Lal Shyamshah Biography: 1857 की क्रांति, जिसे भारतीय इतिहास में पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, इसने पूरे देश में अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। इस क्रांति की लपटें पूरे उत्तर भारत के साथ-साथ विंध्य क्षेत्र तक भी पहुँच गई थीं। तब विंध्य की धरती के कई क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करते हुए देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इन्हीं वीर क्रांतिकारियों में से एक थे लाल श्यामशाह, जिन्होंने क्रांति के समय अंग्रेजों के विरुद्ध केवल हथियार उठाकर युद्ध ही नहीं किए, बल्कि विंध्य क्षेत्र में चल रहे इस संघर्ष को आर्थिक सहयोग देते हुए इसे पोषित भी किया। अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को जारी रखने के लिए उन्होंने अपनी समस्त जमीन-जायदाद, संपत्ति और पत्नी के आभूषण तक क्रांति को समर्पित कर दिए।
कौन थे लाल श्यामशाह | Who was Lal Shyam Shah?
लाल श्याम शाह 1857 की क्रांति के समय रीवा रियासत के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ठाकुर रणमत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों के साथ, कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया था। वह मूलतः रीवा नहीं बल्कि कोठी रियासत से संबंधित थे, माना जाता है कसौटा का राजघराना बघेलों के मूलपुरुष व्याघ्रदेव के दूसरे पुत्र कंधरदेव से है। इसी कसौटा की शाखा से ही सतना जिले की पूर्व कोठी रियासत का राजवंश है। इसी कोठी राजघराने से दो वीर भाई तख्त सिंह और बख्तावर सिंह, महाराजा विश्वनाथ सिंह के जमाने में रीवा आ गए थे, रीवा राज्य से उन्हें सुमेदा, बाबूपुर और पुरैनी तीन गाँव मिले थे, बाद में इन्हें खम्हरिया नाम का गाँव भी मिला था। इन भाइयों ने सुमेदा को अपना निवास स्थान बनाया, बड़े भाई तख्त सिंह की तो निःसंतान ही मृत्यु हो गई थी, लेकिन छोटे भाई बख्तावर सिंह का वंश चला, उनके पुत्र सीवा सिंह थे। सीवा सिंह महाराज विश्वनाथ सिंह के विश्वासपात्र प्रमुख सरदारों में से एक थे, बड़े आखड़ची और बलिष्ठ थे, इन्होंने रीवा के उपरहटी मुहल्ले में भगवान नृसिंह के मंदिर का भी निर्माण करवाया था।
कब और कहाँ हुआ था लाल श्यामशाह का जन्म | When and where was Lal Shyamshah born?
इन्हीं सीवा सिंह के पुत्र हुए श्यामशाह, जिनका जन्म खम्हरिया गाँव में अनुमानतः 1822-23 में हुआ था। श्यामशाह बचपन से ही बहुत होनहार और साहसी प्रवृत्ति के थे। पिता की तरह ही नित्य अखाड़ा लोटना उनको प्रिय था, घुड़सवारी भी पसंद थी, शरीर भी लंबा चौड़ा और बलिष्ट था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। संस्कृत और फारसी जैसी भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। कहा जाता है कि वह नियमित रूप से भगवद्गीता और तुलसीदास कृत रामचरितमानस का पाठ किया करते थे। यहां तक कि मानस की एक प्रतिलिपि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से लिख कर तैयार की थी।
श्यामशाह की वीरता के कई किस्से
