Israel Elections Result : ईरान को आंख दिखाने वाले नेतन्याहू को इजरायल की जनता ने ठुकराया, 8 सीटों से नहीं बनी सरकार

benjamin netanyuh

Israel Elections Result : “लोकतंत्र में सत्ता किसी की जागीर नहीं होती… जनता अपने जद में आती है और खुद फैसला सुनाती है तो बड़े-बड़े सियासी राजाओं के किले भी ध्वस्त हो जाते हैं”। ये कहावत तो आपने सुनी होगी, इसके कई उदाहरण भी आपने सुने होंगे। इस समय इजरायल में भी कुछ यही देखने को मिल रहा है।

पूरी दुनिया को अपनी सैन्य ताकत दिखाने वाले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो खुद को सर्वशक्तिशाली कहने वाले ट्रंप के आगे भी नहीं झुके, उन्हें उन्हीं की इजरायली जनता ने ठुकरा दिया है। नेतन्याहू के सामने अब अपनी ही संसद में बहुमत जुटाने की चुनौती खड़ी हो गई है। जिन नेतन्याहू के बारे में कहा जाता रहा कि इजरायल की राजनीति में उनका कोई विकल्प नहीं है, चुनाव के नतीजों ने उन्हीं के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इजरायल में किसको कितनी सीटें मिली?

120 सीटों वाली इजरायली संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है, लेकिन नेतन्याहू का गठबंधन महज 53 सीटों पर सिमट गया है। विपक्ष को 48 सीटें मिली हैं, जबकि दो अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने मिलकर 19 सीटों पर कब्जा जमाया है। यानी सत्ता की इस पूरी बाजी में अब वे पार्टियां सबसे अहम हो गई हैं, जिन्हें चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू की तरफ से निशाने पर लिया जाता रहा।

दिलचस्प बात ये है कि नेतन्याहू ने चुनावी नतीजों के बाद अरब पार्टियों पर वोट चोरी और विदेशी हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। लेकिन चुनाव अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर धांधली के दावों को खारिज किया है।

इजरायल में सरकार बनाने का गणित 

अब सवाल ये है कि क्या अरब पार्टियों की बढ़ी हुई राजनीतिक ताकत नेतन्याहू की सत्ता का रास्ता रोक देगी? क्या विपक्ष इन पार्टियों के समर्थन से नई सरकार बना पाएगा? और क्या नेतन्याहू अपनी राजनीतिक कुर्सी बचाने के लिए कोई नया सियासी दांव चलेंगे? 

चलिए, आपको इजरायल की राजनीति का पूरा गणित समझाते हैं… सबसे पहले समझिए कि इजरायल के चुनाव में आखिर हुआ क्या है? तो बता दें कि 27 अक्टूबर 2026 को इजरायल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान हुआ। इसके नतीजों ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं और सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। लेकिन इस बार किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।

किसको कितनी सीटें मिली?

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिली हैं। उनके दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को मिलाकर कुल 53 सीटें हासिल हुई हैं। यानी बहुमत से नेतन्याहू का गठबंधन 8 सीट दूर रह गया। दूसरी तरफ गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले नेतन्याहू विरोधी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। इसमें यशार पार्टी को 21, बी’याचाद को 12, द डेमोक्रेट्स को 8 और यिसराएल बेतेनु को 7 सीटें मिली हैं। यानी विपक्ष को बहुमत तक पहुंचने के लिए 13 सीटों की जरूरत है।

अरब पार्टियों की 19 सीटें बनी किंगमेकर 

अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों- जॉइंट लिस्ट और रा’अम ने मिलकर, 19 सीटें हासिल की हैं। जॉइंट लिस्ट को 11 और रा’अम को 8 सीटें मिली हैं। ये संख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली संसद में इन पार्टियों के पास कुल 10 सीटें थीं। इस बार उनकी ताकत लगभग दोगुनी हो गई है।

यानी इजरायल की राजनीति में अब सरकार बनाने का रास्ता काफी हद तक इन 19 सांसदों के रुख पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है। यहां एक बात समझना जरूरी है कि सबसे बड़ी पार्टी बनना और सरकार बना लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी जरूर है, लेकिन बहुमत का आंकड़ा उसके पास नहीं है।

नेतन्याहू के इजरायल में कैसे मजबूत हुईं अरब पार्टियां?

