन कुछ दशक पहले तक समाचारों का एकमात्र साधन केवल अख़बार और पत्र-पत्रिकाएं ही हुआ करती थीं। क्या आपने कभी सोचा है कि रीवा और विंध्य क्षेत्र में पत्रकारिता की शुरुआत कैसे हुई होगी? यहाँ का पहला अख़बार कौन सा था और उस दौर में कौन-कौन से पत्र-पत्रिकाएं यहाँ से निकलती थीं और उनके संपादक कौन थे? आइए जानते हैं, विंध्यक्षेत्र के पत्रकारिता इतिहास के बारे में।

कैसे शुरू हुई विंध्य में पत्रकारिता?

वर्ष 1887 जब भारत में अंग्रेज पूरी तरह स्थापित हो चुके थे। और देश में कहीं-कहीं ही मात्र गिनती की पत्र-पत्रिकाएं निकला करती थीं। उसी समय राज्य की राजधानी रीवा से भारत-भ्राता नाम का साप्ताहिक समाचार पत्र निकलता था। इस समाचार पत्र को निकालने का श्रेय राज्य के सेनापति, प्रमुख इलाकेदार, हिन्दी-साहित्य-प्रेमी एवं विकासवादी परंपरा के वाहक लाल बलदेव सिंह को जाता है, इसका प्रकाशन उनके ही सम्पादकत्व में प्रारंभ हुआ था। लेकिन तब इस पत्र का संचालन आसान नहीं था और लाल बलदेव सिंह को इसे निकालने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने यह कठिन कार्य किया।

भारत-भ्राता निकलने की कहानी

दरसल उस समय रीवाराज्य में आवागमन के साधन सीमित थे इसीलिए बाहर से कोई समाचार पत्र यहाँ आ नहीं पाता था और कोई स्थानीय स्तर का समाचार पत्र यहाँ से निकलता ही नहीं था। जिससे राज्य में साहित्यिक चर्चा में एक ठहराव था। और यहाँ का जनसाधारण भारतीयता से पूर्णतः परिचित नहीं था। लोगों को देश के नए विचारों और खबरों की जानकारी कम मिलती थी, जिससे देश के सामसायिक सांस्कृतिक माहौल से यहाँ के लोगों की एक स्वाभाविक दूरी थी। ऐसी परिस्थिति में लाल बलदेव सिंह ने एक बीड़ा उठाया और तलवार छोड़कर कलम उठा लिया। भारत-भ्राता ने रीवा राज्य में एकतरह से आंदोलन छेड़ते हुए जन-संदेश के माध्यम से राज्य को जागृत करने का कार्य किया। इसके प्रकाशन एवं सम्पादन के द्वारा राज्य को एक नवीन चेतना देने और जीवन को प्रेरित करने का कार्य, लाल बलदेव सिंह की देश-भक्ति एवं साहित्यिक रुचि का परिचायक है। सांस्कृतिक पर्वों पर इस पत्र के विशेषांक प्रकाशित होते थे, जिनको विशेष रूप से आदर्श की ओर समाज को अग्रसर होने के लिये आकर्षक सामग्री से सजाया जाता था। विन्ध्याचल की रियासतों के अतिरिक्त भारतवर्ष के विभिन्न हिस्सों में भी पत्र की प्रतियां पहुंचती थी और इसकी खपत लगभग तीन हजार तक बढ़ गई थी। सहायक सम्पादक के रूप में आरम्भ के कुछ समय तक श्री भवानी सिंह, तत्पश्चात् श्री भगवान सिंह भी इससे जुड़े रहे। 15 वर्षों तक लगातार प्रकाशन के बाद 1902 में यह बंद हो गया। हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक और धर्मयुग जैसी पत्रिका के संपादक धर्मवीर भारती ने अपनी पत्रिका में लिखा था, शायद ही कोई यकीन करे, रीवा जैसे छोटे से शहर से इतने वर्ष पूर्व एक तेजस्वी और यशस्वी अखबार का संपादन एक सेनापति ने किया था।