उनके वीरता के कई किस्से प्रसिद्ध हैं, ऐसा ही एक प्रसंग बताया जाता है। एक बार बकिया के एक बैलो ब्राह्मण ने महाराजा विश्वनाथ सिंह से शिकायत की कि भदनपुर वालों ने उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। महाराजा ने युवा श्यामशाह को वह जमीन ब्राह्मण को वापस दिलाने का आदेश दिया। श्यामशाह वहां पहुंचे और लड़-झगड़ कर जमीन ब्राह्मण को वापस दिला दी। उनकी इस सफलता से महाराजा प्रसन्न हुए और उन्हें तीस एकड़ जमीन इनाम में दी। एक दूसरा किस्सा भी मिलता है। राज्य के बरदी परगने में कुछ उपद्रव हुआ। महाराज ने सीवा सिंह को उसे शांत करने का आदेश दिया। लेकिन श्यामशाह जिद करके खुद पिता की जगह चले गए और उपद्रव शांत करके लौटे। जब महाराजा को यह बात पता चली तो उन्होंने सीवा सिंह से नाराज होकर कहा- “तनख्वाह तुम लेते हो और लड़ने-भिड़ने अपने लड़के को भेज देते हो?” सीवा सिंह ने जवाब दिया- “मैं क्या करूं महाराज, लड़का बहुत जिद्दी है।” यही वीरता, स्वाभिमान और जिद आगे चलकर श्यामशाह की पहचान बनी एवं वह रीवा महाराजा की नजरों में आए और आगे चलकर वह रियासत के सेना में भर्ती होकर कार्य करने लगे।
तिलंगा की वजह से बढ़ा आक्रोश
इसी बीच देश में क्रांति के बादल छा गए, भारत के कई हिस्सों में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह भड़क चुका था। रीवा भी इससे अछूता नहीं ना रहा। यहाँ भी क्रांति की सुगबुगाहट और अकुलाहट महसूस की जा रही थी, संयोग वश इसी समय एक घटना घट गई। सुप्रसिद्ध विद्वान कुंवर रविरंजन सिंह की किताब “तब और अब रीवा” के अनुसार- कहीं से सदाशिव नाम का एक तिलंगा ब्राम्हण रीवा आ पहुंचा, यहाँ वह लोगों के बीच कथा कहता था। रीवा राज्य के दीवान मड़रिहा दीनबंधु पांडे को यह शंका हुई यह क्रांतिकारियों का जासूस हो सकता है, जो कमल और रोटी लेकर क्रांति की राष्ट्रव्यापी योजना के तहत यहाँ आया है। ध्यान दें तो 1857 के विद्रोह के समय कमल का फूल और रोटी क्रांति का संदेश देने का प्रतीक थे। हालांकि यह निश्चित नहीं था कि वह क्रांतिदूत ही था। फिर भी दीवान साहब ने पॉलिटिकल एजेंट विलोबी आसवर्न के कान भर दिए, कि यह तात्या टोपे और क्रांतिकारियों का जासूस हो सकता है, इसीलिए उस ब्राम्हण को जेल में बंद कर दिया गया और उसे फांसी देने की तैयारी की जाने लगी।
श्यामशाह ने साथियों सहित किया विद्रोह
यहाँ के देशभक्त सैनिक जो मुख्यतः ठाकुर थे, किसी मौके की तलाश में ही थे, उन्हें एक अच्छा मौका मिल गया। लाल धीर सिंह के नेतृत्व में ठाकुर रणमत सिंह, लाल श्यामशाह, लाल पंजाब सिंह और पहलमान सिंह चंदेल इत्यादि ने मिलकर, ‘जय ब्राम्हण देवता’ के नारे के साथ, रीवा में अंग्रेजी सरकार के पॉलिटिकल एजेंट विलोबी आसवार्न के बंगले को जा घेरा, आज का मार्तंड क्र.1 स्कूल ही, तब का पॉलिटिकल एजेंट का दफ्तर हुआ करता था। किसी क्रांतिकारी ने एजेंट पर गोली चला दी, लेकिन वह बच गया और चोरी-छुपे बंगले से निकल भागा। ब्राम्हण को छुड़ा लिया गया। लेकिन इधर दीवान दीनबंधु ने पॉलिटिकल एजेंट को क्रांतिकारियों के नाम बताए। ये सभी रियासत की नौकरी में थे, लिहाजा इन सब को नौकरी से निकाल दिया गया।
राज्य के बाहर क्रांतिकारियों से संपर्क
