मलकपुर तालाब और “मनिगमां के कूकुर” कहावत की कहानी

Malkpur Talab History: हम सभी ने कभी न कभी एक बघेली कहावत अवश्य सुनी होगी- “मनिगमां के कूकुर” या “मनिगमां अस कूकुर”। यह कहावत अधिकतर हँसी-मज़ाक और व्यंग्य में कही जाती है, जब कोई व्यक्ति बेवजह और बेकार इधर-उधर घूमता रहता है। जैसे आजकल नेताओं के पीछे उनके चमचे चलते हैं, तो लोग कहने लगते हैं- “का मनिगमां अस कूकुर बगता हया” इसे सुनकर आप सभी के मन में भी कभी न कभी यह बात अवश्य आई होगी कि इसका अर्थ क्या होता है, आखिर यह कहावत कैसे बनी होगी। तो आइए, आज हम इसी के बारे में जानते हैं।

मलकपुर तालाब में तैरते थे बर्तन

लेकिन उससे पहले हम एक ऐतिहासिक लोककथा सुनते हैं, मनिगमां के मलकपुर तालाब को लेकर, जिसमें इस कहावत के पीछे की बात भी छिपी हुई है। इस तालाब के बारे में बुज़ुर्ग लोग बताया करते हैं कि पहले के समय में इस तालाब में खाना बनाने के बर्तन- तसले, गंजियाँ, कड़ाहियाँ, तवे, चौकी-बेलन आदि पानी में तैरते रहते थे। जब कोई यात्री वहाँ आता और खाना बनाने के लिए बर्तनों को हाथ के इशारे से बुलाता तो वे किनारे तक आ जाते। और खाना बनाने के बाद जब वे बर्तन धोकर तालाब में बहा दिए जाते, तो वे फिर से तालाब में तैरने लगते।

मलकपुर तालाब में डेरा डालते थे यात्री

बहुत पुरानी बात है। मध्यभारत के किसी राज्य के राजा अपनी रानी मलकाबती, परिवार और दल-बल के साथ प्रयागराज गंगा स्नान करने जा रहे थे। अब यदि हम भारत का नक्शा देखें, तो आज के महाकौशल, मालवा और महाराष्ट्र के लोग यदि सड़क मार्ग से प्रयाग और बनारस जाते हैं, तो वे रीवा होकर ही जाते हैं। उसी प्रकार उस समय भी ऐसा ही होता था। उस समय तो और भी साधन -बहुत कम थे, इसलिए यात्राएँ बहुत लंबी होती थीं और कई दिनों तक चलती थीं। प्रयाग पहुँचने से एक दिन पहले रात में यात्रियों का दल मनगवां में अपना पड़ाव डालता था। उसी प्रकार राजा भी रात में मन गमां पहुँचे और वहीं अपना डेरा डाला, जहाँ एक तालाब और बरगद का पेड़ हुआ करता था। वहीं दूर-दूर से तीर्थयात्री आकर अपना डेरा डालते और विश्राम करते थे।

मलकपुर तालाब की अद्भुत लोककथा | Folktale of Malakpur Talab

कहानी है कि उस तालाब में एक केकड़ा रहता था, जो पानी पीने वाले किसी भी यात्री के पेट में पानी के साथ प्रवेश कर जाता था और उसे जलोदर रोग दे देता था तथा उसका पेट फुला देता था। तालाब के पास जो बरगद का पेड़ था, उसमें एक बाँबी थी, जिसमें एक बहुत पुराना साँप रहता था। उस बाँबी के नीचे बहुत बड़ा खजाना दबा हुआ था। बाँबी वह मिट्टी का टीला होता है, जिसे पहले दीमक बनाती हैं और बाद में उसमें साँप रहने लगता है। तो हुआ यह कि जब राजा अपनी रानी और दल-बल के साथ उसी तालाब के किनारे रुके और वहाँ का पानी पिया, तो वह केकड़ा राजा के पेट में चला गया। राजा को जलोदर रोग हो गया और उनका पेट फूलकर दर्द करने लगा। राजा के दल में जो वैद्य और हकीम थे, उन्होंने दवा-दारू दी, लेकिन पेट का दर्द जाने का नाम नहीं ले रहा था। राजा को बहुत कष्ट हो रहा था। रात हुई। सब लोग सो गए। राजा भी सो गए, लेकिन रानी राजा की सेवा के लिए जागती रहीं।

