भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) में बैंकिंग सिस्टम में बड़ी एक्स्ट्रा नगद को नियंत्रित करने के लिए 7 सितंबर को दो वेरिएबल रेट रिजर्व रेपो एक्शन किया हैं। इन दोनों ऑपरेशन के जरिए 6,12,666 करोड़ रुपए की लिक्विडिटी अब्जॉर्ब हुई है। हालांकि 30 दिन वाले ऑप्शन में बैंक की भागीदारी अपेक्षा अनुसार कमजोर ही देखने को मिली है।

RBI अपनी liquidity क्यों absorb कर रहा है?
बैंकिंग के सिस्टम में इस समय काफी ज्यादा सरप्लस लिक्विडिटी मौजूद दिख रही है 6 सितंबर तक इसकी करीब 11.16 लाख करोड रुपए आकी गई थी। इस बढ़ोतरी के पीछे आरबीआई की विशेष विदेशी मुद्रा व्यवस्था के अनुसार आए बड़े इनफ्लुएंस को प्रमुख कारण में गिना जा रहा है। 31 अगस्त तक इन विशेष उपाय के तहत कुल 136.38 अरब डॉलर जुटाए गए थे। इसमें 127 पॉइंट 23 अरब डॉलर FCNR(B) डिपॉजिट हुआ है जबकि 5.26 अरब डॉलर ओवरसीज फॉरेन बौरोइंग और 3.89 अब एक्सटर्नल कमर्शियल उधार देखने को मिला है।
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30 दिन के VRRR auction में ऐसा क्या हुआ?
RBI ने 30 दिन के वीआरआरआर ऑक्शन के लिए 7 लाख करोड रुपए की राशि निर्धारित की थी लेकिन बैंक की तरफ से सिर्फ 2 लाख 59276 करोड रुपए की ही बोली मिली है। आरबीआई ने पूरी प्राप्त राशि स्वीकार कर ली है और इसकी कट ऑफ और वेटेज रेट 5.24% हैं। इससे हमें पता चलता है कि बैंक अपनी एक्स्ट्रा रकम को लंबे समय के लिए आरबीआई के पास रखने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं है। बाजार में विकास दर और लिक्विडिटी की कंडीशन को लेकर अनिश्चित का माहौल होने के बीच बैंक अपनी रकम को ज्यादा समय तक लॉक करने से बचते हुए दिख रहे हैं।
ओवरनाइट वीपीआरआरआर में मिला बेहतर रिस्पांस
लगभग 30 दिन के ऑप्शन के बाद आरबीआई ने 500000 करोड रुपए का ओवरनाइट vrrr एक्शन किया है इसमें बैंकों ने 33390 करोड रुपए की बोली लगाई है और पूरी राशि स्वीकार भी की है जिसमें इसकी दर 5.24% रही। यानी दोनों ही ऑप्शन में बैंक का रुझान अलग देखने को मिला है 30 दिन के मुकाबले ओवर नाइट में ज्यादा भागीदारी देखने को मिली है इससे हमें संकेत मिलता है कि बैंक एक्स्ट्रा नगद को लंबे समय के लिए रखने के बजे कम समय में अपने पास उपलब्ध रखना पसंद कर रहा है।
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इसका आम लोगों और बाजार पर क्या मतलब होता है?
Vrrr का इस्तेमाल आरबीआई बैंकिंग सिस्टम से ज्यादा पैसा अस्थाई रूप से निकलने के लिए करता है इससे बाजार में जरूर से ज्यादा नगद होने के कारण ओवरनाइट मनी मार्केट रेट पर पड़ने वाला दबाव भी नियंत्रित होता है। फिलहाल इसे सीधे तौर पर लोन सस्ता या महंगा होने का संकेत नहीं मानना चाहिए इसका तत्काल उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को संतुलित रखता है और आगे बैंक की लिक्विडिटी की स्थिति को देखते हुए आगे का कदम उठाना है।