“शुभचिंतक” अखबार था दूसरा प्रकाशित अखबार

इसके पश्चात् विन्ध्य की रम्यस्थली में करीब आठ वर्षों तक पत्र-पत्रिकाओं की गति स्थगित रही। परन्तु लोग ‘भारत-भ्राता’ द्वारा स्थापित की हुई परंपरा और चेतना को नहीं भूले थे। परिणाम-स्वरूप रीवा राज्य के शुभचिंतक एवं प्रसिद्ध साहित्यकार पं० मधुर प्रसाद पाण्डेय के सम्पादन में सन् 1910 में ‘शुभचिन्तक’ साप्ताहिक रीवा से प्रकाशित होने लगा। इस प्रकार राज्य में साहित्यिक चर्चा को पुनः एक गति मिली। इसके माध्यम से यहाँ के लोगों को विभिन्न विषयों का ज्ञान मिला, विंध्य के इतिहास और संस्कृति को समझने का अवसर मिला और साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों के गतिविधियों और समाचार से परिचित होने का मौका भी मिला। इस पत्र की प्रसिद्धि शीघ्रता से बढ़ी और इसकी प्रकाशन-संख्या डेढ़ हजार तक रही। वर्ष में दीपावली, जन्माष्टमी इत्यादि के समय एक-दो विशेषांकों को साहित्यिक एवं सामाजिक दृष्टि के अतिरिक्त सांस्कृतिक दृष्टि से भी रोचक बनाया जाता था। पाण्डेयजी के निरंतर लगनशीलता के कारण यह सतत आठ वर्षों तक चलता ही रहा। लेकिन 1918 में ‘शुभचिन्तक’ का प्रकाशन बन्द हो गया।

रीवा महाराज गुलाब का योगदान

लेकिन इसका प्रकाशन बंद होने के कई वर्षों बाद तक विंध्य क्षेत्र से कोई भी पत्र-पत्रिका नहीं निकल रही थी, इसका सबसे प्रमुख कारण आर्थिक समस्या थी, हालांकि और भी समस्याएं थीं, लेकिन प्रमुख कारण पैसों की तंगी ही थी। लेकिन तत्कालीन रीवा नरेश महाराज गुलाब सिंह का ध्यान इस तरफ गया, उन्हें महसूस हुआ राज्य में एक साप्ताहिक पत्र की जरूरत है। वह किसी योग्य व्यक्ति की तलाश करने लगे, जो पत्रिका का संपादन कर सके। उसी समय इलाहाबाद से “सजनी” नाम की एक पत्रिका निकलती थी, जिसके संपादक नरसिंह राम शुक्ल थे, उन्हें जब पता चला कि रीवा महाराज किसी योग्य संपादक की तलाश में हैं, तो उन्होंने अपनी रुचि दिखाते हुए महाराज से संपर्क किया।

रीवा से “प्रकाश” का प्रकाशन प्रारंभ हुआ

परिणामस्वरूप महाराज गुलाब सिंह ने पत्रिका के संपादन के लिए चार हजार रुपये वार्षिक आर्थिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। जिसके बाद 1932 में विजयदशमी के पहले ही, लगभग सोलह साल बाद “प्रकाश” नाम के साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन रीवा से प्रारंभ हो गया। शुक्ल जी लगभग तीन वर्षों तक लगातार इस पत्र का सम्पादन करते रहे। लेकिन उनके कार्यमुक्त होने के बाद वर्ष 1934 से ठा० अर्जुन सिंह इसके सम्पादन का कार्य करने लगे। वह लगातार 1942 तक इसका संपादन करते रहे, लेकिन इसी समय हुए राजा बहोरा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने प्रकाश के माध्यम से अंग्रेजी सरकार की कड़ी निंदा करते हुए आंदोलनकारियों का जमकर समर्थन किया, लेकिन इसके बाद उन्हें अंग्रेजी सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा और स्वाधीनता-संग्राम में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने के कारण वह जेल चले गए और 1945 तक लगभग तीन वर्षों तक जेल में रहे। इस परिस्थिति में इस पत्रिका के संपादन भार केशव प्रसाद चतुर्वेदी ने उठाया। लेकिन 1945 में महाराज गुलाब सिंह जब रीवा वापस आ गए, तो उन्होंने समस्त आंदोलनकारियों को जेलमुक्त कर दिया। जिसके बाद ठाकुर अर्जुन सिंह फिर से इस पत्रिका का संपादन करने लगे। लेकिन इसके बाद वर्ष 1947 में देश की आजादी के बाद “प्रकाश” को मिलने वाली राजकीय सहायता बंद हो गई और इसके संपादन में कुछ कठिनाइयाँ आने लगीं, लेकिन फिर ठाकुर अर्जुन सिंह इसे वर्ष 1949 तक सफलतापूर्वक इसे चलाते रहे। रीवा से प्रकाशित होनेवाले इस साप्ताहिक पत्र से साहित्य-जगत को प्रोत्साहन के साथ-साथ राज्य-परिवार की विशेषताओं से लोगों को सुपरिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ। विजय-दशमी के पर्व के अतिरिक्त राजकीय परिवार के जन्मोत्सव और विवाह आदि के अवसरों पर भी वर्ष में दो-तीन बार इसके विशेषांक निकलते थे।

