पिंडारियों के कारण रीवा राज्य को करनी पड़ी अंग्रेजों से संधि

Pindari And Rewa State History: पिंडारी कोई साधारण लुटेरे नहीं थे। बल्कि 18वीं शताब्दी में आतंक का दूसरा नाम थे, जिनके आने की खबर मात्र से गाँव और इलाके खाली होने लगते थे। जहाँ वे जाते थे वहाँ पीछे लूट, आगज़नी, हत्या और विनाश की भयावह कहानी छोड़ जाते थे। गाँव के गाँव उजड़ जाते, खेत बर्बाद हो जाते और हजारों लोग अपना सब कुछ खो बैठते। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास में रीवा राज्य में भी पिंडारी आए थे। आख़िर पिंडारी रीवा कब, क्यों और कैसे आए? और उसके बाद आखिर रीवा राज्य को अंग्रेजों से संधि क्यों करनी पड़ी। आइए जानते हैं इस वीडिओ में। लेकिन उससे पहले थोड़ा सा जानते हैं, आखिर पिंडारी कौन थे?

कौन थे पिंडारी ?

प्रारंभ में पिंडारी मराठा सेनाओं से जुड़े अनियमित घुड़सवार दल थे, जिन्हें वेतन नहीं मिलता था। उनका कार्य युद्धकाल में लूटमार करके रसद जुटाना, छापामार हमले करना और शत्रु प्रदेशों में लूटपाट करना था। उन्हें मराठा क्षत्रपों का संरक्षण प्राप्त था तथा कई गाँव जागीर के रूप में भी दिए गए थे। यही कारण था कि उनके दल होल्करशाही और सिंधियाशाही पिंडारी के नाम से जाने जाते थे, जिनका उपयोग प्रायः विरोधी राज्यों के विरुद्ध किया जाता था। किन्तु मराठा सरदारों के आपसी संघर्ष, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद मराठा शक्ति के कमजोर पड़ते ही पिंडारी अपने संरक्षकों के नियंत्रण से भी बाहर हो गए। और कई बार तो यह मराठा क्षेत्रों पर भी आक्रमण कर दिया करते थे। पिंडारियों की परंपरा थी कि वे वर्षा ऋतु समाप्त होने और दशहरा उत्सव के बाद नर्मदा नदी के उत्तर तट पर स्थित नेमावर में एकत्रित होते थे। और फिर वहीं से वे अपने सैन्य एवं लूट अभियानों की योजना बनाते और फिर वहीं से प्रस्थान करते थे।

एक निर्वासित जमींदार ने पिंडारियों को भड़काया

1812 में दोस्त मोहम्मद के नेतृत्व में पिंडारियों का एक दल नेमावर से नागपुर की ओर बढ़ रहा था। हालांकि इसी दौरान रास्ते में उनकी मुलाकात इलाहाबाद के एक निर्वासित जमींदार से हुई। उस जमींदार ने पिंडारियों को अंग्रेजों के विरुद्ध उकसाते हुए बताया कि मिर्जापुर, जहाँ उस समय अंग्रेजों का प्रत्यक्ष शासन था, अत्यंत समृद्ध व्यापारिक केंद्र है। कपास, लाख तथा मध्य भारत के अनेक अन्य उत्पाद मालवा और आसपास के क्षेत्रों से मिर्जापुर लाए जाते थे। वहाँ से यह माल कलकत्ता पहुँचता और फिर समुद्री मार्ग से यूरोप भेजा जाता था। जमींदार ने यह भी बताया कि उस समय मिर्जापुर में अंग्रेजी सैनिकों की संख्या बहुत कम थी, इसलिए वहाँ लूटपाट के लिए यही सबसे अच्छा अवसर था। लेकिन मिर्जापुर तक पहुँचने के लिए पिंडारियों के सामने केवल एक ही मार्ग था, जो रीवा रियासत से होकर गुजरता था। दरसल मध्यभारत में मराठा राज्यों की सीमाओं को पार करने के बाद रीवा राज्य का क्षेत्र प्रारंभ होता था और उसके आगे ही अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन वाले इलाहाबाद और मिर्जापुर के जिले शुरू हो जाते थे।

आखिर पिंडारी क्यों आए

अब रीवा पर तब महाराजा जयसिंह का शासन था। उस समय रीवा राज्य की सैन्य और आर्थिक स्थिति अत्यंत डांवाडोल थी। कहा जाता है खजाने में मात्र दो हाथी दांत के टुकड़े बचे थे और राज्य में कोई स्थायी सेना तक नहीं थी। यद्यपि महाराज जयसिंह के योग्य पुत्र बाबू विश्वनाथ सिंह राज्य की व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयासरत थे, किंतु पिछली पाँच पीढ़ियों के दौरान उत्पन्न हुई अव्यवस्था, प्रशासनिक शिथिलता, आर्थिक संकट और सैन्य दुर्बलता की भरपाई कुछ ही वर्षों में संभव नहीं थी। चूंकि उस तक समय रीवा राज्य और अंग्रेजों मध्य कोई औपचारिक संधि नहीं हुई थी। मराठा तथा अंग्रेज दोनों की दृष्टि रीवा राज्य पर थी। कुछ वर्ष पहले ही, द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के समय ईस्ट इंडिया कंपनी ने रीवा राज्य को संधि का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब रीवा महराज अजीत सिंह ने इसे अस्वीकार कर दिया था। हालांकि, राज्य की सुरक्षा और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने कंपनी की एक सैनिक टुकड़ी को मुकुंदपुर में अस्थायी रूप से तैनात करने की अनुमति दे दी थी। लेकिन मराठा युद्ध समाप्त होने के बाद यह अंग्रेजी सैन्य टुकड़ी वापस बुला ली गई। इस तरह देखा जाए तो रीवा राज्य में तब तक कोई स्थायी सेना नहीं थी और अंग्रेजी फौज की टुकड़ी भी वापस लौट चुकी थी। पिंडारियों के लिए यह स्थिति मुफीद थी, इसीलिए उन्होंने रीवा राज्य होते हुए मिर्जापुर पर आक्रमण की योजना बनाई।

पिंडारियों का मिर्जापुर अभियान

योजनानुसार पिंडारियों का एक विशाल दल, जिसकी संख्या अलग-अलग स्त्रोतों में अलग-अलग बताई जाती है, पर बाद के कुछ सोर्सेज में यह लगभग तीन हजार तक बताई जाती है। नर्मदा नदी के ऊपरी मार्ग से आगे बढ़ता हुआ यह दल रीवा पहुँचा। रीवा से वे उत्तर-पूर्व की दिशा ओर बढ़ते हुए मिर्जापुर की ओर निकल गए। हालांकि इस अभियान के दौरान पिंडारियों ने रीवा राज्य में किसी प्रकार की लूटपाट या विनाश नहीं किया। लेकिन मिर्जापुर पहुँचने के बाद उन्होंने नगर के बाहरी क्षेत्र के लगभग पाँच-छह समृद्ध गाँवों को लूट लिया, जिससे पूरे मिर्जापुर जनपद में भय और आतंक का वातावरण फैल गया। हालांकि पिंडारियों ने मिर्जापुर नगर के भीतर प्रवेश नहीं किया था। इसी अभियान के दौरान पिंडारियों के कुछ दल आगे बढ़ते हुए ब्रिटिश शासन के एक अन्य जिले शाहाबाद तक जा पहुँचे। वहाँ भी उन्होंने छापामार शैली में आक्रमण किए और तत्पश्चात सोन नदी पार कर, उसके दक्षिण की ओर बढ़ते हुए वह नागपुर राज्य के क्षेत्रों से होते हुए अपने ठिकानों की तरफ चले गए।

कंपनी सरकार को था रीवा राज्य पर संदेह

जब तक कलकत्ता में अफसरों को इस रेड की खबर मिली, तब तक यह दल सोन नदी पार कर चुका था। हालांकि पिंडारियों ने ज्यादा विनाश नहीं किया था, फिर भी उनके इस दुस्साहसी आक्रमण ने ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार को गंभीर रूप से चिंतित कर दिया। एक ओर मराठा शक्ति पहले से ही कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थी, वहीं दूसरी ओर पिंडारी भी उन्हें चुनौती दे रहे थे। मिर्जापुर पर हुए इस हमले के बाद अंग्रेज अधिकारियों को संदेह हुआ कि रीवा के महाराज जयसिंह ने संभवतः पिंडारियों की सहायता की थी या उनके साथ कोई गुप्त समझौता किया था। इस संदेह का मुख्य आधार यह था कि पिंडारियों ने रीवा राज्य में न तो कोई लूटपाट की और न ही किसी प्रकार का कोई रक्तपात किया। हालांकि पिंडारियों द्वारा रीवा राज्य में किसी प्रकार की लूटपाट या रक्तपात नहीं किया गया था, फिर भी कंपनी के अधिकारियों को महाराज जय सिंह की भूमिका पर संदेह बना रहा। उन्हें आशंका थी कि रीवा दरबार और पिंडारियों के बीच किसी प्रकार का गुप्त समझौता या सहयोग रहा होगा। इसी संदेह के आधार पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने रीवा राज्य पर संधि करने का दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया।

रीवा राज्य और अंग्रेजों के मध्य संधि

अंततः 5 अक्टूबर 1812 को रीवा राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच बाँदा में एक औपचारिक संधि संपन्न हुई। कंपनी की ओर से तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड मिंटो के प्रतिनिधि मिस्टर जॉन रिचर्डसनने, जबकि रीवा राज्य की ओर से उसके अधिकृत वकील भगवान दत्त बख्शी ने इस संधि के 11 बिंदुओं पर हस्ताक्षर किए। और दोनों पक्षों की सील और मुहर भी लगाई गईं। संधि पत्र अंग्रेजी, फारसी और हिंदी में तैयार किया गया था, और इसकी एक-एक प्रति की अदला-बदली की गई थी। जिसमें लिखा था गवर्नर जनरल के दस्तखत वाला संधिपत्र 30 दिन के भीतर रीवा राज्य को उपलब्ध करवा दिया जाएगा और फिर संधि उसी तारीख से प्रभावी मानी जाएगी। इस तरह रीवा राज्य और अंग्रेजों के मध्य पहली बार संधि हुई।

क्या रीवा राज्य ने पिंडारियों की मदद की थी

ब्लेडेंसवर्ग के रॉस का मानना था कि रीवा राज्य के साथ की गई यह संधि वास्तव में रीवा महाराज के विरुद्ध एक दंडात्मक कार्यवाई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर इसीलिए नाराज थे, क्योंकि राजा जयसिंह ने पिंडारियों को अपने राज्य से गुजरने दिया था। लेकिन कुछ ब्रिटिश संसदीय रिपोर्ट्स के अनुसार इस स्थिति के लिए रीवा महाराज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि रीवा राज्य तब इतना सक्षम नहीं था, की वह पिंडारियों को रोक सकता। इसीलिए उनके पास केवल दो ही विकल्प थे, या तो पिंडारियों को अपने राज्य से होकर गुजर जाने दिया जाए। या फिर उनका विरोध करके पूरे राज्य को लूटपाट, आगजनी और भारी तबाही का सामना करने दिया जाए। इसीलिए पिंडारियों को रीवा से मार्ग देना महाराज की इच्छा नहीं, बल्कि राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिया गया, एक राजनैतिक निर्णय था।

रीवा में पिंडारियों ने लूटपाट क्यों नहीं की

रीवा राज्य से पिंडारियों के गुजरने का उल्लेख मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्टों और ब्रिटिश अभिलेखों में ही मिलता है। इसके विपरीत, रीवा राज्य के उपलब्ध स्रोतों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि पिंडारियों ने रीवा महाराज से संपर्क किया था या उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता मिली थी। लेकिन फिर भी, एक तथ्य ध्यान देने योग्य है कि पिंडारी शांतिपूर्वक रीवा राज्य से बिना संघर्ष और लूटपाट के निकल गए थे। इसीलिए यह जरूर प्रतीत होता है, दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की व्यवहारिक सहमति या समझ बनी होगी। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पिंडारियों का वास्तविक लक्ष्य रीवा नहीं, बल्कि मिर्जापुर था। वे संभवतः रीवा में ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे, जिससे अंग्रेज सरकार को उनके अभियान की भनक लग जाए और वह समय रहते सतर्क होकर उनको रोके। इसके अलावा रीवा राज्य भले कमजोर था, लेकिन वहाँ शौर्य की कमी नहीं थी, वह प्रतिरोध कर सकता था। इसलिए रीवा से उन्होंने यथासंभव शांतिपूर्वक और बिना किसी टकराव के गुजरना ही उचित समझा।

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