नागपंचमी और सोमवार का दुर्लभ संयोग, खुलेगा एमपी का नागचंद्रेश्वर मंदिर, उज्जैन में आस्था का कुंभ

उज्जैन। सावन के तीसरे सोमवार को नागपंचमी का पर्व भी मनाया जा रहा है। यह संयोग है कि सोमवार के दिन नागपंचमी का पर्व पड़ा है, क्योकि दोनों ही तिथियां भगवान शिव से जुड़ी हुई है। भगवान शिव के गले में नाग देवता आभूषण के रूप में सुशोभित रहते हैं, इसलिए सावन सोमवार के दिन नागपंचमी का होना शिव आराधना और नाग पूजन के फल को कई गुना बढ़ा देता है।

उज्जैन में आस्था का कुंभ

उज्जैन में 17 अगस्त को मानों आस्था का कुंभ नजर आऐगा। सावन का तीसरा सोमवार और नागपंचमी, एक ही दिन पड़ने से महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटेगी। इसकी एक वजह है भी है कि महाकाल मंदिर के तीसरे तल पर विराजमान भगवान नागचंद्रेश्वर के पट 16 अगस्त की मध्यरात्रि 12 बजे से 17 अगस्त की मध्यरात्रि 12 बजे तक यानि की 24 घंटे के लिए खोले जाएंगे।

वर्ष में एक बार खुलता है यह मंदिर

बताया जाता है कि नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में एक ही बार श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। यह 24 घंटे तक खुला रहता है और ठीक समय पर एक साल के लिए बंद कर दिया जाता है। यही वजह है कि इस एक दिन के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। इस बार सावन सोमवार और नागपंचमी का संयोग होने से प्रशासन के सामने भीड़ प्रबंधन एक बड़ी चुनौती होगी।

नागचंद्रेश्वर भगवान का ऐसा है विधान

16 अगस्त की रात करीब 11.30 बजे से नागचंद्रेश्वर भगवान के प्रथम पूजन की प्रक्रिया शुरू होगी। मध्यरात्रि 12 बजे पट खुलने के समय श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि महाराज द्वारा भगवान नागचंद्रेश्वर का पूजन-अभिषेक किया जाएगा। इस दौरान मंदिर प्रबंध समिति और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। पूजन के बाद आम जनों के दर्शन पूजन करने के लिए मंदिर को खोल दिया जाएगा और तय समय पर 24 घंटे में बंद होगा।

मंदिर की मुख्य विशेषताएँ

  • वर्ष में एक बार खुलना: इसके पट केवल नागपंचमी की मध्यरात्रि 12:00 बजे खुलते हैं और अगले दिन रात्रि 12:00 बजे बंद होते हैं।
  • दुर्लभ प्रतिमा: इस प्रतिमा में भगवान शिव, माता पार्वती और गणेशजी दस मुख वाले शेषनाग पर बैठे हैं।
  • कालसर्प दोष मुक्ति: मान्यता है कि इस एक दिन दर्शन करने से सभी प्रकार के सर्प दोष और कालसर्प योग दूर होते हैं।

इतिहास और परंपरा

  • इस प्राचीन मंदिर का निर्माण परमार राजा भोज द्वारा लगभग 1050 ईस्वी में करवाया गया था।
  • सन 1732 में सिंधिया राजवंश के महाराज राणोजी सिंधिया द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया था।
  • नागपंचमी पर यहाँ तीन बार (त्रिकाल) विशेष पूजा की परंपरा है—मध्यरात्रि में महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा, दोपहर में शासकीय पूजा, और शाम को महाकाल मंदिर के पुजारियों द्वारा आरती।

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