1942 में शुरू हुई बांधव पत्रिका

वर्ष 1942 में “बांधव” नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर्नल बलवंत सिंह के संपादकत्व में प्रारंभ हुई, साहित्य प्रधान यह पत्रिका रीवा राज्य में एक नवीन चेतना लेकर आई थी। इस पत्रिका के सहायक संपादक विंध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संस्थापक सदस्यों में एक लाल यादवेन्द्र सिंह थे, हालांकि यह पत्रिका महज दो वर्ष बाद ही बंद हो गई। 1942 से सतना के रामवन आश्रम से मानस प्रकाशन लिमिटेड की ओर से “मानस-मणि” नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन मानस-संघ रामवन के मंत्री शारदा प्रसाद जी के संचालन में प्रारंभ हुआ, शुदर्शन सिंह ‘चक्र’ और पंडित तरुणेन्द्र शेखर तिवारी इसके प्रधान संपादक थे। यह पत्रिका तुलसी साहित्य विशेषकर रामचरित मानस से संबंधित विषयों पर आधारित थी।

पंडित शंभूनाथ शुक्ल ने किया “भास्कर” का संपादन

14 मार्च 1942 को रीवा से एक साप्ताहिक अखबार “भास्कर” का प्रकाशन भास्कर कंपनी लिमिटेड द्वारा जागेश्वर प्रसाद पाण्डेय के कुशल संपादन में प्रारंभ हुआ। बाद में रामप्रसाद पांडे और गया प्रसाद पांडे ने भास्कर को प्रगति की ओर बढ़ाया। 1946 में विजयदशमी के अवसर पर पंडित शंभूनाथ शुक्ल के संपादन में भास्कर का अभ्युदय नवीन ज्योति के साथ हुआ। छः माह बाद ही युवा सोशलिस्ट नेता जगदीश चंद्र जोशी इसके संपादक हुए। तत्पश्चात विंध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष लाल यादवेन्द्र सिंह ने इसका संपादन किया। बाद वर्ष 1956 में सरदार शत्रुसूदन सिंह कर्चुली इसके प्रधान संपादक हुए और श्यामसुंदर पटेल संयुक्त संपादक। 1952 में इसकी वितरण संख्या लगभग 5000 हजार थी।

