Rewa-British Treaty Of 1813: रीवा राज्य से होकर ब्रिटिश शासन के मिर्जापुर क्षेत्र पर पिंडारियों ने आक्रमण किया। जिसके बाद अंग्रेजों को संदेह हुआ कि रीवा राज्य कहीं न कहीं पिंडारियों को संरक्षण या सहायता दे रहा है। इसी आशंका के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी और रीवा राज्य के बीच 1812 में 11 शर्तों वाली पहली संधि हुई। लेकिन इस संधि के एक वर्ष के भीतर ही रीवा राज्य में कुछ ऐसी घटनाएँ और परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि, 1813 में ईस्ट इंडिया कम्पनी को रीवा राज्य के साथ एक नई संधि करनी पड़ी। आख़िर क्या थीं वे घटनाएँ? किन कारणों से पहली संधि होने के बाद दूसरी संधि की आवश्यकता पड़ी? आइए, इस वीडियो में विस्तार से जानते हैं। लेकिन उससे पहले, संक्षेप में थोड़ा पहली संधि की प्रमुख शर्तों को भी देख लेते हैं।
रीवा और अंग्रेजों के मध्य पहली संधि
गवर्नर जनरल ने राजा जयसिंह को रीवा राज्य का वैध शासक स्वीकार करते हुए सम्मान, निष्पक्षता और संरक्षण का आश्वासन दिया। संधि के पालन की स्थिति में कम्पनी सरकार ने रीवा राज्य की स्वतंत्रता, सीमाओं की सुरक्षा तथा उसके भूभाग पर किसी प्रकार का अधिकार न जताने का वचन दिया। यह निर्धारित हुआ कि किसी बाहरी आक्रमण, षड्यंत्र या सीमा-विवाद की स्थिति में कम्पनी सरकार रीवा राज्य की सहायता करेगी। आवश्यकता पड़ने पर ब्रिटिश सेना भेजी जाएगी, जबकि रीवा राजा भी अपनी सेना कम्पनी की सहायता के लिए उपलब्ध कराएगा। संयुक्त अभियानों में रीवा सेना ब्रिटिश सेनानायक के निर्देशन में कार्य करेगी। सन्धि में रीवा राज्य के आन्तरिक मामलों में राजा की सर्वोच्च सत्ता को मान्यता दी गई और ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के शत्रुओं को शरण न देने, अपराधियों और डाकुओं के विरुद्ध सहयोग करने तथा आपसी विवादों का समाधान कम्पनी सरकार के माध्यम से करने पर सहमति व्यक्त की। कम्पनी सरकार ने रीवा नरेश की प्रतिष्ठा को यथावत उसी तरह स्वीकार किया जिस तरह भारत के पूर्ववर्ती सम्राटों ने स्वीकार की थी, तथा राज्य की सुरक्षा, जबकि रीवा राजा ने मैत्री, सहयोग और ब्रिटिश अधिकारियों की उचित सलाह का पालन करने का वचन दिया।
बांदा में हुई थी संधि
ब्रिटिश शासन की ओर से गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो के प्रतिनिधि जॉन रिचर्डसन तथा रीवा नरेश जयसिंह देव के वकील बख्शी भगवानदास ने 5 अक्टूबर 1812 को बाँदा में ग्यारह अनुच्छेदों वाली इस सन्धि पर हस्ताक्षर किए। सन्धि की प्रतियाँ फ़ारसी, अंग्रेज़ी और हिन्दी में तैयार की गईं तथा राजा के हस्ताक्षर और राजमुद्रा से प्रमाणित प्रति कम्पनी सरकार को सौंप दी गई।लेकिन इस संधि के बाद एक साल के अन्दर ही कुछ ऐसी घटनाएं-घटी और परिस्थितियाँ बन गईं, की 1813 में रीवा राज्य तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच फिर से नई संधि करनी पड़ी। क्या थीं घटनाएं आइए जानते हैं।
रीवा और अंग्रेजों की दूसरी संधि क्यों हुई
दरअसल संधि के तहत ब्रिटिश फौज की छावनी सेमरिया इलाके के बघरा नामक स्थान पर पड़ी हुई थी, तब उस समय उसके रसद व्यवस्था अर्थात खाने-पीने की जवाबदारी रीवा राजा ने सेमरिया-इलाकेदार जगमोहन सिंह को सौंप दी थी। लेकिन जगमोहन सिंह ने अंग्रेजी फौज को रसद सामग्री नहीं भिजवायी और ऊपरी तौर से अंग्रेजी फौज प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित कर अंग्रेजों के पक्षधर बने रहे। सप्लाई न होने के कारण अंग्रेजी फौज को रसद की कमी से बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा, फौज के अधिकारियों ने इस स्थिति के लिये रीवा दरबार को जवाबदेह माना और इसकी शिकायत कम्पनी सरकार से कर दी। फलस्वरूप रीवा राज्य से सन्धि की शर्तों का पालन सुनिश्चित कराने के उद्देश्य से कम्पनी सरकार ने रीवा की ओर एक सैन्य टुकड़ी भेज दी। इसी दौरान दो और महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, जिन्होंने परिस्थितियों को और अधिक जटिल बना दिया।
