अक्षय तृतीया। अक्षय तृतीया की तिथी वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। हिंदू और जैन धर्म में सबसे शुभ तिथियों में से यह तिथी एक है, जिसका अर्थ है ’कभी क्षय न होने वाला’। इस दिन किए गए पूजा, दान, और शुभ कार्य का फल अनंत काल तक बना रहता है। इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
अक्षय तृतीया का महत्व
अक्षय तृतीया का महत्व इसलिए है, क्योकि यह तिथी अक्षय फल वाली तिथी होती है। इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य या निवेश अनंत समृद्धि और सौभाग्य लाता है। इस दिन सोने-चांदी की खरीदारी और देवी लक्ष्मी की पूजा से धन-धान्य में वृद्धि होती है।
अबूझ मुहूर्त
यह एक ’अबूझ मुहूर्त’ है, यानी विवाह, गृह प्रवेश या कोई भी नया व्यवसाय शुरू करने के लिए आपकों कोई भी पंचांग, वेद शास्त्र देखने की जरूरत नही होती है और न ही इस तिथी पर किसी भी तरह की पूछताछ करने की जरूरत पड़ती है। यह तिथी अपने आप में पूर्ण है और इस तिथी पर किसी भी तरह की छति नही है।
भगवान का हुआ था छठा अवतार
मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था। इसी दिन वेदोक्त परंपरा के अनुसार त्रेता युग का आरंभ हुआ था और वेदव्यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। जैन धर्म में, यह भगवान ऋषभनाथ के 400 दिनों के कठिन उपवास को गन्ने के रस से समाप्त करने की स्मृति में मनाया जाता है।