अब सवाल है कि आखिर इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों की इतनी अहमियत क्यों बढ़ गई है? दरअसल, इजरायल की कुल आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है। इनमें बड़ी संख्या फिलिस्तीनी मूल के अरब नागरिकों की है। हालांकि इस समुदाय में मुस्लिम, ईसाई और अन्य धार्मिक पहचान वाले लोग भी शामिल हैं।

लंबे समय से इजरायल की राजनीति में अरब नागरिकों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर बहस होती रही है। इस बार चुनाव में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का प्रदर्शन पहले के मुकाबले काफी बेहतर रहा है। जॉइंट लिस्ट और रा’अम ने मिलकर 19 सीटें हासिल की हैं। इसका मतलब है कि अब इजरायल की संसद में उनकी आवाज पहले से ज्यादा मजबूत होगी। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि सत्ता में उनकी भूमिका का है।

इजरायल में नेतन्याहू की सत्ता पर संकट

– इजरायल में कुल सीटें – 120
– सरकार बनाने के लिए 61 सीटें जरूरी
– नेतन्याहू बहुमत से 8 सीट दूर
– विपक्ष के पास हैं 48 सीटें
– सहयोगी दलों से लेनी होंगी 19 सीटें 
– 19 सीटें पाकर नेतन्याहू के पास होंगी 67 सीटें
– सत्ता बचाने के लिए गठबंधन ही आखिरी रास्ता

8 सीटों से बहुमत से दूर हैं नेतन्याहू 

विपक्ष के पास 48 सीटें हैं। अगर उसे अरब पार्टियों की सभी 19 सीटों का समर्थन मिल जाता है तो कुल संख्या 67 हो जाएगी। यानी 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े से 6 सीट ज्यादा। इस स्थिति में विपक्ष नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने की स्थिति में आ सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा सियासी पेंच भी है। विपक्ष के सभी दल अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को लेकर एकमत नहीं हैं।

इजरायल की राजनीति में सुरक्षा, फिलिस्तीन का मुद्दा और अरब पार्टियों की वैचारिक स्थिति गठबंधन की राह को मुश्किल बनाते हैं। यानी 19 सांसदों का समर्थन विपक्ष के लिए बहुमत का रास्ता तो खोल सकता है, लेकिन राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि इन पार्टियों को इस चुनाव का किंगमेकर कहा जा रहा है।

इजरायल में चुनाव में भी वोट चोरी का आरोप 

चुनाव के रुझानों में नेतन्याहू के लिए मुश्किलें दिखाई देने लगीं तो उनकी पार्टी लिकुड ने अरब नेतृत्व वाली पार्टियों पर चुनावी गड़बड़ी के आरोप लगाए। लिकुड की तरफ से दावा किया गया कि चुनाव चुरा लिया गया है और इसके पीछे विदेशी हस्तक्षेप की भूमिका हो सकती है। कुछ नेताओं ने इस पूरे मामले में कतर का नाम भी लिया।

सवाल ये है कि क्या इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत सामने आया है? अब तक सार्वजनिक रूप से बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली या विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया है। इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति के अधिकारियों ने भी इन दावों पर सवाल उठाए हैं।

चुनाव समिति ने वोट चोरी के जाँच के आदेश दिये 

चुनाव समिति के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के जज नोम सोहलबर्ग ने विदेशी हस्तक्षेप को लेकर सामने आई सूचनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसी शिन बेट से जांच करने को कहा। हालांकि उन्होंने इन आरोपों की पुष्टि नहीं की। वहीं केंद्रीय चुनाव समिति के कार्यवाहक निदेशक डीन लिवने ने बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली की खबरों को बेबुनियाद बताया।

समिति ने साफ किया कि चल रही जांच का चुनाव के अंतिम नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और यह जांच किसी खास आबादी या समुदाय को निशाना बनाकर नहीं की जा रही है। यानी चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों की जांच अपनी जगह है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया है जिससे पूरे चुनाव को प्रभावित मान लिया जाए।

क्या नेतन्याहू को इजरायल की जनता ने ठुकराया?

अब नेतन्याहू की राजनीति पर सवाल उठना लाजिमी है। जब जनता का फैसला आपके पक्ष में आए तो लोकतंत्र की जीत और जब वही जनता आपके सियासी समीकरण को उलझा दे तो चुनावी प्रक्रिया पर सवाल?

