रीवा। दीपावली यानी दीपों का त्योहार! भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाने वाला यह पर्व देश भर में अलग-अलग परंपराओं और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन विंध्य की ऐतिहासिक नगरी रीवा में दीपावली कभी तोपों की गर्जना, मशालों की रोशनी और आसमान से होती पुष्पवर्षा के बीच मनाई जाती थी?
400 साल पुरानी है परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, रीवा में दीपावली उत्सव मनाने की शुरुआत करीब 400 वर्ष पूर्व, 1618 में विधिवत रूप से हुई थी, जब राजा विक्रमादित्य ने बांधवगढ़ की जगह रीवा को अपनी राजधानी बनाई थी। लेकिन इस पर्व को भव्य राजकीय उत्सव का स्वरूप देने का श्रेय तत्कालीन महाराजा वेंकट रमण सिंह जूदेव को जाता है। उन्होंने रीवा किले के परिसर में दीपावली को बड़े धूमधाम और राजसी वैभव के साथ मनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस अवसर पर बीहर-बिछिया नदियों के तटों पर स्थित राजघाट, अखाड़ा घाट सहित सभी प्रमुख घाटों पर चारों ओर मशालें जलाई जाती थीं। किले और चाँदमारी के मैदान जो आज के छत्रपति नगर के पास स्थित है, वहाँ तोपें तैनात की जाती थीं, जिनसे दीपावली की रात गर्जना की जाती थी।
एक ओर जलती हुई मशालों की रोशनी, दूसरी ओर महलों और झरोखों में जगमगाते दीपक और बीच-बीच में गूंजती तोपों की आवाज। इन सबके बीच पूरा रीवा उत्सव और उल्लास के रंग में डूब जाता था। धीरे-धीरे यह उत्सव राजमहल से निकलकर पूरे राज्य में फैल गया। आम लोग भी अपने घरों में दीपावली की पूजा-अर्चना करने लगे और दीपों की रोशनी से घर-आंगन जगमगाने लगे।
कहां जाता था दिया दीवारी
बघेलखंड में दीपावली मनाने की अपनी अलग परंपरा थी। जीतन सिंह की पुस्तक रीवा राज्य दर्पण में उल्लेख मिलता है कि यहां दीपावली को पहले दिया-दीवारी कहा जाता था। उस समय इसे मुख्यतः व्यापारियों का त्योहार माना जाता था, क्योंकि व्यापारी इसी दिन अपने नए बही-खाते शुरू करते थे। वहीं, कायस्थ वर्ग के लोग कलम-पूजन करते थे। आज की तरह उस समय घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा प्रचलित नहीं थी। इसके अलावा, धनतेरस, भाई-दूज और गोवर्धन पूजा जैसे त्योहार भी पहले यहां प्रचलित नहीं थे। इसके बावजूद दीपोत्सव की परंपरा पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती थी।
विमान से होती थी पुष्प वर्षा
रीवा की दीपावली से जुड़ी इन ऐतिहासिक परंपराओं के सबंध में इतिहासकार असद खान बताते है कि इस राजकीय उत्सव का एक और खास आकर्षण मंदिरों में होने वाली पुष्पवर्षा थी। असद खान के अनुसार, रीवा रियासत के पास दो विमान थे, जिनके नाम बांधव और बघेल थे। राजशाही के दौर में इन विमानों के माध्यम से रीवा किले में पुष्पवर्षा करवाई जाती थी। दरसल जैसे ही किले से तोपें चल जातीं, पायलटों को पता चल जाता। ये विमान आज के एस.एफ. ग्राउंड में खड़े रहते थे और वहाँ से उड़ान भरकर पहले किला और महामृत्युंजय मंदिर और उसके बाद चाँदमारी के मैदान में आतिशबाजी करने वाले सैनिकों और लोगों के ऊपर पुष्पवर्षा की जाती थी।
अयोध्या की तरह रीवा में दीवाली
रीवा की दीपावली का बड़ा ही धार्मिक महत्व और यहां की एक अनूठी राजपरंपरा से जुड़ा हुआ था। जैसा कि मान्यता है, भगवान श्रीराम के वनवास से अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी कारण से दीपावली मनाई जाती है। दरअसल, रीवा रियासत में पिछले लगभग 450 वर्षों से भगवान श्रीराम को राज्य का वास्तविक राजा माना जाता रहा है और राजसिंहासन पर 35 पीढ़ियों से भगवान श्रीराम और माता सीता की गद्दी स्थापित है। मान्यता है कि यह क्षेत्र भगवान श्रीराम ने अपने अनुज लक्ष्मण को सौंपा था, लेकिन लक्ष्मण जी स्वयं राजगद्दी पर बैठने के बजाय भगवान श्रीराम को अपना आराध्य और वास्तविक राजा मानते हुए उन्हें गद्दी पर विराजमान किया।
रीवा राजपरिवार लक्ष्मण जी को अपना आराध्य और कुलदेवता मानता है। इस परंपरा का निर्वहन करते हुए रीवा के महाराजा भी स्वयं को भगवान राजाधिराज का सेवक मानते रहे। इसी धार्मिक आस्था के चलते यहां के प्रमुख धार्मिक और राजकीय उत्सव भगवान श्रीराम के नाम से मनाए जाते थे। दीपावली के अवसर पर भी उनकी विशेष पूजा-अर्चना होती थी। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर हुए दीपोत्सव से प्रेरित होकर महाराजा वेंकट रमण सिंह ने रीवा में दीपावली को भव्य राजकीय उत्सव का स्वरूप दिया। इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दूर के गांवों से लोग रीवा पहुंचते थे।
दीपदान का महत्वं
रीवा और पूरे विंध्य क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर दीपदान का भी विशेष महत्व रहा है। विंध्य के चित्रकूट में भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कई वर्ष व्यतीत किए थे। मान्यता है कि यहां उन्होंने अपने पितरों के निमित्त दीपदान किया था। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के चलते दीपावली पर चित्रकूट तीर्थ में दीपदान को विशेष पुण्यदायी माना जाता है। चित्रकूट के अलावा रीवा के राजघाट और पंचमठा में भी इस दिन दीपदान करने की परंपरा रही है।
एक माह तक घरों में जलाए जाते है दीपक
रीवा राज्य में दीप जलाने की परंपरा वर्षो से चली आ रही है। पुराने समय में कार्तिक मास के प्रारंभ होते ही घरों में मिट्टी के दीपक जलने लगते थे। दीपावली से पहले घरों की साफ-सफाई, पुताई और रंगरोगन किया जाता था। कार्तिक अमावस्या की रात दीपक केवल घरों में ही नहीं, बल्कि कुओं, तालाबों, गौशालाओं, देवालयों और ग्राम देवताओं के स्थानों पर भी जलाए जाते थे। दीपक जलाने का भी एक विशेष क्रम हुआ करता था। सबसे पहला दीपक देवताओं के नाम पर प्रज्वलित किया जाता था, जबकि अंतिम दीपक कचरे के ढेर पर जलाया जाता था। इसके पीछे मान्यता थी कि कचरे के ढेर पर जलने वाला यह दीपक घर और गांव की नकारात्मकता तथा अंधकार को अपने साथ ले जाता है। दीपावली मनाने के तौर-तरीके भले ही बदल गए, लेकिन रीवा और बघेलखंड की इस परंपरा में छिपी आस्था, संस्कृति और विरासत आज भी हमें अपने इतिहास से जोड़ती है।