चुरहट के राव साहब ने किया ब्रिटिश डाक का विरोध
सन 1813 में चुरहट इलाके के राव जबरदस्त सिंह ने ईस्ट कम्पनी की डाक व्यवस्था का विरोध किया और अपने यहाँ डाक स्थापित करने से मना करते हुए अपने इलाके से गुजरने वाली ब्रिटिश डाक को लूट लिया। जिसके फलस्वरूप कंपनी सरकार ने उनके विरुद्ध अंग्रेजी फौज भेज दी। हालांकि फौज कुछ कर पाती उससे पहले ही रीवा महाराजा जयसिंह देव ने परस्थितियों की नजाकत को भाँपते हुए एक नये समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। संधि के फलस्वरूप जबरदस्त सिंह से चुरहट इलाका छीन लिया गया। हालांकि जब उन्होंने स्वयं अंग्रेजी कैंप में जाकर माफी मांगकर शर्तों सहित इकरारनामा कबूल कर लिया उसके बाद उनका इलाका वापस किया गया।
सेंगरान में अंग्रेजों पर हमला
इसके अलावा 2 मई 1813 को रीवा राजा के प्रतिनिधि के तौर पर लाल प्रताप सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से कमांडर कर्नल मार्टिन्डल के बीच परस्पर मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने हेतु एक समझौता संपन्न हुआ। किंतु इस समझौते के मात्र पाँच दिन बाद ही, 7 मई 1813 को जब अंग्रेजी सेना की एक टुकड़ी रसद सामग्री लेकर जब सेंगरो के क्षेत्र के इटॉर परगने से गुजर रही थी। तभी सथनी गाँव के निकट घुड़सवारों और पैदल सैनिकों के एक दल ने उस पर अचानक से हमला कर पूरी रसद सामग्री लूट ली। इस आक्रमण में कम्पनी के कई सैनिक मारे गए, और बहुत से घायल हुए। इस घटना ने कम्पनी सरकार को गहरा धक्का पहुँचाया। उसने इस हमले का पूरा उत्तरदायित्व इटॉर के इलाकेदार पर डालते हुए उन्हें, उनके ही पवाई से बेदखल कर दिया तथा इटॉर का इलाका रीवा दरबार के अधीन कर दिया। इसके बाद कम्पनी सरकार ने रीवा दरबार से कहा- अगर वह चाहे तो अपनी जिम्मेदारी पर रजपाल सिंह सेंगर को उनका सथनी इलाका पुनः प्रदान कर दे, क्योंकि इटॉर वालों ने उनसे उनका छीन लिया था।
रीवा राजा से नाराज हुई कंपनी सरकार
इन बातों की शिकायत कलकत्ता में में गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो तक पहुंची, जिसके बाद उन्होंने मिस्टर जॉन बैचोप को विशेषाधिकार देकर सेना सहित रीवा राज्य की ओर रवाना किया। बैचोप इलाहाबाद से होता हुआ रीवा राज्य आया और त्योंथर में टमस नदी के किनारे बंदरेह गाँव में अपना शिविर लगाया। जैसा कि हमने पहले भी बताया मौके और परस्थितियों को भाँपते हुए महाराज जय सिंह स्वयं अपने दल-बल के साथ त्योंथर अंग्रेजी शिविर में मिस्टर बेचौप से मिलने पहुंचे, उसने महाराज का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए उनसे हाथ मिलाते हुए कुर्सी में बैठने का आग्रह किया और महाराज का हाल-चाल लेने के बाद, सारी स्थितियों की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा- “वेल योर हाइनेस, क्या हमसे किए गए वायदे को तोड़ने की कोई खास वजह थी।”
बिचौलिए के माध्यम से हुई बात
अब चूंकि महाराज अंग्रेजी से अनभिज्ञ थे और मिस्टर बेचौप हिंदी से इसीलिए पूरी बात अंग्रेजी में एक बेचौलिए के माध्यम से हो रही थी। महाराज की तरफ से उनके वकील ने जवाब देते हुए कहा- कोई भी खास वजह नहीं थी। जहाँ कंपनी सरकार के फौज का कैंप था वह गरीब इलाका है, वहाँ मात्र किसान ही रहते हैं और दूर-दूर तक कोई हाट-बाजार भी नहीं है, इसीलिए कैंप द्वारा चाही गई वस्तुओं का प्रबंध राज्य के कर्मचारी नहीं कर पाए। आगे भी बातचीत का दौर जारी रहा और संधि को नए सिरे से करने का फैसला लिया गया। बाकि अनुच्छेद तो वही रहे लेकिन इसके साथ ही उसमें दस नए अनुच्छेद भी जोड़े गए। क्या थे यह अनुच्छेद आइए संक्षेप में ही जानते हैं।
