रीवा। जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट कार्यालय में मंगलवार को आयोजित होने वाली साप्ताहिक जनसुनवाई में इस बार एक अजीब सा नजारा देखने को मिला। अमूमन फरियादियों की भीड़ से गुलजार रहने वाला जनसुनवाई सभागार इस बार खाली नजर आया और जिम्मेदार अधिकारी दिन भर फाइलों की जगह फरियादियों की राह ताकते रहे। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बीच शिकायतों का यह ‘अकाल’ प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन गया है।
कुर्सियों पर बैठे रहे अधिकारी, नहीं पहुंचे फरियादी
सभागार में तैनात आला अधिकारी अपनी कुर्सियों पर मुस्तैद तो थे, लेकिन गिने-चुने लोगों के अलावा कोई भी अपनी समस्या लेकर नहीं पहुँचा। जनसुनवाई में आई इस भारी गिरावट को लेकर कलेक्ट्रेट परिसर में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि, प्रथम दृष्टया इसे मौसम की मार और ‘लू’ के प्रकोप से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन हकीकत की परतें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।
उदासीनता ने बढ़ाई दूरी
स्थानीय जानकारों और कलेक्ट्रेट पहुंचने वाले कुछ प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि जनसुनवाई के प्रति जनता के इस मोहभंग के पीछे केवल मौसम ही एकमात्र कारण नहीं है। आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि जनसुनवाई अब महज एक सरकारी खानापूर्ति और औपचारिकता बनकर रह गई है। पीड़ितों का कहना है कि वे मीलों का सफर तय कर, धूप में तपते हुए अपनी गुहार लेकर आते हैं, लेकिन उन्हें वह ठोस समाधान नहीं मिलता जिसकी वे उम्मीद रखते हैं।
उठता भरोसा और प्रशासनिक चुनौतियां
बार-बार चक्कर काटने के बावजूद न्याय न मिलने और शिकायतों के लंबित रहने से अब फरियादियों का इस व्यवस्था से विश्वास डगमगाने लगा है। लोगों का मानना है कि जब समस्याओं का निराकरण ही नहीं होना है, तो इस भीषण गर्मी में परेशान होने का क्या लाभ? मंगलवार को खाली पड़ा सभागार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि समय रहते शिकायतों के निवारण की गति और गुणवत्ता में सुधार नहीं किया गया, तो सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।




