Datia Bypoll Election News: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा (Datia Assembly), भले ही भौगोलिक रूप से बहुत बड़ी सीट नहीं है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से यहां पूरे प्रदेश की नजर रहती है। दतिया पिछले कुछ दिनों से पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती की विधायकी समाप्त होने के बाद यह सीट खाली हो गई जिसे भरने के लिए 30 जुलाई को दतिया की जनता एक बार फिर मतदान करेगी। BJP ने इस सीट से फ्रेश फेस आशुतोष तिवारी (Ashutosh Tiwari Datia) को उम्मीदवार बनाया है जो अपनी 25 साल की राजनीति में पहली बार चुनाव लड़ने जा रहे हैं. वहीं कांग्रेस ने इस सीट को फिर से जीतने के लिए अपने पुराने और अनुभवी चेहरे, पूर्व विधायक घनश्याम सिंह (Ghanshyam Singh Datia) पर दांव लगाया है. दतिया की जनता के सामने दो विकल्प हैं एक तरफ युवा नेता, 51 साल के आशुतोष तिवारी, जो सामान्य परिवार से आते हैं, उनके पिता सरकारी टीचर हैं, उनके पास बूथ, मंडल और जिला स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव है, वे MPHIDB के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ 71 साल के घनशयाम सिंह हैं जो दतिया की रॉयल फैमिली से ताल्लुख रखते हैं 1993 और 2003 के चुनाव में दतिया से विधायक रहे, 2018 में दतिया जिला की सेवढ़ा विधानसभा से भी जीत हासिल की और करीब तीन दशक के राजनीतिक अनुभव के साथ वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कांग्रेस का एक मजबूत चेहरा माने जाते हैं।
लेकिन सवाल ये है कि आखिर दतिया का मुकाबला इतना दिलचस्प क्यों हो गया है? इसकी सबसे बड़ी वजह है यहां का राजनीतिक इतिहास। दतिया की राजनीति लंबे समय तक दो बड़े चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। एक तरफ भाजपा के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता घनश्याम सिंह। पिछले दो दशकों में दतिया की सियासत में इन दोनों नेताओं का प्रभाव साफ दिखाई देता रहा है।
अगर पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2023 की बात करें, तो कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया था। यह सिर्फ एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि प्रदेश की राजनीति में सबसे चर्चित परिणामों में से एक थी। नरोत्तम मिश्रा लगातार कई बार दतिया का प्रतिनिधित्व कर चुके थे और शिवराज सरकार में गृह मंत्री जैसे अहम पद पर भी रहे थे। ऐसे में उनकी हार ने भाजपा को बड़ा झटका दिया।
हालांकि इस बार चुनाव का समीकरण 2023 से बिल्कुल अलग है। भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा की जगह नया चेहरा आशुतोष तिवारी उतारा है। यानी पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि वह स्थानीय संगठन और नई पीढ़ी के नेतृत्व पर भरोसा जताना चाहती है। हालांकि टिकट बदलने के फैसले के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी भी खुलकर सामने आई। कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए और पार्टी नेतृत्व को स्थिति संभालनी पड़ी। अब भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संगठन पूरी तरह एकजुट होकर मतदान तक काम करे।
वहीं कांग्रेस ने कोई जोखिम नहीं लिया। पार्टी ने अनुभवी घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है। कांग्रेस का मानना है कि उपचुनाव में व्यक्तिगत पहचान, स्थानीय नेटवर्क और संगठनात्मक अनुभव बड़ी भूमिका निभाते हैं। घनश्याम सिंह इन तीनों पैमानों पर मजबूत उम्मीदवार माने जाते हैं।