आखिर लोकतंत्र का पैमाना सत्ता में बैठे किसी नेता की राजनीतिक सुविधा से तो तय नहीं हो सकता। किसी भी समुदाय के नागरिकों को वोट देने का अधिकार है और उनके वोट से चुने गए प्रतिनिधियों को संसद में अपनी भूमिका निभाने का पूरा हक है। चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों पर विपक्ष ने भी नेतन्याहू को घेरना शुरू कर दिया है।

नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने आरोप लगाया कि लिकुड चुनाव की वैधता पर इसलिए सवाल उठा रही है क्योंकि उसे उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। उनका कहना है कि चुनावी हार के बाद इस तरह के आरोप लगाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करना ठीक नहीं है। दूसरी तरफ अरब नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट ने भी नेतन्याहू पर निशाना साधा।

पार्टी का आरोप है कि नेतन्याहू अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं रा’अम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास ने जांच का स्वागत किया, लेकिन कथित विदेशी हस्तक्षेप से अपनी पार्टी का कोई संबंध होने से इनकार किया। उन्होंने नेतन्याहू पर अरब समुदाय के खिलाफ माहौल बनाने का आरोप लगाया।

इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भी इस पूरे घटनाक्रम को संवेदनशील बताते हुए निष्पक्ष जांच की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले किसी पूरे समुदाय को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। दरअसल, यहां लड़ाई सिर्फ सरकार बनाने की नहीं है, बल्कि इजरायल की राजनीति में अरब नागरिकों की स्वीकार्यता और उनके राजनीतिक अधिकारों को लेकर भी है।

क्या गादी आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से बना पाएंगे सरकार?

सियासी गणित के हिसाब से गादी आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बना पाएंगे, ये संभव दिखाई देता है। विपक्ष की 48 और अरब पार्टियों की 19 सीटें मिलाकर 67 हो जाती हैं। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां इस गणित को थोड़ा मुश्किल बना रही हैं।

दरअसल, इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों को लेकर कई दलों की अपनी वैचारिक और राजनीतिक आपत्तियां हैं। नेतन्याहू पहले ही इन पार्टियों के साथ काम करने से इनकार कर चुके हैं। वहीं विपक्षी खेमे में भी सभी दल इस बात पर सहमत नहीं हैं कि अरब पार्टियों को सरकार में शामिल किया जाए।

सरकार किसी की भी हो, संसद में बैठेंगी अरब पार्टियां 

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण विकल्प मौजूद है। अरब पार्टियां विपक्षी सरकार में सीधे शामिल हुए बिना भी उसे बाहर से समर्थन दे सकती हैं। ऐसे में वे सरकार के गठन, संसद के अध्यक्ष के चुनाव और महत्वपूर्ण विधायी फैसलों में अपनी भूमिका निभा सकती हैं। जॉइंट लिस्ट के वरिष्ठ नेता अहमद तिबी के मुताबिक, विपक्षी खेमे की तरफ से नेसेट के अध्यक्ष को बदलने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई है।

यानी, अरब पार्टियों के लिए सत्ता में भागीदारी का मतलब सिर्फ मंत्री पद हासिल करना नहीं होगा, बल्कि संसद में अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करना भी हो सकता है। लेकिन अगर विपक्षी दल आपसी मतभेद नहीं सुलझा पाए तो नेतन्याहू को एक बार फिर सरकार बनाने का मौका मिल सकता है।

नेतन्याहू के पास कुर्सी बचाने के लिए तीन विकल्प 

पहला विकल्प- नेतन्याहू फिर से बहुमत जुटाएं

नेतन्याहू के गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। ऐसे में उन्हें बहुमत के लिए कम से कम 8 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा। इसके लिए उन्हें विपक्षी खेमे में सेंध लगाने या दूसरे राजनीतिक दलों के साथ समझौता करने की कोशिश करनी होगी। लेकिन मौजूदा चुनावी नतीजों के बाद यह रास्ता आसान नहीं दिखाई देता।

दूसरा विकल्प- विपक्ष और अरब पार्टियों के साथ नेत्नयाहू गठबंधन कर लें

गादी आइजेनकोट के पास विपक्ष की 48 सीटें हैं। अगर जॉइंट लिस्ट और रा’अम की 19 सीटों का समर्थन मिल जाता है तो संख्या 67 तक पहुंच सकती है। लेकिन इसके लिए विपक्षी दलों को अपनी वैचारिक आपत्तियों से आगे बढ़ना होगा। यह गठबंधन इजरायल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

तीसरा विकल्प – नेतन्याहू राष्ट्रीय एकता सरकार का विकल्प चुन लें

अगर इजरायल में न तो नेतन्याहू और न ही विपक्ष बहुमत जुटा पाता है तो राष्ट्रीय एकता सरकार का विकल्प सामने आ सकता है। इसमें अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दल एक साथ आकर सरकार बनाने पर सहमत हो सकते हैं। हालांकि, इस तरह की सरकार में नीतिगत मतभेदों को संभालना बड़ी चुनौती होगी। और अगर इन तीनों रास्तों में से कोई भी कामयाब नहीं होता तो इजरायल में फिर से चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।