आजादी के बाद कई पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ प्रारंभ

1950 में बैजनाथ दुबे के नेतृत्व में तथा श्री जगदीशचंद्र जोशी के संपादन में समाजवादी विचारधारा से ओत-प्रोत साप्ताहिक पत्र किसान-पंचायत का प्रकाशन रीवा से प्रारंभ हुआ। बाद में 1953 में मुनि प्रसाद शुक्ल के संरक्षण एवं जनार्दन प्रसाद पाण्डेय के संपादन में यह पत्रिका वर्ष 1954 तक प्रकाशित होती रही। वर्ष 1951 में पंडित मन्नूलाल द्विवेदी और महेंद्र कुमार मानव ने छत्तरपुर से ‘विंध्याचल’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था, कालांतर में विंध्यप्रदेश के गृहमंत्री दशरथ जैन के प्रयासों से इसका प्रकाशन रीवा से प्रारंभ हुआ। 18 फरवरी 1952 को सतना से “निर्माण” नामक साप्ताहिक प्रकाशन प्रारंभ हुआ, जिसके संपादक प्रारंभ में तीन माह तक ललित किशोर टंडन रहे। बाद में जागेश्वर प्रसाद पांडेय इसके संपादक बने 13 जून 1953 तक अपनी निर्माण साधना करते रहे। बाद में जागेश्वर प्रसाद पांडेय ने स्वतंत्ररूप से रीवा से “गरीब” नामक साप्ताहिक पत्र प्रारंभ किया और निर्भीकता के साथ इसे 3 दिसंबर 1955 तक चलाते रहे। बाद में जागेश्वर प्रसाद पांडे के अथक प्रयासों और जनता के सहयोग से “गरीब” दैनिक रूप से प्रकाशित होने लगा। सोशलिस्ट और जनसंघ के साथ-साथ ही यहाँ रामराज्य परिषद की विचारधारा का भी आगमन हुआ। इसी के परिणामस्वरूप 15 जून 1952 को रीवा से त्रिवेणी दास के संचालन में “नवज्योति” नामक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके प्रबंध संपादक डॉ. फतेह बहादुर सिंह और संपादक डॉ जानकी प्रसाद द्विवेदी थे। दुर्भाग्यवश यह पत्रिका मात्र छः माह ही चल सकी।

विंध्य-प्रदेश सरकार भी निकालती थी पत्र-पत्रिकाएं

जनवरी 1953 में विंध्यप्रदेश सरकार के सूचना एवं प्रचार विभाग द्वारा “विंध्य -प्रदेश” नाम की पाक्षिक पत्रिका का प्रारंभ किया। इसके संपादक विंध्यप्रदेश के तत्कालीन सूचना एवं प्रचार अधिकारी विद्यानिवास मिश्र रहे। अगस्त 1955 से यह पत्रिका मासिक हो गई। जुलाई 1956 में सूचना एवं प्रचार-पदाधिकारी अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव इसके संपादक बन गए। यह पत्रिका राजकीय सार्वजनिक योजनाओं के रूप -रेखा स्थापित करने के अतिरिक्त साहित्यकारों को प्रोत्साहित और पुरस्कार देने का कार्य भी करता था। विंध्य में शैक्षणिक गतिविधियों को गति देने और बढ़ावा देने के उद्देश्य से विंध्यप्रदेश शिक्षा विभाग ने अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव के संपादन में जनवरी 1952 से “विंध्य-शिक्षा” नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। बाद में विंध्यप्रदेश के उप -शिक्षा संचालक प्रोफेसर राममित्र चतुर्वेदी इसके संपादक बने। इस पत्रिका के माध्यम से शिक्षा-विकास संबंधी लेखों और कविताओं को पुरस्कृत भी किया जाता था। केवल शिक्षा विभाग ही नहीं, बल्कि विंध्य प्रदेश सरकार ने जनता को ग्राम-पंचायत, चुनाव एवं कानून सरल भाषा में समझाने के लिए मार्च 1952 से प्रोफेसर महावीर प्रसाद अग्रवाल के संपादन में “विंध्य-वार्ता” नामक साप्ताहिक पत्रिका निकालनी शुरू की। यह पत्रिका राज्य की ओर निःशुल्क वितरित की जाती थी और इसका प्रकाशन लगभग एक वर्ष तक चला।

