Indian Foreign Policy History In Hindi: ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़रायल के युद्ध बाद ईरान द्वारा अरब देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम पर पहुँच गया। जिसके बाद ईरान ने अमेरिका पर दबाव के लिए अपने नियंत्रण वाले होरमुज स्ट्रेट को बंद कर दिया, यह वही मार्ग है जिससे दुनिया का भर का 20 प्रतिशत गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई गुजरती है। इस फैसले के बाद वैश्विक भू-राजनीति में हलचल मच गई। भारत समेत कई देशों से गैस और पेट्रोल संकट की खबरें आने लगी। लेकिन इस वैश्विक संकट के बीच ईरान ने चुनिंदा मित्र देशों भारत, चीन और रूस के जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी। तो चलिए आज हम जानते हैं सत्तर साल में कैसे बदली भारत की विदेश नीति? इतिहास और समय के साथ हुए उनके बदलाव के बारे में जानते हैं।
स्वतंत्रता से पहले की विदेश नीति
भारत की विदेश नीति का जन्म 1947 में स्वतंत्रता के साथ हुआ, लेकिन उसका बौद्धिक और नैतिक आधार उससे भी पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तैयार हो चुका था। आजादी के पहले भारत की विदेश नीतियों का निर्धारण ब्रिटिश सरकार ही किया करती थी, इसीलिए इस दौरान भारत के विश्व के दूसरे देशों से राजनायिक संबंध ना के बराबर थे। फिर भी 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद भारतीय नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करनी शुरू कर दी। 1885 में ही कांग्रेस ने उत्तरी बर्मा के ब्रिटिश अधिग्रहण का विरोध किया, 1892 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों से अलग बताया और 1921 में एक प्रस्ताव पास करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि भारत, ब्रिटिश विदेश नीति का प्रतिनिधि नहीं है।
नेहरु की गुटनिरपेक्ष नीति
लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। यूरोपीय शक्तियों का प्रभुत्व कम हुआ और अमेरिका तथा सोवियत संघ महाशक्ति बनकर उभरे। ऐसे विभाजित और शीत युद्ध से प्रभावित विश्व में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना थी। स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट किया कि भारत अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन सभी के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखेगा, पर किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनेगा। इसी सोच से गुटनिरपेक्षता की नीति जन्मी, आगे चलकर यही नीति “नॉन अलाइंड मूवमेंट” के रूप में विकसित हुई, जिसने एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया। नेहरू ने विश्व शांति, उपनिवेशवाद के विरोध और विकासशील देशों की एकता को भारत की विदेश नीति का नैतिक आधार बनाया। हालांकि इसके साथ ही नेहरु ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की गुटनिरपेक्षता तटस्थ नहीं है बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं के प्रति सचेत रहने की है। यही संकल्प उन्होंने अमेरिकी सीनेट में दिए गए अपने भाषण में भी दुहराया। पंडित नेहरु के इसी गुट-निरपेक्ष आंदोलन ने भारत को विश्व पटल पर प्रसिद्धि दिलवाई।
चीन के साथ पंचशील
इसी काल में चीन के साथ पंचशील सिद्धांतों पर समझौता हुआ, जिसमें चीनी प्रीमियर झोउ एनलाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत ने यूनाइटेड नेशन में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए स्वयं को शांति और सहयोग के समर्थक देश के तौर पर स्थापित किया। लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध ने पंडित नेहरु के इस आदर्शवादी दृष्टिकोण की कमियाँ और सीमाएँ भी उजागर कर दीं और यह स्पष्ट हुआ कि केवल नैतिकता ही पर्याप्त नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन भी आवश्यक है।
भारत और अमेरिका संबंध
