Harish Rana Euthanasia Case : 13 साल बाद बहस पर फैसला ,16 साल पुरानी फिल्म चर्चा में

Harish Rana Euthanasia Case : 13 साल बाद बहस पर फैसला ,16 साल पुरानी फिल्म चर्चा में

Harish Rana Euthanasia Case : 13 साल बाद बहस पर फैसला,16 साल पुरानी फिल्म चर्चा में-एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में जीवन बिता रहे छात्र हरीश राणा के परिवार को राहत देते हुए उनका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी है, वहीं दूसरी तरफ इस फैसले ने “इच्छामृत्यु” (Euthanasia) जैसे संवेदनशील और जटिल मुद्दे को एक बार फिर से देश के सामने ला खड़ा किया है। कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने न सिर्फ कानूनी और चिकित्सीय जगत में हलचल मचाई है,बल्कि इसने आम जनमानस को भी झकझोर कर रख दिया है। इस बीच, 16 साल पहले रिलीज हुई संजय लीला भंसाली की फिल्म “गुजारिश” एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है, जिसका कथानक इस केस से हैरान कर देने वाली समानता रखता है।सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में जीवन बिता रहे हरीश राणा की लाइफ सपोर्ट हटाने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले ने इच्छामृत्यु पर बहस छेड़ दी है, साथ ही 16 साल पुरानी फिल्म “गुजारिश” एक बार फिर चर्चा में आ गई है। पढ़ें पूरी खबर।

हरीश राणा मामला-13 साल का लंबा संघर्ष

Harish Rana Case,A 13-Year Long Struggle

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में बी.टेक की पढ़ाई कर रहे थे। अगस्त 2013 में वह सेक्टर-15 के एक ब्वॉयज पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई। इस हादसे के बाद से हरीश कभी होश में नहीं आए और पिछले 13 सालों से वह वेजिटेटिव स्टेट (अचेत अवस्था) में जीवनरक्षक मशीनों के सहारे जीवित हैं। बेटे को इतने वर्षों तक बिना किसी सुधार के मशीनों पर देखकर उनके माता-पिता मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुके थे। अंततः उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए अपने बेटे के लिए “इच्छामृत्यु” की मांग की, ताकि उन्हें और उनके लाड़ले को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाई जा सके।

Harish Rana Euthanasia Case- “गुजारिश” जैसी फिल्मों का फिर से याद आना यह दर्शाता है

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Supreme Court’s Landmark Decision

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के माता-पिता की याचिका पर सहानुभूति दिखाते हुए डॉक्टरों को लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स-दिल्ली) को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि यह पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक और मानवीय तरीके से की जाए। इसके लिए डॉक्टरों की एक टीम एक विस्तृत योजना बनाएगी, ताकि मरीज की गरिमा को ध्यान में रखा जा सके।

जब “गुजारिश” ने उठाया था ये मुद्दा

When “Guzaarish” Raised This Issue

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर बॉलीवुड की उस फिल्म को याद दिला दिया है, जिसने सालों पहले इसी मुद्दे को बड़े परदे पर उठाया था। संजय लीला भंसाली की 2010 में रिलीज हुई फिल्म “गुजारिश” में ऋतिक रोशन ने एक मैजिशियन “ईथन” का किरदार निभाया था, जो एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह से लकवाग्रस्त (पैरालाइज्ड) हो जाता है और सिर्फ अपनी आवाज और दिमाग से दुनिया से जुड़ा रहता है। 12 सालों तक इस हालत में रहने के बाद वह अदालत से “इच्छामृत्यु” की मांग करता है। हालांकि फिल्म को मनोरंजन और एक संवेदनशील प्रेम कहानी के रूप में बनाया गया था, लेकिन इसने इच्छामृत्यु के कानूनी, नैतिक और भावनात्मक पहलुओं पर गहरी बहस छेड़ दी थी। हरीश राणा का मामला, फिल्म के कथानक से काफी हद तक मेल खाता है, जिसके चलते यह फिल्म एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

निष्कर्ष (Conclusion)-हरीश राणा का मामला भारत में “इच्छामृत्यु” की बहस को एक नए सिरे से परिभाषित करता है। जहां एक तरफ जीवन के अधिकार की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ एक मरीज को एक ऐसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर करना, जिसमें कोई संभावना न हो, भी मानवीय गरिमा के खिलाफ माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है। साथ ही, “गुजारिश” जैसी फिल्मों का फिर से याद आना यह दर्शाता है कि सिनेमा किस तरह से समाज के गंभीर मुद्दों को समय-समय पर उजागर करता रहता है।

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