छत्तरपुर में हुआ था विंध्य साहित्य सम्मेलन

विंध्यप्रदेश के लोक-साहित्य, कवियों-लेखकों को प्रोत्साहित करने तथा शोधकार्य इत्यादि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रो. महावीर प्रसाद अग्रवाल और कृष्णचंद्र वर्मा के संपादन में मई 1955 में त्रैमासिक पत्रिका “विंध्य-भारती” का प्रकाशन विंध्य प्रादेशिक हिंदी-साहित्य-सम्मेलन की मुख पत्रिका के तौर पर प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका का उद्घाटन राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने छत्तरपुर में हुए विंध्य साहित्य सम्मेलन के अवसर मार्च 1955 में किया था। इसी वर्ष 24 मई 1955 को विंध्य पत्रकार संघ के अध्यक्ष रामधनी मिश्र द्वारा रीवा से “उदय” नाम के साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्रिका स्वतंत्र और प्रगतिशील मानी जाती थी और तत्कालीन विंध्यप्रदेश सरकार के विरुद्ध मुखर होकर लिखती थी। इसका प्रकाशन जनता के आर्थिक सहयोग से होता था। इसी वर्ष 19 सितंबर 1955 को ब्रम्हकुमार शर्मा के प्रबंध संपादन में “दैनिक आलोक” का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, इसके सहायक संपादक गणेश प्रसाद साहा थे।

कई राजनैतिक विचारधारा के मुखपत्र भी रीवा से निकलते थे

रीवा में समाजवादी विचारधारा के प्रचार हेतु समाजवादी दल के साप्ताहिक मुखपत्र “धरती” का प्रकाशन सुप्रसिद्ध सोशलिस्ट लीडर जगदीशचंद्र जोशी के प्रधान संपादकत्व में यहाँ से 26 जनवरी 1956 से प्रारंभ हुआ। इसके साथ ही इससे बतौर प्रकाशक और संपादक रामधनी मिश्र भी जुड़े थे। इस पत्र ने समाजवादी विमर्श के साथ साहित्यिक रुचि भी जगाई। इसके अलावा इसी वर्ष सतना से रामेश्वर प्रसाद शर्मा द्वारा “संयम” तथा शहडोल से सत्यनारायण व दुर्गा प्रसाद के संपादन में “संग्राम” का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष सीधी जिले की ब्योहारी ग्राम पंचायत से सरपंच नामक पत्रिका का संपादन प्रारंभ हुआ जो लगातार तीन वर्षों 1959 तक लगातार प्रकाशित होता रहा।

जागरण था रीवा का पहला दैनिक अखबार

रीवा से साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्र -पत्रिकाएं तो बराबर निकल रही थीं, लेकिन तब तक कोई दैनिक अखबार नहीं निकलता था। जबकि अन्य प्रांतों और शहरों में दैनिक अखबारों का प्रकाशन पहले ही प्रारंभ हो चुका था। इस स्थिति में रीवा में एक दैनिक अखबार की आवश्यकता तीव्रता से महसूस की जाने लगी। “स्वतंत्र” नाम की साप्ताहिक पत्रिका निकालने वाले आदरणीय गुरुदेव गुप्त ने इस कमी को गहराई से अनुभव किया और इसका प्रयास करने लगे। परिणामस्वरूप विंध्य की राजधानी रीवा से एक सशक्त, स्वतंत्र और नियमित दैनिक समाचारपत्र निकालने का उनका संकल्प मूर्त रूप लेने लगा और उनके इन्हीं प्रयासों से सितंबर1953 में “दैनिक जागरण” का प्रकाशन प्रारंभ किया। रीवा और विंध्य के लोग जागरण से प्रभावित हुए, जिसके कारण इसका प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से हुआ। दैनिक जागरण ने एक नई परंपरा को स्थापित किया और जनचेतना, राष्ट्रीय भावना तथा सामाजिक चेतना को एक नया आधार प्रदान किया। यह समाचार पत्र विंध्यक्षेत्र के लोगों को प्रतिदिन देश-विदेश के ताजे समाचार तो देता ही था, इसके साथ ही ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन एवं विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध करवाता था।