लेकिन एजेंट साहब शायद यह नहीं समझ पाए, कि नौकरी से निकालकर उन्होंने इन लोगों को रोकने के बजाय खुलकर क्रांति में उतरने का रास्ता दे दिया था। क्रांतिकारी अब राज्य से मुक्त होकर पूरी तरह अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रिय हो गए और रीवा से बाहर के क्रांतिकारियों से भी संपर्क करने की कोशिस करने लगे, तात्या टोपे से संपर्क के लिए कम से कम तीन बार पत्र भेजे गए थे, बाबू कुंवर सिंह और अवध के राणा बेनीमाधव से भी पत्राचार किए गए थे। हालांकि ये क्रांतिकारी अंग्रेजों की मजबूत घेराबंदी तोड़कर कानपुर या झांसी नहीं जा सके। लेकिन उन्होंने विंध्य की धरती पर ही अंग्रेजों के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा जरूर खड़ा कर दिया।
क्रांतिकारियों का नागौद छावनी पर हमला
अंग्रेजों ने रणनीतिक दृष्टि से रीवा और बुंदेलखंड के एकदम मध्य में होने के कारण नागौद में अपनी छावनी स्थापित की, जहाँ हथियारों के साथ उनका खजाना भी था। इसीलिए आरा-बिहार के बाबू कुंवर सिंह नागौद की तरफ बढ़ रहे थे। जब विंध्य के क्रांतिकारियों को इसकी खबर लगी तो वे भी नागौद की तरफ निकल गए और वहाँ स्थित अंग्रेज छावनी और ट्रेजरी पर आक्रमण कर उसे लूट लिया, वहाँ का एजेंट एलिस भाग कर अजयगढ़ चला गया। क्रांतिकारियों के दल ने उसका पीछा किया और भिल्लसाँय के मैदान में रीवा, नागौद, कोठी एवं सोहावल राज्य के क्रांतिकारियों एवं अंग्रेज सेना के मध्य घमासान युद्ध हुआ, विजय क्रांतिकारियों को मिली थी।
लाल श्यामशाह ने अंग्रेजों का संचार तंत्र बाधित कर दिया
नागौद और भिल्लसायं की विजय के बाद क्रांतिकारियों ने लाल श्यामशाह और रणमत सिंह के नेतृव में पूरे ग्रेट डेक्कन रोड पर नियंत्रण स्थापित कर जबलपुर और इलाहाबाद-बनारस के मध्य अंग्रेजों के पूरे संचार तंत्र को अवरुद्ध कर दिया। इसकी पुष्टि रीवा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार अख्तर हुसैन निज़ामी के लेख “रीवा पास्ट और प्रजेंट” से भी होती है। रीवा रणनीतिक रूप से तब बहुत अहम था, राजधानी कलकत्ता से तब बॉम्बे और मद्रास प्रेसिडेंसी का रास्ता और डाक यहीं से होकर जाता था। लाल श्यामशाह का उद्देश्य इसे बाधित करना था और वह सफल हुए भी।
1857 क्रांति में लगा दिया समस्त धन
इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है, वह बेहद धनी थे और उन्होंने अपना सारा धन अपनी सेना को बनाने, उनके रखरखाव और अंग्रेजों से लड़ाई में ही खर्च कर दिया था। दरअसल उन्हें पता चला कि मद्रास रेजीमेंट के लगभग तीन सौ सिपाही सागर और दमोह की अंग्रेज छावनी में विद्रोह करके जबलपुर में इकट्ठा हैं। अगर इन्हें खाना-खर्चा दिया जाए, तो वह उनके साथ मिल सकते हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने एक साथी और सेवक कालू कोटवार को पत्र लेकर उन सैनिकों को बुलाने के लिए भेजा, लेकिन उसे बीच में ही अंग्रेजी सेना द्वारा पकड़ लिया गया। तब उन्होंने अपने एक और विश्वस्त सेवक एवं साथी भोला बारी को पत्र लेकर जबलपुर भेजा, जिसके बाद मद्रास रेजीमेंट के सैनिक श्यामशाह के साथ मिल गए।
डेविड ई.यू. बेकर अपनी किताब “बघेलखंड ऑर द टाइगर लेयर” में लिखते हैं कि-
