महाराज व्यंकट रमण सिंह ने राजा गोकुलदास पर “दो कौड़ी” का जुर्माना क्यों लगाया

Do Kaudi Ka Jurmana Story Hindi: हमारी बघेली में एक कहावत कही जाती है- “दो कौड़ी की इज्जत” या “दो कौड़ी की औकात”, यानी बहुत कम इज्जत। दरअसल पुराने समय में कौड़ी, दमड़ी, पाई, धेला, पैसा, टका और आना आज के नोटों की तरह चलन में थे। लेकिन कौड़ी सबसे छोटी और सबसे कम कीमत की होती थी। इसी कारण कौड़ी को लेकर बघेली के साथ-साथ हिंदी और अन्य बोलियों में कई कहावतें और मुहावरे प्रचलित हुए। हमारे बघेलखंड में “दो कौड़ी की इज्जत” भी ऐसी ही कहावत है। इसके पीछे एक कहानी बताई जाती है जो रीवा महाराज व्यंकट रमण सिंह और जबलपुर के नगरसेठ राजा गोकुलदास से जुड़ी है।

कौन थे सेठ गोकुलदास

उस समय जबलपुर में एक बहुत बड़े धनवान और प्रभावशाली मारवाड़ी नगरसेठ राजा गोकुलदास मालपानी रहते थे। महाराज के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन पहले सेठ जी के बारे में थोड़ा जान लेते हैं। सेठ गोकुलदास के दादा जैसलमेर से आकर जबलपुर में बस गए थे। गोकुलदास बहुत बड़े उद्यमी थे- उनका व्यापार बंबई, कलकत्ता, मद्रास सहित पूरे देश में फैला था और विदेश में बर्मा के रंगून तक उनका कारोबार चलता था। अंग्रेजों के समय वे भारत के बड़े बैंकरों में गिने जाते थे और कई रियासतों तथा अंग्रेजों को कर्ज दिया करते थे। मध्यप्रांत में उनके पास दो सौ गाँवों की मालगुजारी थी।

आधुनिक जबलपुर के निर्माता थे सेठ गोकुलदास

वे बड़े दानदाता भी थे और आधुनिक जबलपुर के निर्माता माने जाते हैं। उन्होंने कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनवाए, आज जो जबलपुर हाईकोर्ट की इमारत है, वह भी उन्होंने बनवाई थी। 1883 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें “रायबहादुर” की उपाधि दी और आगे चलकर उन्हें “राजा” की उपाधि लगाने का अधिकार मिला। ध्यान देने वाली बात यह है कि वे केवल नाम के राजा थे, किसी रियासत के शासक नहीं थे। उस समय केवल बड़े अंग्रेज अधिकारी और रियासतों के राजा ही चार घोड़ों वाली शाही बग्घी में सवारी करते थे, जिनमें रीवा राज्य भी शामिल था।

शाही बग्घी पर सवार होके आए राजा गोकुलदास

एक बार रीवा महाराज अंग्रेज वायसराय के निमंत्रण पर जबलपुर गए। रात हो जाने के कारण जबलपुर से पहले सिहोरा में उनका पड़ाव हुआ। अंग्रेजी प्रोटोकॉल के अनुसार अगले दिन सुबह जबलपुर के सम्मानित नगरसेठ राजा गोकुलदास सिहोरा तक महाराज की अगवानी करने आए। वे चार घोड़ों वाली शाही बग्घी में पूरे लाव-लश्कर के साथ पहुँचे। उस समय चार घोड़ों वाली शाही बग्घी में सभी को बैठने की अनुमति नहीं थी। महाराज ने इसे अपनी तौहीन माना। उन्होंने कहा कि सेठ जी ने उनका अपमान किया है, वे केवल नाम के राजा हैं, गद्दी वाले राजा नहीं, फिर भी बराबरी कर रहे हैं। सेठ जी ने कहा- महाराज साहब, यदि आपसे कोई गलती हो गई है तो हम क्षमा चाहते हैं, हमारा उद्देश्य अपमान करना नहीं था।

महाराज व्यंकट रमण सिंह ने राजा गोकुलदास पर “दो कौड़ी” का जुर्माना क्यों लगाया

महाराज बोले- गलती तो आपने की है और आपको दंड भरना पड़ेगा। हम आप पर इस गलती के कारण “दो कौड़ी” का जुर्माना लगाते हैं। सेठ जी चौंक गए और बोले- हुजूर, ऐसा न करें। यदि जुर्माना लगाना ही है तो हमारी हैसियत के अनुसार लगाएँ। हम जबलपुर से रीवा तक चाँदी की सड़क बनवा देंगे। महाराज ने कहा- ऐसा करने से आपकी इज्जत और बढ़ जाएगी, लेकिन हम चाहते हैं कि आपको सबक मिले, इसलिए जुर्माना दो कौड़ी ही रहेगा। सेठ जी ने बहुत विनती की और कहा- हमारा उद्देश्य आपका अपमान नहीं, बल्कि सम्मान बढ़ाना था। यदि हम जानते कि आप इसे अपमान समझेंगे तो ऐसी गलती कभी न करते। हम निर्दोष हैं, इसलिए यह जुर्माना माफ किया जाए।

महाराज ने माफ कर दिया जुर्माना

महाराज व्यंकट रमण सिंह सेठ गोकुलदास की बातों से संतुष्ट हो गए और दो कौड़ी का जुर्माना माफ कर दिया। माफी के बाद सेठ गोकुलदास ने अपनी मालगुजारी से सिहोरा के पास “जुरमानी-बरिगवाँ” के दस गाँव रीवा महाराज को नजराने में दे दिए। महाराज ने देखा कि सेठ चालाकी से अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं, इसलिए उन्होंने वे सभी गाँव अपने साथ गए पुरोहित को दान में दे दिए। बताया जाता है कि उनके वंशज आज भी वहाँ रहते हैं। तभी से रीवा राज्य में “दो कौड़ी की इज्जत” और “दो कौड़ी की औकात” जैसे मुहावरे प्रचलित हो गए।

इतिहास नहीं केवल लोककथा

आज यह कहानी थोड़े बदलाव के साथ बघेलखंड में खूब सुनाई जाती है। कुछ लोग इसे महाराज गुलाब सिंह से जोड़ते हैं, कुछ कहते हैं कि सेठ शाही लाव-लश्कर के साथ रीवा राज्य से निकले थे, इसलिए जुर्माना लगा। कई लोग रास्ते में आमने-सामने मिलने की कहानी सुनाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस घटना का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता, यह केवल लोक में प्रचलित कथा है। ऐसे मिलते-जुलते किस्से ग्वालियर रियासत के महाराज सहित पूरे देश में कई जगह सुनने को मिलते हैं। वास्तव में सेठ गोकुलदास और रीवा महाराज व्यंकट रमण सिंह के संबंध बहुत मधुर थे, और सेठ जी कई बार जबलपुर में महाराज की मेजबानी कर चुके थे। इसलिए इसे लोकसंस्कृति की उपज माना जाना चाहिए।

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