रीवा से निकलता था अंग्रेजी अखबार

1953 में सतना से रामशंकर अग्निहोत्री के सम्पादन में जनसंघ का साप्ताहिक ‘राष्ट्र-दीप’ छह माह चला, 1955 में श्री गुप्त ने दीपावली अंक निकाला। विन्ध्य प्रदेश हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन का वार्षिक पत्र ‘अभिज्ञान’ के 1953 से तीन वार्षिक अंक राममित्र चतुर्वेदी, वासुदेव गोस्वामी व विद्यानिवास मिश्र ने सम्पादित किए, इस पत्रिका ने विंध्य के साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया । 1954 में शहडोल से ‘समय’, रीवा से ‘विन्ध्य-पंचायत’ और अंग्रेजी साप्ताहिक ‘टाइड’ भी प्रारम्भ हुए।हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के साथ 19 नवम्बर 1954 को प्रदेश की राजधानी रीवा से अंग्रेज़ी साप्ताहिक टाइड का भी प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसका सम्पादन सीधी लोकसभा से सांसद रहे आनन्द चन्द्र जोशी ने किया, जबकि मुरलीधर पांडेय के आर्थिक सहयोग और बलदेव प्रसाद अवस्थी के सहयोग से इसका संपादन प्रारंभ हुआ।

रीवा में हुआ था विन्ध्य-प्रदेश पत्रकार-संघ का प्रथम सम्मेलन

विन्ध्य के पत्रकार ‘विन्ध्य प्रदेश पत्रकार संघ’ एवं ‘विन्ध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ’ नामक संस्थाओं से संबद्ध थे और प्रदेश के गौरव बढ़ाने के लिए सहयोग प्रदान कर अपना विशेष महत्व रखते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में यद्यपि हमारा राज्य दूसरे प्रदेशों से कुछ पीछे था, पर विंध्यप्रदेश बनने के बाद तीन-चार वर्षों के अंदर ही राज्य में पत्रकारिता का बहुत विकास हुआ है। उस समय हमारे विंध्य से कई दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकायें निकलकर राष्ट्र-निर्माण में योग दे रही थीं। यहाँ विंध्य के पत्रकारों दो संगठन विंध्य प्रदेश पत्रकार संघ और विंध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ नाम की संस्थाएं भी थीं। विन्ध्य-प्रदेश-पत्रकार-संघ का प्रथम सम्मेलन अक्टूबर 1955 में रीवा में अमृत बाजार पत्रिका इलाहाबाद के संपादक तुषारकान्ति घोष की अध्यक्षता में हुआ था। जिसका उद्घाटन विंध्यप्रदेश के तत्कालीन उपराज्यपाल श्री कस्तूरी रंगम संथानम ने किया था। इस सम्मेलन में विन्ध्य-प्रदेश के अतिरिक्त इलाहाबाद, कलकत्ता, कानपुर एवं जबलपुर आदि स्थानों के प्रतिष्ठित पत्रों के प्रतिनिधियों और पत्रकारों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन से विन्ध्य की पत्रकारिता को विकास के लिए बल मिला।

राष्ट्रीय पत्रों के प्रतिनिधि रहते थे रीवा में

विंध्यप्रदेश के समय में रीवा में स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक एवं सहायक सम्पादकों के अतिरिक्त, देश के अन्य बड़े प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के प्रतिनिधि भी रहते थे, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। इनमें से कुछ लोगों के नाम हमें रिसर्च और प्रयास के बाद प्राप्त हुए हैं। इलाहाबाद से निकलने वाली अमृतबाजार पत्रिका के स्थानीय प्रतिनिधि नारायण प्रसाद चतुर्वेदी थे। बाल मुकुन्द भारतीय- लीडर एवं भारत जैसे पत्रिकाओं के प्रतिनिधि थे जो क्रमशः इलाहाबाद और बनारस से निकलती थीं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले “टाइम्स आफ इंडिया” के रीवा में प्रतिनिधि पीताम्बर अध्वर्यु थे। चन्द्रकिशोर टंडन बंबई से प्रकाशित होने वाले “स्टेट्समैन” के प्रतिनिधि थे। जबकि हिंदुस्तान टाइम्स के रीवा में प्रतिनिधि राजकृष्ण तनखा थे। देश की इन प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के प्रतिनिधि रीवा जैसे छोटे से शहर में होना यह पुख्ता करता है, कि विंध्य और यहाँ की राजनैतिक गतिविधियां तब देश भर में सुर्खियां बनती थीं। हो सकता है शायद कुछ पत्र-पत्रिकाओं अथवा पत्रकारों की जानकारी या विशेष परिचय न प्राप्त होने से अथवा भूलवश हमने उनका जिक्र नहीं किया होगा।

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