अब साँप और केकड़े में बहुत पुरानी शत्रुता थी। दोनों की बिल्कुल नहीं पटती थी। जब रात हुई और सब लोग सो गए, तब राजा के पेट में घुसे केकड़े और बाँबी में रहने वाले साँप की बातचीत शुरू हुई। साँप ने केकड़े से कहा- “तू बहुत दुष्ट है। पानी पीने वालों के पेट में घुस जाता है। बता, इतने भले राजा के पेट में घुसकर उसे बीमार कर दिया। किसी को यह नहीं पता कि यदि मट्ठे में राई पीसकर मिलाकर राजा को पिला दी जाए, तो तू मर जाएगा और राजा का पेट भी ठीक हो जाएगा।”

यह सुनकर केकड़े ने कहा- “सूप बोले तो बोले, चलनी क्या बोले जिसमें खुद छत्तीस छेद होते हैं। तू कौन-सा कम है। किसी को यह नहीं पता कि तू कितना लोभी है। तेरी बाँबी के नीचे बहुत बड़ा खजाना दबा हुआ है, जिसे तू दबाकर बैठा है। किसी को यह भी नहीं पता कि यदि सरसों का तेल गरम करके बाँबी में डाल दिया जाए, तो तू मर जाएगा और उसके नीचे दबा हुआ खजाना मिल जाएगा।”

जब केकड़े और साँप की यह बातचीत चल रही थी, तब रानी जाग रही थीं और उनकी पूरी बातचीत सुन रही थीं। सुबह हुई। सब लोग उठे, तब रानी ने राजा और सभी लोगों को रात की पूरी बात बता दी। कुछ लोगों ने कहा- “यह तो भ्रम है। रानी साहिबा ने कोई सपना देखा होगा।” लेकिन दल में एक अनुभवी वैद्य थे। वे बोले- “इतना प्रयास करने के बाद भी आराम नहीं मिला, तो चलिए, यह उपाय भी करके देख लेते हैं।”

फिर मट्ठे में सरसों पीसकर मिलाई गई और राजा को पिलाई गई। पेट में घुसा हुआ केकड़ा मर गया और राजा को उल्टी हुई, जिससे केकड़ा बाहर निकल गया। राजा का पेट ठीक हो गया। यह देखकर राजा ने कहा- “जब ऐसी बात है, तो क्यों न इस बाँबी में खौलता हुआ तेल डालकर भी देखा जाए।” राजा के आदेश से सैनिकों ने सरसों का तेल गरम करके बाँबी में डाल दिया। गरम तेल पड़ते ही साँप मर गया। उसके बाद जब बाँबी को खोदा गया, तो उसमें से बहुत बड़ा खजाना निकला। रोग ठीक होने के बाद राजा पहले ही बहुत प्रसन्न थे और इतना बड़ा खजाना मिलने से और भी अधिक प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा- “मेरे स्वस्थ होने और यह खजाना मिलने का पूरा श्रेय रानी साहिबा को जाता है। मैं इस तालाब का विस्तार करवाऊँगा और इसका नाम अपनी रानी के नाम पर मलकसागर रखूँगा।”

पंचतंत्र से मिलती-जुलती है यह कहानी

रानी मलकाबती द्वारा तालाब बनवाए जाने का उल्लेख दीवान जीतन की पुस्तक “रीवा राज्य दर्पण” में मिलता है, लेकिन यह प्रमाणिक इतिहास नहीं बल्कि जनश्रुति पर आधारित है। मुकुंदपुर का रूपसागर तालाब रानी रूपमती द्वारा बनवाया गया माना जाता है, जिन्हें रानी मलकाबती की छोटी बहन माना जाता है। अब आइए, इसका थोड़ा ऐतिहासिक विश्लेषण करते हैं। यदि इस कहानी के बारे में ध्यान से विचार करें, तो पता चलता है कि यह कहानी ‘पंचतंत्र’ के तीसरे तंत्र ‘काकोलूकीयम्’ की “घर का भेद” नामक कहानी पर आधारित है। उसमें दो साँप और एक राजकुमार होते हैं। राजकुमार को भी दो साँपों के कारण ऐसा ही रोग हो जाता है। बाद में राजकुमार की रानी दोनों साँपों की बातचीत सुनकर उनका भेद जान लेती है और अपने राजकुमार को ठीक कर देती है तथा बहुत बड़ा खजाना भी प्राप्त करती है।

