Mayawati Income Source : देश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थिति को लेकर चर्चा तेज है। संसद और राज्यों की विधानसभाओं में पार्टी की सीटें लगातार कम हुई हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा के इकलौते विधायक के निधन के बाद विधानसभा में उसका कोई सदस्य नहीं है। राज्यसभा में भी मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर पार्टी का कोई सांसद नहीं बचेगा।
1989 के बाद यह पहली बार होगा, जब बसपा संसद और विधानसभा—दोनों जगहों पर मौजूद नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिना सांसद और विधायक के पार्टी अपना खर्च कैसे चला रही है और उसके पास कितना पैसा है?
बसपा की कमाई का बड़ा हिस्सा बैंक ब्याज से
कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की थी। पार्टी का नारा रहा है—‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।’ बीते कई सालों में पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उसके सामने अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती है।
हालांकि, पार्टी की आर्थिक स्थिति अब भी मजबूत बताई जाती है। चुनाव आयोग को दी गई जानकारी के अनुसार, 2024-25 में बसपा की कुल आमदनी 58.58 करोड़ रुपये रही। यह रकम कई क्षेत्रीय दलों की आमदनी से अधिक है।
20 हजार रुपये से ज्यादा का कोई चंदा नहीं
चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों को कुल 11,343 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसमें 6,648.563 करोड़ रुपये ऐसे चंदे थे, जिनकी रकम 20 हजार रुपये से अधिक थी।
बसपा ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उसे इस साल 20 हजार रुपये से ज्यादा का कोई चंदा नहीं मिला। पिछले करीब दो दशकों में यह पहली बार है जब पार्टी ने इस मद में शून्य राशि दिखाई है।
बैंक खातों में 666 करोड़ रुपये
चुनाव आयोग को दिए गए दस्तावेजों के अनुसार, मार्च 2024 में बसपा के पास 739 करोड़ रुपये का फंड था। मार्च 2025 तक यह घटकर 666 करोड़ रुपये रह गया। 31 मार्च 2025 तक पार्टी की संपत्ति का कुल मूल्य 61.52 करोड़ रुपये बताया गया। इसमें पार्टी कार्यालय और इमारतें 23.40 करोड़ रुपये, घर और फ्लैट 9.99 करोड़ रुपये, जमीन 1.76 करोड़ रुपये, फर्नीचर और अन्य सामान 5.65 करोड़ रुपये तथा गाड़ियां 13.30 करोड़ रुपये की थीं। पार्टी ने अपना पैसा देश के आठ बैंकों में रखा है।
ब्याज और सदस्यता शुल्क से आमदनी
बसपा की आमदनी का बड़ा हिस्सा बैंक में जमा रकम पर मिलने वाले ब्याज से आता है। 2024-25 में पार्टी को कुल 58.58 करोड़ रुपये मिले। इसमें 46.28 करोड़ रुपये बैंक ब्याज से आए। सदस्यता शुल्क से पार्टी को 12.30 करोड़ रुपये मिले। पिछले साल यह रकम 26.59 करोड़ रुपये थी। इसके अलावा, कुछ पुरानी संपत्तियां बेचकर पार्टी ने 1.41 करोड़ रुपये जुटाए। बसपा का कहना है कि वह बड़े कारोबारी घरानों से चंदा लेने के बजाय कार्यकर्ताओं के छोटे योगदान और सदस्यता शुल्क पर भरोसा करती है। पार्टी ने इलेक्टोरल बॉन्ड से भी कोई पैसा नहीं लिया था।
आमदनी से ज्यादा हुआ खर्च
2024-25 में बसपा ने चुनावों और संगठन से जुड़े कामों पर 84.46 करोड़ रुपये खर्च किए। पार्टी के रोजमर्रा के कामकाज पर 21.04 करोड़ रुपये और अन्य मदों में 64 लाख रुपये खर्च हुए। इस तरह साल का कुल खर्च करीब 106 करोड़ रुपये रहा।
आमदनी 58.58 करोड़ रुपये और खर्च करीब 106 करोड़ रुपये होने के कारण पार्टी के फंड में कमी आई। मायावती का कहना रहा है कि कारोबारी चंदे से दूर रहकर ही पार्टी वंचित और कमजोर वर्गों के मुद्दे उठा सकती है। वहीं, विरोधी दल टिकट बांटने में पैसे लेने के आरोप लगाते रहे हैं। बसपा इन आरोपों को खारिज करती रही है।
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