धार्मिक न्यूज। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में नारियल चढ़ाने और फोड़ने की खास परंपरा है। पूजा-पाठ, शुभ कार्य, विवाह आयोजन, गृह प्रवेश या फिर अन्य धार्मिक कार्याे में नारियल का ही उपयोग क्यों किया जाता है। यह सवाल हर किसी के मन में पूजा एवं धार्मिक आयोजन के दौरान जरूर आता है। जानकार नारियल के एक-एक हिस्से को बहुत ही उपयोगी बताते है। जिसके चलते इसे श्री फल का दर्जा दिया गया और पूजा जा रहा है। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में नारियल (जिसे श्रीफल भी कहा जाता है) के बिना किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ या अनुष्ठान को अधूरा माना जाता है।
अहंकार का त्याग, शुद्धता और सात्विकता का प्रतीक
नारियल का बाहरी कठोर खोल मनुष्य के अहंकार, घमंड और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इसे फोड़ने का अर्थ यह होता है कि व्यक्ति अपने कठोर अहंकार को तोड़कर स्वयं को और अपने कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहा है। नारियल के अंदर का सफेद भाग शुद्ध आत्मा, ज्ञान और शांति का प्रतीक होता है। अंदर का जल पवित्रता का प्रतीक है। खोल टूटने पर अंदर की सात्विकता सामने आती है।
श्रीफल और त्रिदेवों का वास
नारियल को श्रीफल (देवी लक्ष्मी और शुभता का फल) कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतरित होते समय मां लक्ष्मी के साथ नारियल का वृक्ष और कामधेनु लाए थे। नारियल के पेड़ को कल्पवृक्ष भी कहते हैं जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का वास माना गया है। नारियल पर बने तीन निशान (आंखें) भगवान शिव के त्रिनेत्र (तीन नेत्रों) के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए इसे साक्षी मानकर भगवान को अर्पित किया जाता है।
प्रतीक और परंपरा
प्राचीन समय में बलि प्रथा को रोकने के लिए सात्विक विकल्प के रूप में नारियल को बलि का प्रतीक माना गया, जो मानव शरीर (खोपड़ी, बाल और जल/रक्त) जैसी बनावट रखता है।
नाम में छिपा है अर्थ
श्रीफल का अर्थ, श्री का अर्थ माता लक्ष्मी और समृद्धि से है, इसलिए इसे श्रीफल अर्थात लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। पूजा के दौरान कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है, जिसे पूर्णता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। नारियल बाहर से सख्त और अंदर से कोमल व जल से भरा होता है, जो यह संदेश देता है कि मनुष्य को बाहर से दृढ़ और भीतर से निर्मल होना चाहिए।




