होर्मुज स्पेशल। होर्मूज का मतलब केवल एक नाम नहीं, बल्कि शक्ति और नियंत्रण भी है। सामरिक दृष्टि से, जो देश इस रास्ते पर नियंत्रण रखता है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की चाबी अपने पास रखता है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के दौरान अक्सर इस रास्ते को बंद करने की धमकियाँ दी जाती हैं, दरअसल पश्चिम एशिया की एक प्रमुख जलसन्धि है जो ईरान के दक्षिण में फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से अलग करता है। इसके दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात और ओमान का मुसन्दम नामक बहिक्षेत्र हैं। तेल के निर्यात की दृष्टि से यह जलडमरु बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इराक़, कतर तथा ईरान जैसे देशों का तेल निर्यात यहीं से होता है। अपने सबसे कम चौड़े स्थान पर इसके दोनों तटों में 39 किलोमीटर की दूरी है। यह ईरान को ओमान से अलग करती है।
गलियारे के तरह करता है काम
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी के देशों से तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के वैश्विक आवाजाही के लिये एक महत्त्वपूर्ण गलियारे के रूप में कार्य करता है। इससे होकर विश्व की कुल तेल आपूर्ति का 20 प्रतिशत तेल आता-जाता है। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे प्रमुख निर्यातक इस मार्ग पर निर्भर हैं तथा 80 प्रतिशत से अधिक तेल एशियाई बाज़ारों, विशेष रूप से भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की ओर जाता है।
भारत की दृष्टि से होर्मूज का महत्व
भारत का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल आयात और लगभग 54 प्रतिशत एलएनजी आयात इस रणनीतिक मार्ग से होकर गुजरता है। इसकी संकीर्ण चौड़ाई के कारण इसमें आवाजाही के लिये व्यवधान करना बहुत आसान है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात इस जलडमरूमध्य को बाईपास करने वाली पाइपलाइनों का संचालन करते हैं, जबकि ईरान ओमान की खाड़ी में सीधे तेल भेजने के लिये गोरेह-जस्क पाइपलाइन और जस्क टर्मिनल पर निर्भर है।
होर्मूज नाम कैसे पड़ा?
होर्मूज़ नाम को लेकर इतिहासकार और भाषाविद एकमत नहीं हैं। होर्मूज़ केवल जलडमरूमध्य का नाम नहीं है, यह एक पुराना शहर और सामुद्रिक साम्राज्य भी था। आरम्भ में होर्मूज़ का मूल बसावट क्षेत्र ईरान के तट के पास माना जाता है। बाद में समुद्री व्यापार बढ़ने पर शासकों ने अपना केंद्र एक द्वीप पर स्थानांतरित कर दिया। इस द्वीप को भी होर्मूज़ द्वीप कहा जाने लगा। यही द्वीप फारस की खाड़ी के मुहाने पर था। इस कारण से आसपास के समुद्री रास्ते को भी होर्मूज़ के नाम से जोड़ा जाने लगा।
10वीं से 17वीं शताब्दी के बीच होर्मूज़ साम्राज्य ने महासागरीय व्यापार पर गहरी पकड़ बना ली थी। अरब, फारस, भारत, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिणपूर्व एशिया के बीच जाने वाले जहाज़ यहां रुकते थे। मसाले, मोती, घोड़े, कीमती पत्थर, कपड़ा और धातुओं का बड़ा व्यापार यहीं से होता था. बोलचाल और आधिकारिक अभिलेखों में यह इलाका होर्मूज़ के नाम से इतना प्रसिद्ध हुआ कि जलडमरूमध्य का नाम भी वहीं से स्थायी हो गया। इस तरह पहले शहर और द्वीप का नाम था होर्मूज़ फिर उसी से समुद्री रास्ते का नाम बना होर्मूज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मूज़)।
होर्मुज का महत्व और मुख्य बातें
वैश्विक तेल आपूर्ति- दुनिया का लगभग 20 से 25 प्रतिशत पेट्रोलियम और तेल निर्यात इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।
भौगोलिक आकार- यह सबसे संकरे बिंदु पर केवल 21 मील चौड़ा है।
रणनीतिक तनाव- यह अक्सर भू-राजनीतिक और सैन्य तनाव का केंद्र रहता है, क्योंकि ईरान द्वारा इस मार्ग को बाधित करने की स्थिति में वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है।
ऐतिहासिक उत्पत्ति- होर्मुज नाम ईरान के एक छोटे से द्वीप और प्राचीन बंदरगाह से आया है, जो कभी समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था।