दरसल आजादी के बाद से ही अमेरिका का रुख भारत से मित्रता का रहा है, क्योंकि एशिया में जापान के बाद उसे दूसरे राष्ट्र की जरूरत थी, जो साम्यवादी ना हो। लेकिन भारत साम्यवादी भले ना सही, लेकिन समाजवादी जरूर था, इसीलिए अपने पहले अमेरिकी दौरे को लेकर पंडित नेहरु बहुत सचेत थे। पर परिस्थितियों के अनुसार अमेरिका भारत की जगह पाकिस्तान को प्राथमिकता दे रहा था। दरसल भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति और शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ और मध्य एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं, जिन्होंने दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी बना दिया। इसीलिए अमेरिका ने भारत पर पाकिस्तान समर्थित कबिलाई हमलों पर ढुलमुल रवैया अपनाया, इसी तरह 1955 में अमेरिका ने गोवा में भारतीय हितों की अनदेखी करते हुए उसे पुर्तगाल का एक प्रांत बताया। दरसल अमेरिका कम्युनिस्ट चीन को संयुक्तराष्ट्र संघ में प्रतिनिधित्व दिए जाने की भारत की मांग से प्रसन्न नहीं था। अमेरिका ने 1949 में भारत के खाद्य सहायता के लिए गए अनुरोधों पर भी ध्यान नहीं दिया था। बाद में जॉन एफ. केनेडी के समय अमेरिकी राजदूत गैलब्रेथ की मध्यस्थता के कारण संबंधों में सुधार हुआ और चीन युद्ध के दौरान अमेरिका का समर्थन भारत के प्रति समझ आया भी।
भारत और सोवियत संघ संबंध
तो वहीं दूसरी ओर सोवियतसंघ था, जिससे भारत के शुरुआत में संबंध उदासीन थे। इस उदासीनता का कारण सोवियत संघ की यह सोच थी, उसे लगता था भारत अभी भी साम्राज्यवादी प्रभाव में हैं। लेकिन कोरियाई युद्ध संकट से निपटने की भारत की भूमिका ने उसे प्रभावित किया, ध्यान दें अमेरिका ने कोरियाई युद्ध में भारतीय रुख की आलोचना की थी। इसी तरह अमेरिका के टाल-मटोल के विपरीत सोवियत संघ ने चीन के साथ मिलकर भारत में सूखे इत्यादि के बाद हुए खाद्य संकटों से निपटने के लिए सहायता भी भिजवाई। इसके साथ ही भारतीय राजदूत एस. राधाकृष्णन के माध्यम से स्टालिन ने मैत्री प्रस्ताव भी भेजा। संयुक्त राष्ट्र में सोवियत संघ का झुकाव कश्मीर मुद्दे पर भारतीय पक्ष की तरफ दिखने लगा। इसी दौरान सोवियत संघ ने भारत को सैन्य उपकरणों की पेशकश की, लेकिन भारतीय नेतृत्व ने इंकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था, सोवियत संघ दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन और अपने हितों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से ऐसा कर रहा है, यह गलत भी नहीं था, क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान को पहले ही रक्षा उपकरण उपलब्ध करवा रहा था। सोवियत संघ ने कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में बार-बार भारतीय हितों का समर्थन करते हुए अपने वीटो पावर का प्रयोग किया, यहीं नहीं गोवा के भारत में एकीकरण के मुद्दे पर भी संयुक्त राष्ट्र में भारत का ही समर्थन किया। कश्मीर के लिए संयुक्तराष्ट्र में दिए गए समर्थन के कारण ही भारत और सोवियत संघ की प्रगाढ़ मैत्री हुई।
भारत के आर्थिक विकास में सहयोग
इसके साथ ही अमेरिका के विपरीत उसने भारत के आर्थिक विकास में भी अग्रणी भूमिका में रहा। भिलाई एवं बोकारो जैसे भारी संयत्रों के निर्माण और तकनीकी में उसने मदद की। बाद में तेल अन्वेषण के क्षेत्र में भी उसने भारत की मदद की। लेकिन फिर भी नेहरु सरकार उसके साथ रक्षा सहयोग लेने से हिचकिचा रही थी। लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध में सोवियत संघ तटस्थ रहा, जबकि अमेरिका मुखर, दोनों के ही यहाँ निःसंदेह अपने-अपने हित थे। लेकिन नेहरु सरकार ने सोवियत संघ के तटस्थता में भी चाइना के साथ उसके मतभेदों को ताड़ लिया, दरसल भारत ही नहीं चीन का सोवियत संघ से भी सीमा विवाद था। इसके बाद नेहरु सरकार ने 1960 में उसके साथ पहला रक्षा समझौता किया और आपूर्ति विमान, हेलिकॉप्टर समेत कुछ और इंजिनीयरिंग उपकरण भी प्राप्त किए।
भारत और सोवियत संघ की प्रगाढ़ मैत्री
लेकिन इसके बाद 1960 और 70 के दशक में भारत की विदेश नीति में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। जहाँ नेहरु गुटनिरपेक्ष की नीति को लेकर चल रहे थे, तो वहीं इंदिरा गांधी ने अधिक यथार्थवादी और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया और सोवियत संघ के साथ कई सामरिक समझौते किए। 1971 में सोवियत यूनियन के साथ हुई इस मैत्री संधि ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन में भारत की स्थिति को मजबूत किया। इसी दशक में बांग्लादेश युद्ध में निर्णायक विजय और 1974 के परमाणु परीक्षण और सिक्किम के भारत के विलय ने यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कठोर निर्णय लेने में सक्षम है। इस दौर में विदेश नीति का स्वरूप आदर्शवाद से हटकर राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर केंद्रित हो गया। और इसमें निःसंदेह इंदिरा गांधी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। 1971 के पाकिस्तान से युद्ध के दौरान सोवियत संघ ने भारत की बहुत मदद की थी, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश पाकिस्तान के पक्षधर थे, सोवियत संघ ने ना केवल इस दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के पक्ष में वीटो किया, बल्कि अपना एक जहाजी बेड़ा भी भारत की तरफ रवाना कर दिया। इसके बाद भारत अघोषित ही सही सोवियत संघ की तरफ उसका झुकाव बना ही रहा।