मनगमां का पुराना नाम था मलकपुर | Malkpur Talab History

अब आते हैं मलकपुर तालाब पर। कुछ विद्वान और इतिहासकार कहते हैं कि मनिगमां का पुराना नाम मलकपुर था और इसी कारण यह तालाब मलकपुर तालाब के नाम से जाना जाता है। कुछ विद्वान मलकपुर बसाने का श्रेय राजा मलकेश्वर को देते हैं। उनके अनुसार राजा मलकेश्वर का युद्ध सेंगर राजाओं से हुआ था और उन्होंने सेंगरों का बड़ा क्षेत्र जीतकर मनिगमां को अपनी सीमा बनाया था। उन्हीं राजा मलकेश्वर के नाम पर यह मलकपुर नगर बसाया गया।

कौन थे राजा मलकेश्वर

कनिंघम साहब के अनुसार मलकेश्वर बघेलवंश के थे और गहोरा के राजा थे। दलकेश्वर और मलकेश्वर दो भाई थे। दोनों ने कालिंजर की रक्षा के लिए चंदेलों के साथ मिलकर दिल्ली सल्तनत की सेना से बहुत भयंकर युद्ध लड़ा था। फ़ारसी इतिहासों में इन्हें दलकी-मलकी कहा गया है। हालाँकि कुछ इतिहासकार दलकेश्वर और मलकेश्वर को बघेलवंश का नहीं मानते।

प्रयाग यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव था मनिगमां

अब जो भी रहा हो चाहे यह तालाब रानी मलकाबती ने बनवाया हो, या राजा मलकेश्वर ने बनवाया हो, या किसी सेंगर राजा ने। यह भी संभव है कि इसे किसी यात्री या फिर किसी लमाना समुदाय ने बनवाया हो। लेकिन इतना अवश्य माना जा सकता है कि यह मलकपुर तालाब उसी समय का बना हुआ होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि उस समय मनिगमां एक बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव था और बहुत प्रसिद्ध भी था, क्योंकि मध्यभारत से प्रयाग और बनारस जाने वाले यात्री और व्यापारी इसी मार्ग से गुजरते थे। मनिगमां का मलकपुर तालाब यात्रियों के ठहरने का प्रमुख स्थान था। इसलिए यहाँ बहुत से तीर्थयात्री और व्यापारी आया करते थे। लंबी यात्राएँ करके लोग यहाँ डेरा डालते, खाना बनाते और रात में रुककर विश्राम करते थे।

‘मनिगमां के कूकुर’ कहावत की कहानी

अब चूँकि जब लोग आते, रुकते और खाना बनाते थे, तो रोटी और जूठे भोजन के लालच में आसपास के चार-पाँच कोस तक के बहुत से कुत्ते वहाँ इकट्ठा हो जाते थे और जूठन के लालच में इधर-उधर घूमते रहते थे। धीरे-धीरे मनिगमां में कुत्तों की इतनी अधिक संख्या लोगों के बीच चर्चा का विषय बनने लगी। लोग कहने लगे- “मनिगमां में तो बहुत कुत्ते हैं और वे हर समय इधर-उधर घूमते रहते हैं।” इसी से आगे चलकर लोक में “मनिगमां के कूकुर” कहावत प्रचलित हो गई और धीरे-धीरे बहुत प्रसिद्ध हो गई। इस तालाब को लेकर पहले एक और कहावत भी बहुत कही जाती थी- “काहे मान मनिगमां का जइहीं, काहे मलकपुर रोटी खइहीं।” अर्थात, मानसिंह मनिगमां क्यों जाएँगे और मलकपुर तालाब पर क्यों रुककर भोजन करेंगे? अब यह मानसिंह कौन हैं, यह तो हम निश्चित रूप से नहीं बता सकते। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि ये आमेर के राजा मानसिंह हैं, जो अकबर के समय बंगाल के सूबेदार थे और जिन्होंने बनारस तथा प्रयाग में अनेक मंदिर बनवाए थे।

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