योगमाया के दिव्य प्रभाव से बदल गया था गर्भ, बलराम का फिर हुआ था जन्म, हलषष्ठी पर महिला ने की पूजा

बलराम जंयती। बलराम जयंती भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार भगवान बलराम के प्रकटोत्सव के रूप में मनाई जाती है, जिसका आध्यात्मिक, शारीरिक और कृषि की दृष्टि से बहुत बड़ा महत्व है। भगवान बलराम को आदि शेषनाग का अवतार, बलदेव, बलभद्र और हलायुध, तथा कृषि और शक्ति का देवता माना जाता है। उनका मुख्य शस्त्र हल और गदा है, इसलिए उन्हें कृषकों का आराध्य देव भी कहते हैं। उत्तर भारत में इस पावन पर्व को हल षष्ठी, ललही छठ, या बलदेव छठी के नाम से भी जाना जाता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

भगवान बलराम को बल, शक्ति और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से भक्तों को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। वैष्णव परंपरा के अनुसार, भगवान बलराम को आदि गुरु माना गया है। ऐसा माना जाता है कि बलराम जी की कृपा के बिना श्री कृष्ण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

संतान की रक्षा का उपवास

भगवान बलराम का जन्म भादौ मास की षष्ठी को माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतानों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। दोपहर या पूजन के पश्चात ही व्रत खोला जाता है। उत्तर भारत में इस पर्व को हलषष्ठी या ललह छठ के रूप में भी मनाया जाता है, जहाँ माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं।

योगमाया के दिव्य प्रभाव बदल गया था गर्भ

भगवान श्री बलराम का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (हलषष्ठी) को रोहिणी नक्षत्र और योगमाया के दिव्य प्रभाव से रोहिणी के गर्भ द्वारा हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बलराम जी पहले माता देवकी के गर्भ में आए थे (जो उनका सातवां गर्भ था)। अत्याचारी कंस देवकी के सभी संहार कर रहा था क्योंकि भविष्यवाणी थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। सातवें गर्भ को सुरक्षित रखने के लिए भगवान विष्णु ने योगमाया को आदेश दिया। योगमाया ने देवकी के गर्भ को गोकुल में वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित (प्रत्यारोपित) कर दिया। कंस के महल में सबको यही लगा कि देवकी का गर्भपात हो गया है, जबकि वास्तविक रूप से बलराम जी का जन्म माता रोहिणी के यहाँ हुआ।

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