Thakur Ranmat Singh College Rewa : लोक साहित्य समाज की आत्मा-टीआरएस महाविद्यालय में संगोष्ठी

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Thakur Ranmat Singh College Rewa : लोक साहित्य समाज की आत्मा-टीआरएस महाविद्यालय में संगोष्ठी-मध्यप्रदेश के रीवा स्थित Thakur Ranmat Singh Government College के हिन्दी विभाग द्वारा “समाज के विकास में लोक साहित्य की भूमिका” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का सफल आयोजन 07 मार्च 2026 को किया गया। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. अर्पिता अवस्थी के निर्देशन में आयोजित इस अकादमिक कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने भाग लेकर लोक साहित्य के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय महत्व पर गंभीर विमर्श किया। कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना और स्वागत गीत के साथ हुई। इस अवसर पर “समाज के विकास में लोक साहित्य की भूमिका” पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।रीवा के शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय में ‘समाज के विकास में लोक साहित्य की भूमिका’ विषय पर राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन हुआ। देशभर से आए विद्वानों ने लोक साहित्य की महत्ता पर विचार साझा किए।

उद्घाटन सत्र में लोक साहित्य की महत्ता पर विचार

Inaugural Session Highlights the Importance of Folk Literature

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. उर्मिला वर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि कार्यक्रम के संयोजक डॉ. विनोद विश्वकर्मा ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। मुख्य वक्ता के रूप में Awadhesh Pratap Singh University, रीवा से पधारे डॉ. लक्ष्मीकांत चंदेला ने कहा कि लोक साहित्य मनुष्य के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है और जीवन के हर पड़ाव में व्यक्ति इससे किसी न किसी रूप में संबंध बनाए रखता है। विशिष्ट वक्ता के रूप में Jawaharlal Nehru Memorial PG College Barabanki से आए डॉ. अनिल विश्वकर्मा ने कहा कि लोक साहित्य जनमानस का साहित्य है, जो समाज की घटनाओं और अनुभवों को अपने भीतर समेटे रहता है। वहीं Government Girls College Manendragarh से आए डॉ. रामकिंकर पांडेय ने लोक साहित्य को जनता की चित्रवृत्तियों का साहित्य बताया। सारस्वत अतिथि के रूप में Awadhesh Pratap Singh University से पधारे डॉ. दिनेश कुशवाह ने कहा कि लोक साहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ने वाली स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। मुख्य अतिथि Sardar Vallabhbhai Patel University Anand, गुजरात से आए डॉ. दिलीप मेहरा ने कहा कि लोक साहित्य समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है।

प्रथम सत्र में विद्वानों के विचार

Scholarly Discussions in the First Session

प्रथम सत्र में Sarojini Naidu Government Girls PG College Bhopal के डॉ. कृष्ण बिहारी राय तथा Dr B R Ambedkar University Delhi के डॉ. महेंद्र प्रजापति ने लोक साहित्य की विविध धाराओं और उसके सामाजिक महत्व पर अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन डॉ. बृजेंद्र कुशवाहा ने किया, जबकि आभार डॉ. बृजेश साकेत ने व्यक्त किया।

तकनीकी सत्र में शोध पत्रों का वाचन

Technical Session and Research Paper Presentations

तकनीकी सत्र में Government College Semariya के प्राचार्य डॉ. रावेंद्र कुमार साहू ने लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य मानव जीवन की बहुमूल्य निधि है, जिसे संरक्षित रखना समय की मांग है। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. वंदना त्रिपाठी ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि लोक ही हमारी संस्कृति, एकता और पहचान का आधार है। इस दौरान विभिन्न प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

समापन सत्र में बघेली लोक साहित्य की गूंज

Valedictory Session Echoes Bagheli Folk Literature

समापन सत्र में समाज वैज्ञानिक डॉ. महानंद द्विवेदी, राजनीतिक चिंतक एवं आईक्यूएसी प्रभारी डॉ. संकटा प्रसाद शुक्ला तथा बघेली लोक कवि श्री बृजेश सिंह ‘सरल’ ने अपने विचार साझा किए। इस सत्र की अध्यक्षता Banaras Hindu University के डॉ. लहरीराम मीणा ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में श्री बृजेश सिंह ‘सरल’ ने अपनी बघेली कविताओं और गीतों के माध्यम से क्षेत्रीय लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा को नई दिशा देने का प्रयास किया।

देशभर से विद्वानों और शोधार्थियों की सहभागिता

Participation of Scholars from Across the Country

राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, अतिथि विद्वान, शोधार्थी, शिक्षाविद, मीडिया प्रतिनिधि और छात्र-छात्राओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। इस दौरान अनेक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए और लोक साहित्य के विभिन्न आयामों पर गंभीर चर्चा हुई।

निष्कर्ष-Conclusion-रीवा के ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय में आयोजित यह राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी लोक साहित्य के महत्व और उसके सामाजिक योगदान पर व्यापक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच साबित हुई। विद्वानों ने इस बात पर जोर दिया कि लोक साहित्य केवल परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान और एकता का आधार भी है। ऐसे अकादमिक आयोजन न केवल शोध को नई दिशा देते हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से जोड़ने का भी सशक्त माध्यम बनते हैं।

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