ठाकुर श्याम शाह बघेल ने रीवा, शहडोल और कटनी क्षेत्र में करीब 300 सैनिकों की एक मजबूत सेना का नेतृत्व किया। 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और अंग्रेजों की रसद और आपूर्ति व्यवस्था को लगातार बाधित किया। बघेलखंड में हुई कई लड़ाइयों में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को भी हराया।
सोहागपुर की क्रांति में लाल श्यामशाह
इसी समय सोहागपुर के जागीरदार ठाकुर गरुड़ सिंह और उनके भाई भरत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए बिलासपुर से कैप्टन विलिंग्टन के नेतृत्व में आगे बढ़ते हुए सोहागपुर पर आक्रमण कर दिया। जब लाल श्यामशाह को यह बात पता चली, तो वह अपने करीब 200 साथियों सहित सोहागपुर के ठाकुर बंधुओं की मदद के लिए गए। जबरजस्त युद्ध हुआ, अंग्रेज सेनानायक मारा गया और उसकी सेना भाग गई।
चंदिया में अंग्रेजों से जोरदार भिड़ंत
लेकिन उधर जबलपुर से कर्नल रॉबर्टसन भी बड़ी फौज लेकर सोहागपुर की तरफ बढ़ रहा था। लाल श्याम शाह और क्रांतिकारियों की रॉबर्टसन के नेतृव वाली अंग्रेजी फौज की मुठभेड़ चंदिया में महानदी के किनारे हो गई। अंग्रेजों के पास तोपखाना था, वह आग उगल रहा था। क्रांतिकारी तलवारों से लड़ रहे थे, बंदूक भी यदा-कदा किसी के पास थी। ऐसे में सीधे मुकाबले में अंग्रेजों को हराना आसान नहीं था। इस स्थिति में श्यामशाह ने एक रणनीतिक योजना बनाई। उन्होंने अपनी सेना को दो भागों में बांट दिया और दोनों को पत्थरों, चट्टानों और पेड़ों की आड़ में छिपकर आगे बढ़ने का निर्देश दिया। योजना के मुताबिक, क्रांतिकारियों की पहली टुकड़ी ने नालों और चट्टानों की ओट लेते हुए उत्तर दिशा से अंग्रेजी सेना पर अचानक हमला कर दिया। इससे पहले अंग्रेजी सैनिक इस हमले को समझ पाते कि तभी दक्षिण की तरफ से दूसरी टुकड़ी ने आक्रमण कर दिया। अचानक हुए इस दोतरफा हमले से अंग्रेजी सेना घिर गई, अंग्रेजी सैनिकों और क्रांतिकारियों के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। संघर्ष में कई अंग्रेज सैनिक मारे गए और घायल हुए, जबकि बाकी सैनिक जान बचाकर पश्चिम दिशा की तरफ भाग गए। लाल श्यामशाह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने यहां जिस अदम्य साहस और जुझारूपन के साथ अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया, उसी के कारण आज भी यह स्थान ‘जुझार घाट’ के नाम से जाना जाता है।
कटनी बाजार में अंग्रेजों के साथ युद्ध
अंग्रेजों के साथ उनकी अगली भिड़ंत कटनी बाजार में हुई, जब उन्हें पता चला, अंग्रेज नगर के महाजनों को लूट रहे हैं। यह खबर मिलते ही श्याम शाह अपने साथियों के साथ आगे बढ़े और अंग्रेजों से भिड़ पड़े, अंग्रेजों को हार का सामना करना पड़ा। कटनी से आगे वह विजयराघवगढ़ के राजा की मदद के लिए भी जाना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों की मजबूत घेराबंदी वह नहीं तोड़ पाए। घूमते-फिरते कोठी राज्य के खखरा जंगल में उनकी मुलाकात फिर से ठाकुर रणमत सिंह से हुई, उनके साथ मिलकर वह डभौरा और इलाहाबाद आदि में अंग्रेजों से लगातार संघर्ष करते रहे। लेकिन डभौरा के पतन के बाद ठाकुर रणमत सिंह और लाल श्यामशाह के साथ ही बाकि क्रांतिकारी सुरक्षा की दृष्टि से क्योटी की गढ़ी में आ गए। लेकिन पीछा करती हुई अंग्रेज और रीवा की सेना ने क्योटी की गढ़ी को आ घेरा। रीवा की सेना का नेतृत्व ठाकुर दलथम्हन सिंह कर्चुली कर रहे थे, वह अपने पूर्व साथियों से सहानुभूति रखते थे और उनसे लड़ना नहीं चाहते थे, इसीलिए उन्होंने पहले ही क्रांतिकारियों को इसकी सूचना देकर सतर्क कर दिया।
क्योटी में छूटा क्रांतिकारियों का साथ
कहते हैं गढ़ी के अंदर उस समय ज्योनार अर्थात दोपहर के भोजन की तैयारी चल रही थी, ठाकुर रणमत सिंह और लाल श्यामशाह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना से जबरजस्त युद्ध किया, इस युद्ध में एक अंग्रेजी कर्नल भी रणमत सिंह के हाथों मारा गया, अंग्रेजी सेना तितर-बितर हो गई, लेकिन अंग्रेजी सेना की नई टुकड़ियों की आने की सुनकर क्रांतिकारी भी यहाँ ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए और यहीं से ठाकुर रणमत सिंह और लाल श्यामशाह का साथ छूट गया। जहां ठाकुर रणमत सिंह बहुती की तरफ चले गए, वहीं लाल श्यामशाह दक्षिण के जंगलों में चाँग-भखार की तरफ चले गए, वहाँ झांपीडोंगरी में भटकते हुए बुड़वा के जंगलों में जा पहुंचे। कहा जाता है ठाकुर रणमत सिंह और लाल श्यामशाह की छवि एक ही जैसी थी, दोनों हमउम्र भी थे, इसीलिए वहाँ के जमींदार ने, ठाकुर रणमत सिंह के भ्रम में आकर, ईनाम के लालच में, उन पर छिप के वार करके उन्हें मार डाला।
कैसे हुई लाल श्यामशाह की मृत्यु | How did Lal Shyamshah die?
लेकिन कुछ ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार क्योटी की जबरजस्त लड़ाई के बाद क्रांतिकारी अलग-अलग हो गए थे, उनकी शक्ति भी बिखर गई थी। श्यामशाह, जो क्रांतिकारियों की आर्थिक और सामरिक व्यवस्था संभालते थे, नई शक्ति जुटाने के लिए अपने घर लौटे और पत्नी से गहने मांगे। लेकिन सबकुछ तो पहले ही क्रांति में समर्पित हो गया था, घर में कुछ बचा ही नहीं था। लेकिन उनके पिता ने देउरा और बुड़वा के ठाकुरों को कर्ज दिया था, उसी के दो दस्तावेज लिखे हुए थे, जिन्हें पाट कहा जाता था, वही उन्होंने दे दिया। पाट आज के स्टाम्प की तरह ही तब दस्तावेज हुआ करता था। श्यामशाह वह पाट लेकर पहले देउरा गए, लेकिन वहाँ के ठाकुर ने कर्ज चुकाने में असमर्थता और विवशता जाहिर की, पारिणामस्वरूप श्यामशाह वहाँ से बुड़वा के लिए निकल गए। कहते हैं तब तक निरंतर भागदौड़ कर रहे श्यामशाह की तबीयत भी कई दिनों से खराब चल रही थी, वहाँ पहुँचने के बाद उन्होंने पैसे की मांग की, बुड़वा वालों ने कहा- आप अस्वास्थ्य हैं कुछ दिन विश्राम करिए, पैसे तो हमारे पास नहीं हैं पर आप चलिए चचाई वालों से आपको पैसा दिलवा देंगे। इसी बीच उनके साथियों और सेवकों को वहाँ से पहले ही भेज दिया गया था। अब वह एकदम अकेले बचे थे, इन्हीं लोगों के साथ जब वे चचाई की तरफ जा रहे थे तभी पसगढ़ के जंगल में समधिन नदी के पास, ईनाम के लालच में इनकी हत्या कर दी गई। पहले इन्हें पीछे से गोली मारी गई और बाद में पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया। इस घटना का जिक्र मौलवी रहमान अली के ग्रंथ तवारीखे बघेलखंड में हुआ है। इतिहासकार लाल विक्रम सिंह और निज़ामी साहब भी इस मत की पुष्टि करते हैं। कि अपने ही कुछ लोगों ने ईनाम और जागीरों के लालच में आकर उनकी धोखे से हत्या कर दी।