इजरायल में इस बार रिकॉर्ड मतदान हुआ 

इस चुनाव का एक और अहम पहलू रिकॉर्ड मतदान है। इजरायल में इस बार कुल 77.9 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। कुल 57 लाख 16 हजार 665 वोट पड़े। तो ये कह सकते हैं कि इस बार रिकॉर्ड मतदान ने भी इजरायल का सियासी मिजाज बदला है। बताया जा रहा है कि यह पिछले कई दशकों में सबसे अधिक मतदान के आंकड़ों में शामिल है।

मतदान में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी अधिक 

इस बढ़े हुए मतदान को भी चुनाव के नतीजों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन ने इजरायल के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, चुनाव प्रचार के दौरान अरब समुदाय को लेकर हुई बयानबाजी और राजनीतिक हमलों ने भी मतदाताओं को प्रभावित किया हो सकता है।

हालांकि, सिर्फ मतदान प्रतिशत के आधार पर किसी एक समुदाय के वोटिंग व्यवहार का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि इस चुनाव ने इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका को पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है।

कब बनेगी इजरायल में नई सरकार?

चुनाव की मतगणना पूरी हो चुकी है और केंद्रीय चुनाव समिति ने अंतिम नतीजे जारी कर दिए हैं। अब आधिकारिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग को चुनाव के नतीजे सौंपे जाएंगे। इसके बाद राष्ट्रपति अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे और उनसे जानेंगे कि वे अगली सरकार बनाने के लिए किस नेता का समर्थन करना चाहते हैं।

इसके आधार पर राष्ट्रपति किसी नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। लेकिन यहां भी राजनीतिक दलों के सामने बहुमत साबित करने की चुनौती होगी। चुनाव के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया में कई हफ्ते लग सकते हैं। मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए इसमें दो महीने से ज्यादा का वक्त भी लग सकता है।

10 नवंबर तक बनानी होगी सरकार 

फिलहाल 10 नवंबर को नई नेसेट के सदस्यों का शपथ ग्रहण निर्धारित है। राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने सभी दलों से अपील की है कि वे एक और चुनाव की नौबत आने से बचाने के लिए बातचीत का रास्ता अपनाएं। उन्होंने राजनीतिक दलों से खुले मन से बातचीत करने और देश के हित में समाधान निकालने की अपील की है।

यहाँ, दिलचस्प बात ये है कि नेतन्याहू और आइजेनकोट, दोनों ही अगली सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। यानी इजरायल में सत्ता की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि चुनाव के बाद अब असली सियासी मुकाबला शुरू हुआ है।

क्या अरब पार्टियों की 19 सीटें बदलेंगी सत्ता?

इजरायल के इस चुनाव में सबसे बड़ी कहानी सिर्फ नेतन्याहू की सीटें कम होने की नहीं है। सबसे बड़ी कहानी है उन 19 सीटों की, जिन्होंने इजरायल की राजनीति में सत्ता का पूरा गणित बदल दिया है।

एक तरफ नेतन्याहू हैं, जिनके सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है। दूसरी तरफ गादी आइजेनकोट हैं, जो अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की संभावना तलाश रहे हैं। और तीसरी तरफ हैं वे अरब नागरिक, जिनकी राजनीतिक भागीदारी को लेकर इजरायल में लंबे समय से बहस होती रही है।

इजरायल में अब क्या होगा?

अब देखना होगा कि क्या इन 19 सीटों के दम पर अरब पार्टियां इजरायल की अगली सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभा पाएंगी? क्या नेतन्याहू अपनी राजनीतिक रणनीति से एक बार फिर बहुमत का जादुई आंकड़ा छू लेंगे? या फिर इजरायल की राजनीति में एक नए नेतृत्व और नए गठबंधन का दौर शुरू होगा?

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार बनाने का अधिकार सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी को नहीं, बल्कि बहुमत का समर्थन जुटाने वाले गठबंधन को मिलता है। और इस बार इजरायल की राजनीति ने एक बात साफ कर दी है। कुर्सी कितनी भी मजबूत क्यों न हो, लोकतंत्र में उसकी चाबी आखिरकार जनता के वोट के पास ही होती है।

फिलहाल 19 सीटों ने नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि इजरायल में अगली सरकार किसकी बनेगी। 

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