द्वितीय संधि की शर्तें | Rewa-British Treaty of 1813
सन 1813 में रीवा राज्य और ब्रिटिश सरकार के बीच एक नई संधि सम्पन्न हुई। नई संधि के अनुसार 1812 की सभी शर्तें कुछ आंशिक संशोधन के बाद यथावत् प्रभावी रहीं। लेकिन” नई संधि के अनुसार राजा जयसिंह देव बिना ब्रिटिश अनुमति के, किसी अन्य राज्य से राजनीतिक संबंध नहीं रख सकते थे। तीसरे धारा में संशोधन करते हुए उसमें, रीवा राज्य में डाक व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की बात कही गई। ब्रिटिश सरकार को रीवा में अपना प्रतिनिधि रखने, डाक व्यवस्था स्थापित करने तथा आवश्यकता पड़ने पर राज्य में प्रवेश कर अपराधियों की गिरफ्तारी करने का अधिकार भी प्राप्त हो गया। चुरहट के जागीरदार राव जबरदस्त सिंह द्वारा ब्रिटिश डाक व्यवस्था का विरोध करने पर राजा ने अंग्रेजों की दण्डात्मक कार्रवाई का समर्थन किया और भविष्य में भी पूर्ण सहयोग देने का वचन दिया। इतना ही नहीं, राजा ने यह भी स्वीकार किया कि ब्रिटिश सरकार के मित्र उसके मित्र तथा ब्रिटिश सरकार के शत्रु उसके भी शत्रु होंगे। पूर्व संधियों का पूर्ण पालन न करने और 1813 की घटनाओं के बाद ब्रिटिश सेना के व्यय का भार भी रीवा राज्य पर ही डाल दिया गया। राजा जयसिंह देव ने 45,173 रुपये चार किस्तों में देने की स्वीकृति दी। यह दस अनुच्छेदों वाली संधि ब्रिटिश अधिकारी मिस्टर जॉन बैचोप और राजा जयसिंह देव के हस्ताक्षरों से सम्पन्न हुई तथा गवर्नर जनरल के अनुमोदन के बाद प्रभावी हो गई। इस संधि ने रीवा राज्य की विदेश नीति, प्रशासन और सुरक्षा संबंधी अधिकारों पर ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत कर दिया और उसकी राजनीतिक स्वायत्तता को पहले की अपेक्षा काफी कम कर दिया।
हाथ मिलाने को लेकर आहत थे रीवा महाराज
यह संधि जेष्ठ संवत 1870 अर्थात 25 जून 1813 को सम्पन्न हुई, पूर्व की तरह ही संधि पत्र तीन भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी और फारसी में तैयार है। इस संधि पत्र में कंपनी की तरफ से गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो के प्रतिनिधि मिस्टर जॉन बेचौप और रीवा राज्य की तरफ से स्वयं महाराजा जय सिंह ने अपने हस्ताक्षर किए। रीवा के सुप्रसिद्ध विद्वान रविरंजन सिंह अपनी किताब “तब और अब रीवा” में लिखते हैं- “महाराज अपने शिविर में आकर तत्काल ही गंगाजल से नहाकर अपने कपड़े बदले। क्योंकि ‘किरिस्तान’ अर्थात क्रिश्चियन से हाथ मिलाकर वह छुतिहा हो गए थे। उनका मन इस बात से आहत था, कि राज्य के संरक्षण के लिए उन्हें एक विदेशी के सामने जाकर उससे हाथ भी मिलाना पड़ा। और यह नौबत भविष्य में भी आ सकती है, यही सोचकर उनके मन में एक गांठ बन गई।” हालांकि इस संधि के बाद भी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक रीवा राज्य के आंतरिक मामलों में लगभग कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
इस आर्टिकल के संदर्भ
डॉ अखिलेश शुक्ल की किताब “रीवा राज्य का इतिहास”, रविरंजन सिंह की किताब “तब और अब रीवा” से संदर्भ लिया है। इसके साथ ही हम रीवा के इतिहासकार विजय बहादुर सिंह कर्चुली का भी धन्यवाद देना चाहेंगे जिनके माध्यम से हमें संधि दस्तावेजों की जानकारी मिली। ये दस्तावेज अभी राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली में सुरक्षित हैं, जहाँ उन्हें देखा जा सकता है।




