बीहर-बिछिया River: उद्गम से संगम तक की पूरी कहानी

Beehar-Bichhiya River: रीवा में बहने वाली बीहर और बिछिया नदियाँ विंध्य क्षेत्र के इस भूभाग के इतिहास, संस्कृति, लोकविश्वास और प्राकृतिक सौंदर्य को अपने साथ लेकर चलती हैं। हाल ही में पिछले दिनों शहर में आई बीहर-बिछिया नदियों की भयंकर बाढ़ ने पूरे रीवा शहर को झील में बदल दिया था।

बीहर नदी कहाँ से निकलती है | Origin of the Beehar River

बीहर नदी वर्तमान मैहर जिले की अमरपाटन तहसील के खरमसेड़ा नामक गाँव के पास से निकलती है। कैमोर पर्वत की गोद से छोटी-छोटी धाराएँ उत्तर दिशा की तरफ जमीन पर उतरती हैं। अमरपाटन से लगभग 10 किलोमीटर दूर मौहास पटपर के पास पहुँचकर यही धाराएँ नदी का स्वरूप धारण करती हैं। जनश्रुति है कि यहाँ कभी आल्हा-ऊदल के मामा माहिल परिहार का झुनझुनगढ़ नाम का किला था। रविरंजन सिंह जी की किताब “तब और अब रीवा” के अनुसार, इसी वजह से महाराज वेंकट रमण सिंह मजाक में कहा करते थे-

“बीहर निकरत ही परिहार के नरदा से, येकर पानी छुतिहा है।”

इसके बाद बीहर उत्तर दिशा की तरफ बढ़ते हुए मुकुंदपुर से होकर रीवा पहुँचती है। लेकिन रीवा की ओर बढ़ती हुई बीहर अभी आगे बढ़ ही रही होती है कि पूर्व दिशा से एक और नदी उससे मिलने को आतुर, बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ती हुई दिखाई देती है और वह है बिछिया नदी।

बिछिया नदी कहाँ से निकलती है | Origin of the Bichhiya River

बिछिया नदी मऊगंज जिले के एक गाँव खैरा कनकेसरा से एक छोटी-सी झिर्री के रूप में निकलती है। अपनी निकासी के निकटवर्ती बिछियान गाँव के कारण ही इसका नाम बिछिया पड़ा। यहाँ इसे देखकर यह बताया ही नहीं जा सकता कि यही नदी आगे चलकर रीवा शहर में इतना विकराल रूप धारण कर लेती है। उद्गम से करीब 10 फीट आगे आकर यह छोटे से ताल के रूप में बदल जाती है। करीब एक किलोमीटर बढ़ने के बाद यह एक छोटे से नाले का रूप धर लेती है। लेकिन इसके साथ ही इसका अस्तित्व लगभग समाप्त हो जाता है और लोगों द्वारा यहाँ खेती तक की जाती है। यहाँ से करीब 20–30 किलोमीटर तक इसका केवल जिक्र मिलता है, इसका कोई ज्यादा अस्तित्व नहीं रहता। लेकिन गुढ़ के पास आते-आते कैमोर पहाड़ियों से रिसती जलधाराओं के कारण यह फिर सदानीरा बन जाती है। इसके बाद यह नदी गुर्गी गाँव पहुँचती है, हजारों वर्ष पहले कल्चुरियों के समय में यहाँ एक महानगर आबाद था, जिसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। गुरगी के आगे यह कई गाँवों को सींचती हुई और छोटे-छोटे नदी नालों को समेटती हुई बीहर से मिलने के लिए वह रीवा की ओर बढ़ती है। लेकिन उससे पहले लक्ष्मणबाग के पास यह सर्पीली आकार की हो जाती है और एक खूबसूरत अर्धद्वीपनुमा स्थान बनाती है। यहीं पर लक्ष्मणबाग का सुप्रसिद्ध मठ है।

बीहर-बिछिया नदी का संगम | Sangam of Beehar & Bichhiya rivers

वहाँ से आगे बढ़ती हुई बिछिया वर्तमान रीवा किले के पास पहुँचती है और किले के पीछे राजघाट के पास बीहर से आकर मिल जाती है। रीवा में बीहर और बिछिया का यही संगम है। दोनों नदियाँ यहाँ एक-दूसरे में मिलकर एक विशाल जलधारा का रूप ले लेती हैं और इस संगम के बाद बिछिया की अलग पहचान समाप्त हो जाती है। यहाँ से केवल बीहर रह जाती है, जो अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ती है। बीहर की मुख्य सहायक नदी होने के कारण बिछिया का रीवा-निवासियों के लिए विशेष महत्त्व है और बीहर-बिछिया का यह संगम भी रीवा की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों नदियों का अपना अलग स्वभाव भी दिखाई देता है। जहाँ बिछिया उथली है, वहीं बीहर गहरी है। इसीलिए बिछिया चंचल दिखाई देती है, तो बीहर शांत। बिछिया का पानी जहाँ हरापन लिए है, वहीं बीहर का पानी मटमैला दिखाई देता है। शायद बीहर और बिछिया की यही खूबसूरती और जीवनदायिनी प्रकृति लोगों को सदियों से अपनी ओर आकर्षित करती रही। इसीलिए इन्हीं नदियों के किनारे सैकड़ों वर्ष पहले लमानों ने अपनी प्रारंभिक बस्तियाँ बसाना शुरू किया और धीरे-धीरे इन्हीं बस्तियों के विस्तार के साथ रीवा शहर आबाद होने लगा। हालांकि अब तो टोंस परियोजना के कारण सोन नदी का पानी भी इसमें मिलने लगा है।

आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित पंचमठा

अब बीहर की यात्रा आगे बढ़ती है। कुछ ही दूर आगे इसके किनारे पंचमठा स्थित है। इसके बारे में यह मान्यता है कि हजारों वर्ष पहले आदिगुरु शंकराचार्य जब ओंकारेश्वर से काशी जा रहे थे, तो उन्होंने यहाँ के मनोहर तट पर प्रवास किया था। यहाँ पर कई मंदिर भी स्थापित हैं। भारत के मध्यक्षेत्र में स्थित होने के कारण उन्होंने यहाँ एक पाँचवाँ मठ भी स्थापित किया था। यहीं पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा वर्तमान में रिवर फ्रन्ट भी निर्मित किया गया है। पंचमठा से आगे बढ़ते हुए बीहर की जलधारा एक छोटे-से जलप्रपात का रूप लेकर नीचे उतरती है। चट्टानों के बीच से गिरती इसकी दूधिया जलधारा और उसकी कलकल ध्वनि इस पूरे दृश्य को अत्यंत मनोहारी और कर्णप्रिय बना देती है। नदी का यह अद्भुत सौंदर्य आप छोटी पुल से देख सकते हैं। यहीं पर बीहर नदी दो धाराओं में विभक्त होकर एक नदी द्वीप बनाती है, जहाँ आज ईको पार्क स्थापित है।इसके आगे बढ़ने पर झिरिया नदी भी आकर बीहर में मिल जाती है।

बीहर नदी द्वारा चचाई जलप्रपात का निर्माण

इसके बाद बीहर रीवा पठार के कई नरई-नालों और विभिन्न सरिता-सहेलियों से मिलती हुई अपनी यात्रा को आगे बढ़ाती है और चचाई पहुँचती है। यहाँ पहुँचकर यही बीहर 372 फीट गहरे एक बहुत ही सुंदर जलप्रपात का रूप धारण कर लेती है।चचाई का यह जलप्रपात अपने अद्भुत सौंदर्य के कारण लंबे समय से लोगों को आकर्षित करता रहा है। इसे देखकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी मंत्रमुग्ध हो गए थे और शायद उन्होंने विंध्य को कश्मीर के बाद दूसरा स्वर्ग इसीलिए कहा होगा। महादेवी वर्मा समेत कई कवि भी चचाई के इस सौंदर्य से अछूते नहीं रहे। पंडित विद्यानिवास मिश्र ने तो इस पर अपनी रचनाएँ भी कीं। हालांकि अब यहाँ पर एक जलविद्युत परियोजना निर्मित हो गई है।

टमस नदी से मिलती है बीहर

लेकिन चचाई प्रपात के बाद भी बीहर की यात्रा समाप्त नहीं होती। यहाँ से आगे बढ़ती हुई यह मरैला के पास जंगल के बीच से बहती हुई करीब 90 किलोमीटर की यात्रा करती हुई अंततः टमस नदी में मिल जाती है। टमस और बीहर नदी का यह संगम एकांत और निर्जन वन में हुआ है, जहाँ दोनों नदियों का मिलन और आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य एक बेहद मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।

बीहर और बिछिया नदी रीवा की जीवनरेखा

बीहर और बिछिया की यह यात्रा केवल दो नदियों की कहानी नहीं, बल्कि उस धरती की कहानी है, जहाँ नदियों ने सभ्यता को जन्म दिया और सदियों से जीवन को आगे बढ़ाया। आज भी ये नदियाँ रीवा की कृषि, पेयजल और बिजली उत्पादन का महत्त्वपूर्ण आधार हैं, लेकिन हाल की बाढ़ ने इनका विकराल रूप भी दिखाया है। इससे पहले भी अतीत में 1882, 1962, 1997, 2003 और 2016 में भी इन नदियों का रौद्र स्वरूप प्रकट हुआ था। इसलिए इनके प्राकृतिक प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्रों को सुरक्षित रखना और बाढ़ से बचाव की बेहतर व्यवस्था करना जरूरी है। क्योंकि नदियों को रोका नहीं जा सकता, उनके साथ संतुलन बनाकर चलना ही हमारा भविष्य है। उम्मीद है, इस बाढ़ की विभीषिका के बाद हम यह बात समझेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *