History Of The Naga Bharashiva: ‘नाग’ शब्द सुनते ही हमारे मन में सबसे पहले फन फैलाए हुए साँपों की छवि उभरती है। या तो कभी भगवान विष्णु के आसन शेषनाग और भगवान शिव के गले में झूलते वासुकि जैसे पौराणिक नागों की याद आती है। तो कभी उन बॉलीवुड फिल्मों की, जिनमें नाग इच्छानुसार मनुष्य का रूप धारण कर लेते हैं। लेकिन पौराणिक कथाओं और लोककथाओं से अलग, भारतीय इतिहास में ‘नाग’ नाम का एक शक्तिशाली राजवंश भी था, जिसे नाग-भारशिव वंश के नाम से जाना जाता है। यह वही राजवंश था, जिसने उस समय उत्तर भारत में अपनी शक्ति स्थापित की, जब कुषाण साम्राज्य का पतन हो रहा था और गुप्त साम्राज्य का उदय अभी होना बाकी था। इतिहास के इसी संक्रमणकाल में विंध्य की पहाड़ियों से एक नई शक्ति उभरी, जिसने उत्तर भारत की राजनीतिक शून्यता को भरते हुए- शैव धर्म और वैदिक परंपराओं को फिर से स्थापित करते हुए भारतीय संस्कृति को नई ऊर्जा दी।
विदिशा में शासन किया करते थे नागवंश के राजा
इस वंश का प्रामाणिक और शृंखलाबद्ध इतिहास अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुआ है। इनके बारे में जानकारी मुख्यतः अभिलेखों, सिक्कों, पुराणों, पुरातात्त्विक अवशेषों से प्राप्त होती है। लेकिन इनके इतिहास के अनेक पक्ष आज भी रिसर्च का विषय हैं। पर जितना भी प्राप्त हुआ है उसके अनुसार नागवंश के शासक पहले विदिशा और पद्मावती में शासन किया करते थे, लेकिन कालांतर में कुषाणों की बढ़ती शक्ति और उनके दबाव के बाद उन्हें अपनी राजधानी छोड़कर विंध्य की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी। विंध्य के सुरक्षित पर्वतीय भूभाग और स्थानीय जनसमर्थन के बल पर उन्होंने अपनी सैन्य और राजनीतिक शक्ति को पुनः संगठित किया। जब दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध और तीसरी शताब्दी के प्रारंभ में कुषाण साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा, तब नाग-भारशिवों ने एक बार फिर उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए, पद्मावती से लेकर मथुरा तक अपने राज्य का विस्तार किया।
कौन थे नाग-भारशिव? | Who Were The Naga-Bharshivas?
दरसल इस वंश के प्रारंभिक शासकों के नाम के अंत में ‘नाग’ शब्द आता था, इसलिए इतिहास में इन्हें नागवंश के नाम से जाना गया। ये शासक भगवान शिव के परम भक्त थे और स्वयं को शिव के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। इसी कारण ऐसा माना जाता है, वे शिवलिंग को भगवान शिव के वाहन नंदी की भाँति अपने कंधों पर धारण करके चलते थे। उदाहरण से समझें, तो फिल्म ‘बाहुबली’ में प्रभास द्वारा निभाए गए किरदार शिवा के उस प्रसिद्ध दृश्य की कल्पना आप कर सकते हैं, जिसमें वह अपने कंधों पर शिवलिंग उठाकर उसे झरने के जल से अभिषेक कराता है। हालांकि विद्वानों के अनुसार यहाँ शिवलिंग धारण करने का अर्थ शैव धर्म के प्रतीक चिन्हों से है। लेकिन इसी विशिष्ट धार्मिक परंपरा के कारण अभिलेखों और ऐतिहासिक स्रोतों में इन्हें ‘भारशिव’ अर्थात्, नंदी की तरह शिवलिंग का भार अपने कंधों पर धारण करने वाला कहा गया। इसीलिए इस वंश के शासकों के नाम के बाद नंदी या नंदिन प्रत्यय भी लगा हुआ मिलता है।
वाकाटक अभिलेखों में भी भारशिवों का जिक्र
भार-शिवों ने अपने पराक्रम के बल पर गंगा के मैदानों पर अधिकार स्थापित किया। अपनी इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किए और गंगा के पवित्र जल से अपना राज्याभिषेक कराया। इसकी जानकारी वाकाटक अभिलेखों से भी मिलती है। जिनके अनुसार-
“अंशभार सन्निवेशितशिवलिङ्गोद्वाहनशिवसुपरितुष्टसमुत्थादित-
राजवंशानाम् पराक्रमाधिगत-भागीरथी-अमलजल: मूर्द्धा-भिषिक्तानाम्
दशाश्वमेध-अवभृथस्नानाम् भारशिवानाम् ॥”
अर्थात- “वे भारशिव थे, जिन्होंने भगवान शिव के लिङ्ग को अपने कंधों पर धारण करके शिव को अत्यंत प्रसन्न किया और उनके आशीर्वाद से उनका राजवंश प्रतिष्ठित हुआ। उन्होंने अपने पराक्रम के बल पर भागीरथी मने गंगा, तक विजय प्राप्त की तथा गंगा के निर्मल और पवित्र जल से अपना राज्याभिषेक कराया तथा अपनी सार्वभौम सत्ता के प्रतीक के रूप में दस अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए और प्रत्येक यज्ञ के अंत में अवभृथ स्नान किया।”
बघेलखंड था भारशिवों का मूल स्थान
सुप्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार, भार-शिवों ने अपने दस अश्वमेध यज्ञ काशी के दशाश्वमेध घाट पर सम्पन्न किए थे। यह स्थान इसलिए भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि काशी को भगवान शिव का सांसारिक निवास माना जाता है और इसके अधिष्ठाता स्वयं महादेव हैं। जायसवाल महोदय का मानना है कि भार-शिव मूलतः बघेलखंड के निवासी थे। इसलिए गंगा तक पहुँचने के लिए उन्होंने संभवतः उस प्राचीन दक्षिणी मार्ग का अनुसरण किया, जो विंध्य क्षेत्र से होकर काशी तक जाता था। वे इसके समर्थन में तर्क देते हैं कि उस समय बनारस कुषाण साम्राज्य की पूर्वी सीमा के निकट स्थित था। यदि भार-शिव बुंदेलखंड के मार्ग से आगे बढ़ते, तो वे गंगा के बजाय यमुना के तट पर पहुँचते। इसलिए अधिक संभावना यही है कि वे बघेलखंड के रास्ते गंगा तट तक पहुँचे और वहीं अपने अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए।
क्या विंध्य में थी भारशिवों की राजधानी?
जायसवाल महोदय अपने मत के समर्थन में पुराणों का भी उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार, भार-शिवों की राजधानी कौशांबी और काशी के बीच कहीं स्थित थी। इसी आधार पर वे आज के मिर्जापुर के कंतित परगने को प्राचीन कांतिपुरी मानते हैं। इसके अतिरिक्त, सतना जिले के नागौद क्षेत्र के दुरेहा से प्राप्त स्तंभ-लेख से भी इस मत को बल मिलता है। इस अभिलेख से संकेत मिलता है कि भार-शिव और वाकाटक एक-दूसरे के पड़ोसी थे। जायसवाल महोदय के अनुसार, वाकाटकों का प्रारंभिक क्षेत्र ओरछा के निकट वागाट था और पुराणों में उनकी प्रारंभिक राजधानी पुरिका बताई गई है। वे अपने मत के समर्थन में एक और रोचक तर्क देते हैं। उनके अनुसार- नागौद और भरहुत जैसे स्थानों के नाम की साम्यता, क्रमशः नागदेय और भारभुक्ति, अर्थात् भरों का प्रांत से है।
विंध्य में नाग-भारशिवों की सांस्कृतिक विरासत
नाग-भारशिवों के लिए विंध्य क्षेत्र केवल एक राजनीतिक शरणस्थली नहीं था, बल्कि उनके साम्राज्य का सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक केंद्र भी था। यही वह भूमि थी जहाँ उन्होंने अपनी शक्ति को संगठित किया और भगवान शिव की उपासना को एक नई पहचान दी। भारशिव शासक परम शैव थे। जैसा कि हमने पहले भी बताया, उन्होंने भगवान शिव को अपने साम्राज्य का सर्वोच्च आराध्य माना और विंध्य क्षेत्र में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण कराया। उनके संरक्षण में यह पूरा क्षेत्र धीरे-धीरे शैव धर्म और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन गया। शिव पूजा, मंदिर निर्माण और धार्मिक परंपराओं को यहाँ नई दिशा और नई ऊर्जा मिली। यही परंपरा आगे चलकर भारत की वैदिक संस्कृति और हिंदू धर्म के पुनरुत्थान का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। लेकिन नाग-भारशिवों का योगदान केवल धर्म तक ही सीमित नहीं था। कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। सामान्यतः गुप्तकाल को भारतीय कला का स्वर्णयुग कहा जाता है, लेकिन बघेलखंड और विंध्य क्षेत्र के साक्ष्य बताते हैं कि उस स्वर्णयुग की नींव उससे पहले ही नाग-भारशिव काल में ही रखी जा चुकी थी। विंध्य क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक शैव मूर्तियाँ, शिवलिंग और मंदिरों के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि गुप्तकाल से पहले ही यहाँ मूर्तिकला और स्थापत्य कला का उल्लेखनीय विकास हो चुका था। जिसने आगे चलकर भारतीय कला को उसके स्वर्णिम शिखर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुखलिंग: नाग-भारशिवों की सबसे बड़ी कलात्मक देन
दरअसल नाग-भारशिवों की सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक योगदान, मुखलिंग परंपरा का विकास है। अर्थात- शिवलिंग पर भगवान शिव का मुख अंकित करने की परंपरा। हालांकि मुखलिंगम बनाने का जिक्र कुषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है, लेकिन भारशिवों के काल में यह कलात्मक शैली विंध्य प्रदेश में भी खूब पल्लवित हुई। बाद में गुप्तकालीन शिल्पकारों ने इसे और अधिक परिष्कृत तथा भव्य रूप दिया। अब उस समय जैन, बौद्ध, शाक्त और वैष्णव धर्मों में सुंदर और भव्य मूर्तियों का निर्माण किया जाता था। इन मूर्तियों में शिल्पकार अपनी कल्पनाशक्ति और कलात्मकता का पूर्ण प्रदर्शन करते थे। लेकिन इसके विपरीत शैवधर्म में प्राचीन समय से ही भगवान शिव की मानवीय प्रतिमाओं की पूजा नहीं होती थी, बल्कि उनकी जगह उनके प्रतीक शिवलिंग की पूजा की जाती थी। अब शिवलिंग के एक प्रतीकात्मक रूप का होने के कारण उसमें कलात्मकता की गुंजाइश ना के बराबर थी। इसी कारण शैव शिल्पकारों को भगवान शिव की मानवाकृति वाली मूर्तियाँ बनाने के अवसर बहुत नहीं मिलते थे। भारशिव शासकों के सरंक्षण और प्रोत्साहन के कारण, उस समय के शिल्पकारों ने शिवलिंग पर भगवान शिव का मुख उकेरना शुरू कर दिया और इसी के साथ मुखलिंग बनाने की परंपरा विकसित होने लगी। इससे शिवलिंग की धार्मिक महत्ता तो बनी ही रही, साथ ही शिल्पकारों को भी अपनी कलात्मकता दिखाने का भी अवसर मिल गया।
भूमरा और नचना-कुठार नागकालीन कला के उदाहरण
विंध्य क्षेत्र में स्थापित मुखलिंग नाग-भारशिव काल की कला के सबसे आकर्षक उदाहरणों में गिने जाते हैं। इनमें उस समय के शिल्पकारों की अद्भुत कल्पनाशक्ति, सूक्ष्म नक्काशी और उच्च कोटि का शिल्प-कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। इस कला परंपरा का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण नागौद के निकट स्थित भूमरा का शिव मंदिर है। यहाँ स्थापित एकमुख शिवलिंग भारतीय शैव कला की अनुपम कृतियों में माना जाता है। मंदिर का भव्य प्रवेशद्वार, अलंकृत चौखट, गंगा और यमुना की मनोहारी प्रतिमाएँ, कीर्तिमुख तथा गणों की सुंदर आकृतियाँ उस समय के शिल्पकारों की असाधारण प्रतिभा को दर्शाती हैं। भूमरा से कुछ ही दूरी पर स्थित नचना-कुठार का पार्वती मंदिर भी नाग-भारशिव कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर आज भी अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है। यहाँ का चतुर्मुख शिवलिंग भारतीय मूर्तिकला की श्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है। यद्यपि कुछ विद्वान इस शिवलिंग को बाद के काल का मानते हैं, फिर भी इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि नचना-कुठार मंदिर की मूल संरचना पूर्व-गुप्तकालीन है, अर्थात इसका संबंध नाग-भारशिव युग से है।
विंध्य से मिलते हैं नागकालीन दूसरे साक्ष्य
इसी क्षेत्र के खोह से प्राप्त एकमुख शिवलिंग भी अपनी कलात्मक उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध है। वहीं रीवा के निकट स्थित बेला-बैद्यनाथ शिव मंदिर को आज कलचुरीकालीन माना जाता हो, लेकिन इसके प्रारंभिक अवशेष गुप्तकाल से भी पहले के, अर्थात नाग-भारशिव काल के ही हैं। इतना ही नहीं, विंध्य और बघेलखंड क्षेत्र से नाग शासकों के अनेक सिक्के स्थापत्य अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये सभी पुरातात्त्विक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि नाग-भारशिव काल में विंध्य प्रदेश केवल एक राजनीतिक शक्ति का केंद्र नहीं था, बल्कि कला, स्थापत्य और शैव धर्म का भी एक समृद्ध और प्रभावशाली केंद्र बन चुका था।
संदर्भ सूत्र-
- डॉ काशी प्रसाद जायसवाल- “अंधकार युगीन भारत”
- अम्बा प्रसाद श्रीवास्तव – “विंध्य भूमि”
- डॉ. अंकित जायसवाल के लेख
- विभिन्न लेख और रिसर्च जनरल