लेकिन 1991 में शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन ने विश्व व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इस नई परिस्थिति में भारत को अपनी विदेश नीति को आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना पड़ा। आर्थिक उदारीकरण के बाद की विदेश नीति में व्यापार, निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था की भूमिका सर्वप्रमुख हो गई। इसकी नींव रखी थी तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने। उन्होंने इज़राइल से संबंध स्थापित किए, अमेरिका और चीन से रिश्ते सुधारे और “लुक ईस्ट नीति” शुरू की। जिसका अर्थ था, पश्चिम जगत अर्थात यूरोप और अमेरिका पर निर्भरता कम करना। उनकी इसी नीति को उनके परवर्ती प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेई और मनमोहन सिंह ने भी आगे बढ़ाया, उनके नेतृत्व में भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को मजबूत किया, साथ ही “लुक ईस्ट नीति” के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाया। इस दौर में यह स्पष्ट हो गया था कि वैश्विक राजनीति में प्रभावशाली बनने के लिए आर्थिक महाशक्ति बनना अनिवार्य है।
सत्तर साल में कैसे बदली भारतीय विदेश नीति? | Indian Foreign Policy History In Hindi
वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति एक नए “रणनीतिक स्वायत्तता” के चरण में प्रवेश कर चुकी है, जिसे मल्टी-अलाइनमेंट नीति कहा जा सकता है। भारत एक साथ अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी, रूस से रक्षा सहयोग, मध्य-पूर्व से ऊर्जा संबंध और यूरोप से तकनीकी सहयोग बनाए हुए है। वह इज़राइल का रक्षा सहयोगी है, फिर भी फिलिस्तीन के संप्रभुता का समर्थन करता है, अरब देशों के साथ भी उसके अच्छे संबंध है।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण हम हाल की घटनाओं ईरान-इजराइल युद्ध के समय भी देख सकते हैं। ईरान भारत का बड़ा तेल सप्लायर और पुराना साझेदार है। भारत और ईरान के सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्ष प्राचीन हैं। जबकि इजराइल भारत के रक्षा और तकनीकी क्षेत्र का प्रमुख सहयोगी है। भारत इज़राइल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग जारी रखे हुए है, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा और कनेक्टिविटी संबंध भी बनाए रख रहा है। साथ-साथ वह लगातार शांति और बातचीत की अपील भी कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि भारत ने ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए हमलों की आलोचना की, लेकिन साथ ही संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के खिलाफ वोट भी किया है। यानी भारत न पूरी तरह किसी एक पक्ष के साथ खड़ा है और न ही चुपचाप तटस्थ बैठा है। बल्कि दोनों पक्षों से संबंध बनाए रखकर अपने हित को सुरक्षित कर रहा है।
आदर्शवाद से रणनीतिक स्वायत्तता तक
एक तरह से यह नीति पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर “रणनीतिक स्वायत्तता” का केंद्र बन गई है। भारत अब केवल संतुलन साधने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर सक्रिय भूमिका निभाने वाला राष्ट्र बन गया है। जी-20 की अध्यक्षता, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और वैक्सीन कूटनीति जैसे प्रयासों ने भारत की वैश्विक छवि को और भी मजबूत किया है। इस पूरे विकासक्रम को देखें तो स्पष्ट होता है कि भारत की विदेश नीति स्थिर नहीं रही, बल्कि समय और परिस्थितियों के अनुसार निरंतर विकसित होती रही है। आदर्शवाद से प्रारंभ होकर रणनीतिक यथार्थवाद, आर्थिक कूटनीति और वर्तमान बहुध्रुवीय दृष्टिकोण तक की यात्रा भारत की परिपक्वता और बदलती वैश्विक भूमिका को दर्शाती है। आज भारत क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है और उसकी विदेश नीति का केंद्रीय सिद्धांत स्पष्ट है- सभी के साथ सहयोग, परंतु राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है।