अंग्रेजों द्वारा परिवार के साथ किए गए जुल्म
कहा जाता है, जब लाल श्यामशाह की वीरगति की खबर, महाराजा रघुराज सिंह को लगी, तो वह बेहद विचलित हुए। उनका शव, उनके परिजनों के पास खम्हारिया भेज दिया गया। उन्हें जीते जी कंपनी सरकार कभी भी नहीं पकड़ पाई। लेकिन उनकी वीरगति के बाद उनके परिजनों पर अंग्रेजों द्वारा बहुत ही ज्यादा जुल्म किए गए। उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई, रीवा राज्य द्वारा दी गईं पवाइयाँ भी छीन ली गईं, इसीलिए कई सालों तक वह मारे-मारे फिरते रहे, लेकिन भाग्यवश खम्हारिया गाँव, जो दुबहा के अवस्थियों के यहाँ गिरवी रखा था, वह बच गया था, कालांतर में उनकी पत्नी ने ऋण चुकाकर उसे फिर से अपने अधिकार में कर लिया।
लाल श्यामशाह की पत्नी थीं वीरांगना
इतिहासकारों के अनुसार लाल श्याम शाह की पत्नी भी बेहद साहसी, स्वाभिमानी और तेज-तर्रार स्वभाव की थीं, वह जैतवारा के पास गड़री गांव की चंदेल कन्या थीं और रिश्ते में ठाकुर रणमत सिंह की ममेरी बहन थीं। कहा जाता है उनकी मृत्यु 1924 में, करीब 100 वर्ष की अवस्था में हुई। इतनी विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। श्यामशाह जब अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, तब वह उनके रास्ते की रुकावट नहीं बनीं, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करती रहीं और घर की जिम्मेदारी और खेती-बाड़ी स्वयं संभाल ली। जब
श्यामशाह का शव उनके पास आया तो उन्होंने क्रोधवश उसे लेने से इंकार कर दिया और ललकारते हुए कहा-
“”एका लय जा, रघुराज सिंह का दय दिहा, कहयै उनकर सोथा पूर होइगा, अब एकर रक्का बनाय के डरबाय लेइहीं अउ खाय लेइहीं”“
मतलब- इसे ले जाओ, रीवा महाराज से कहना इसका अचार डलवा लेंगे। हालांकि बाद में परिजनों और राज्याधिकारी सरदार नरहर सिंह कर्चुली के समझाने के बाद वह मानीं और उनके नाबालिग पुत्र बजरंग सिंह ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया।
32 की उम्र में बड़ा बलिदान
तो यह थी कहानी विंध्य क्षेत्र में आजादी के मतवालों में से एक, लाल श्यामशाह की, जिनकी देशभक्ति और वीरता के किस्से विंध्य में आज भी प्रचलित हैं। शहादत के वक्त लाल श्यामशाह की उमर करीब 32 वर्ष की थी और उनका एक छोटा बेटा भी था। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इस उम्र और ऐसी परिस्थिति में ऐसा साहसपूर्ण कार्य कोई विरला ही कर सकता है। शब्द सांची विंध्य की टीम अपने विंध्य के लाल और मातृभूमि प्रेमी अमर बलिदानी लाल श्यामशाह को शत-शत प्रणाम करती है।
लेख के संदर्भ
- भगवानदास श्रीवास्तव की किताब ‘बघेलखंड में स्वतंत्रता आंदोलन’
- डॉ एस. अखिलेश की किताब “रीवा राज्य का इतिहास”
- कुंवर रविरंजन सिंह की किताब “तब और अब रीवा”
- दीवान जीतन सिंह की किताब “रीवा राज्य दर्पण”
- “रीवा स्टेट गजेटियर” और प्रोफेसर राधेशरण द्वारा लिखा गए लेख का रेफरेंस लिया है।




