चित्रकूट में कामता नाथ के रूप में विराजमान है जगत के पालनहार, कामदगिरि पर्वत को मिला था वरदान

चित्रकूट। श्री कामतानाथ मंदिर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट के सबसे पवित्र और प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर भगवान श्री राम को समर्पित है। त्रेता युग में भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने अपने 14 वर्ष के वनवास काल में से लगभग साढ़े 11 वर्ष चित्रकूट में बिताए थे। इस मुख्य मंदिर का निर्माण बरौंधा स्टेट की महारानी चन्द्र प्रभा कुंवरि की प्रेरणा से महाराज गया प्रसाद सिंह द्वारा कराया गया था। यहाँ राधा-कृष्ण के विग्रह भी स्थापित हैं। कामतानाथ भगवान को स्वयं भगवान श्री राम का ही साक्षात स्वरूप माना जाता है।

कामदगिरि पर्वत को वरदान

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान राम चित्रकूट छोड़ने लगे, तब कामदगिरि पर्वत दुखी हो गए। भगवान राम ने कामदगिरी पर्वत को वरदान दिया कि वे स्वयं यहाँ कामतानाथ के रूप विराजमान रहेंगे और जो भी भक्त इस पर्वत की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। असल में कामदगिरि पहाड़ी के चारों ओर लगभग 5 किलोमीटर लंबा परिक्रमा पथ है। यहाँ परिक्रमा करने से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं।

धनुष आकार पर्वत

चित्रकूट में स्थित कामदगिरि पर्वत की यह विशेषता है कि इसे किसी भी दिशा से देखने पर इसका आकार एक विशाल धनुष जैसा प्रतीत होता है। मंदिर में कामतानाथ जी के मुखारविंद में शालिग्राम शिलाएं हैं, जिनकी प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस पर्वत की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है, कि कामदगिरि भे रामप्रसादा, अवलोकत अप हरत विषादा अर्थात् भगवान राम की कृपा से यह पर्वत सभी के दुखों और विषाद को दूर करने वाला बन गया।

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