बुद्ध पूर्णिमा। आज बुद्ध पूर्णिमा मनाई जा रही है। यह तिथी अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है। वैशाख माह की पूर्णिमा को भगवान गौतम बुद्ध के जीवन की तीन सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं के सम्मान में मनाई जाती है, उनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण (मृत्यु) तीनों ही वैशाख पूर्णिमा के दिन हुए थे।
दुनिया भर में आज बौद्ध ज्ञान
आज के समय में भारत से निकलकर बौद्ध धर्म दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचकर शांति, करुणा और सद्भावना का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहा है. बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग भगवान बुद्ध के उपदेशों में विश्वास करते हैं. यह शिक्षा उन्होंने दुनिया के दुखों को देखकर अपने जीवन के अनुभव के आधार पर दिया था. वहीं बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए बुद्ध एक नाम नहीं बल्कि एक उपाधि है, जिसका तात्पर्य प्रबुद्ध व्यक्ति या जाग्रत व्यक्ति से है।
बुद्ध पूर्णिमा का कारण और महत्व
महात्मा बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व में नेपाल के लुंबिनी में वैशाख पूर्णिमा के दिन शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और रानी माया देवी के घर हुआ था। वर्षों की कठोर साधना के बाद, सिद्धार्थ को बोधगया में पीपल के पेड़ (बोधि वृक्ष) के नीचे इसी पूर्णिमा के दिन सत्य का ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए। जीवन भर शांति और अहिंसा का संदेश देने के बाद, बुद्ध ने कुशीनगर में वैशाख पूर्णिमा के ही दिन देह त्याग किया था। यह पर्व प्रेम, शांति, अहिंसा और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस दिन बौद्ध अनुयायी बुद्ध की शिक्षाओं का स्मरण करते हैं। बौद्ध धर्म के अलावा, हिंदू धर्म में भी यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है, जहाँ बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना जाता है।
जाने उनकी जीवनी
महात्मा बुद्ध की सच्ची कहानी एक राजकुमार के सांसारिक मोह-माया त्यागकर सत्य और शांति की खोज में निकल जाने और एक महान मार्गदर्शक बनने की प्रेरणादायक यात्रा है। ईसा पूर्व ५६३ में लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और रानी माया देवी के घर हुआ था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। जन्म के कुछ दिन बाद ही माता का निधन हो गया, इसलिए उनका पालन-पोषण उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया। उनका विवाह यशोधरा नामक राजकुमारी से हुआ और उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम राहुल था। एक बार नगर भ्रमण के दौरान सिद्धार्थ ने चार ऐसे दृश्य देखे, एक वृद्ध, एक बीमार व्यक्ति, एक शव और एक प्रसन्न संन्यासी। जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी, उन्होंने महसूस किया कि संसार दुखों से भरा है।
ज्ञान की खोज
२९ वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ सत्य की खोज में रात के समय अपना राजपाट और परिवार त्यागकर वन चले गए। उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तपस्या और ध्यान किया। अंत में, बिहार के बोधगया में एक पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे बुद्ध (ज्ञानी) कहलाए।
शिक्षा और उपदेश
ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। उनकी पूरी शिक्षा मुख्य रूप से चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग पर आधारित थी।
दुख- संसार में दुःख है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, और अप्रिय वस्तु का मिलना या प्रिय का बिछड़ना सभी दुःख के कारण हैं।
दुख का कारण- प्रत्येक दुःख का कोई न कोई कारण होता है। इस दुःख का मुख्य कारण श्तृष्णाश् (इच्छा, लालसा या आसक्ति) है।
दुख का निवारण- दुखों से मुक्ति पाना संभव है। तृष्णा या इच्छाओं का पूर्ण त्याग करके दुखों का अंत किया जा सकता है।
दुख निवारण का मार्ग- दुखों के अंत और निर्वाण की प्राप्ति का मार्ग है। इसे आर्य अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है।




