दिल्ली के तालाब से रामलीला मैदान की कहानी, राजनैतिक-सामाजिक लड़ाई का बना केन्द्र बिंदु

दिल्ली का रामलीला मैदान। दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच अजमेरी गेट और तुर्कमान गेट के पास स्थित है। इसका इतिहास धार्मिक आयोजनों से लेकर देश की बड़ी राजनीतिक क्रांतियों और आंदोलनों से जुड़ा रहा है। 1930 के दशक से पहले यह स्थान यमुना के बाढ़ क्षेत्र के पास एक बड़ा तालाब हुआ करता था। 1930 के दशक की शुरुआत में इस तालाब को पाटकर एक खुला मैदान बना दिया गया, और फिर लाल किले के पीछे यमुना किनारे होने वाले पारंपरिक रामलीला उत्सव को यहां स्थानांतरित किया गया, जिसके कारण इसका नाम रामलीला मैदान पड़ा। कुछ स्रोतों के अनुसार अंग्रेजों ने 1883 में भी इसका उपयोग किया था।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक घटनाएँ

1961 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसी मैदान पर ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का स्वागत किया था।
1963 में भारत-चीन युद्ध के बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर गायिका लता मंगेशकर ने पंडित नेहरू की उपस्थिति में अमर देशभक्ति गीत ए मेरे वतन के लोगों यहीं गाया था।
1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान से अपना प्रसिद्ध नारा जय जवान, जय किसान दिया था।

राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र

आजादी से पहले महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने यहां राष्ट्रवादी सभाएं कीं। आजादी के बाद यह मैदान देश के बड़े राजनीतिक उथल-पुथल का गवाह बना।
1952 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को लेकर सत्याग्रह की शुरुआत इसी मैदान से की थी।
1975 में आपातकाल से ठीक पहले 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विशाल रैली को संबोधित किया था।
2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का ऐतिहासिक लोकपाल आंदोलन इसी मैदान से देशभर में चर्चा का विषय बना।
समकालीन राजनीति में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के उदय तथा विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों के बड़े आयोजनों का यह प्रमुख स्थल रहा है।

बहादुर शाह जफर ने रामलीला का कराया था मंचन

जिसे आज रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है, यह मैदान इंद्रपत गांव का हिस्सा था। प्रचलित है कि 1850 के दशक में पहली बार मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने यहां रामलीला मंचन शुरू करवाया। समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरु कर दिया, जिसके चलते इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई। भारत के अंग्रेजों के शासन में आने के बाद ब्रिटिश शासन ने यहां रामलीला के मंचन पर रोक लगाई और 1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए इस जगह को अपने कब्जे में ले लिया। साल 1911 में पं. मदन मोहन मालवीय की कोशिशों से एक बार फिर इस मैदान को रामलीला मंचन के लिए हासिल कर लिया गया। तब से हर साल यहां रामलीला का आयोजन होता रहा।

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