Bagheli Tradition | क्या आपने देसी छिलनी “सूती” देखी है?

Bagheli Tradition Hindi Mein: क्या आपने कभी सोचा है अपने रीवा और बघेलखंड में जब स्टील के चाकू या पीलर मने छिलनी का चलन नहीं था, तब लोग सब्जियाँ कैसे छीलते थे? क्योंकि कुछ सब्जियों को बिना छीले तो बनाया ही नहीं जा सकता है। दरअसल तब हमारे घरों में एक बेहद रोचक और देसी यंत्र था। जो किसी धातु या कारीगरों द्वारा किसी कारखाने में नहीं बनाया जाता था, बल्कि प्रकृति द्वारा निर्मित होता था। यह छोटा-सा लेकिन बेहद जरूरी और काम का औजार “सूती” कहलाता था, जो “सीपी” शब्द का देशज रूप था।

क्या है सूती

असल में यह अपने विंध्य क्षेत्र के तालाबों और नदी क्षेत्र के कछारों में पाए जाने वाले जलीय घोंघे की प्रजाति के जीव की कठोर बाहरी खोल या खोपड़ी होती है। यह खोल इतना मजबूत और चिकना होता है कि इसमें काँच की तरह तेज किनारा बन जाता है। दरसल पहले के समय में आज की तरह नल फिटिंग, पाइपलाइन या बोरिंग वगैरह तो होते नहीं थे, कुएं भी बहुत सीमित मने कुछ साधन-सम्पन्न लोगों के पास ही होते थे। तो पानी के लिए लोग नदी और तालाबों पर आश्रित होते थे।

कहाँ मिलती है सूती

जेठ-बैशाख की प्रचंड गर्मी और धूप के कारण तालाबों का जलस्तर जब कम होता, तो सूखी मिट्टी में खूब सारे छोटे बड़े सीपी पड़ी रहती थीं, इनके अंदर का जलीय जीव जल के आभाव और धूप से सूख जाता था। गाँव भर के बच्चे युवा जब तालाब में नहाने जाते, तो खेल-खेल में अक्सर इन्हें पानी या किनारे की सूखी मिट्टी में ढूँढ लेते थे और घर उठा लाते थे। घर लाकर इन्हें पहले तो अच्छी तरह पानी से धोया जाता, और फिर चिकने पटिया या पत्थर की सतह पर पहले थोड़ा सा पानी डालकर उसमें रगड़कर घिसा जाता था, धीरे-धीरे घिसकर इसमें एक छोटा सा छेद बना दिया जाता। और बस तैयार हो जाता था एक प्राकृतिक सब्जी छीलने की मशीन। इससे लौकी, कद्दू, आलू जैसी सब्जियाँ आसानी से छीली जाती थीं।

जब सूती से छिलते थे आम

लेकिन सूती से सबसे ज्यादा आम छीले जाते थे, चूंकि इस समय आम का मौसम भी चल रहा है, तो सूती और आम की याद बरबस ही हम लोग को आ जाती है। दरसल पहले के समय लोगों के यहाँ खूब आम के पेड़ और बगीचे होते थे। जेठ-आषाढ़ के दिनों में जब आँधी-पानी का मौसम बनता तो पेड़ों से खूब कच्चे आम जमीन पर टपककर गिर जाते थे। अब इतने आमों का अचार बनाना संभव नहीं होता था, इसलिए घरों में एक अलग परंपरा थी इन गिरे हुए आमों से अमकोरिया और आमचूर तैयार किया जाता था। इसके लिए गिरे हुए आमों को बिनकर इन्हें सूतियों से छीला जाता था, फिर उन्हें काटकर धूप में सुखाने के लिए डाल दिया जाता। कुछ ही दिनों में वही आम सूखकर अमकोरिया बन जाते थे, इनका उपयोग दाल में खटाई के लिए किया जाता था। बाद में इन्हीं सूखे हुए अमकोरिया को खल-बट्टे या काँड़ी-मूसर से कूटकर और महीन कपड़े से छानकर अमचूर बनाया जाता था, जो सब्जियों और दूसरे पकवानों में खटाई के लिए वर्ष-भर प्रयोग किया जाता था।

सूती, आम और बचपन की यादें

इस सूती और आम से हम लोगों के बचपन की एक और भी मीठी याद जुड़ी है, जब हम बच्चे आम ताकने और बीनने बगीचे जाते थे, तो अपने साथ सूतियाँ जरूर ले जाते थे और फिर पेड़ के नीचे बैठे.बैठे आम छीलना और वहीं नमक-मिर्च लगाकर खाना, उस स्वाद और उस आनंद की बराबरी आज भी नहीं की जा सकती है।

सूती से निकाली जाती थी दूध की करोनी | Bagheli Tradition

इसके साथ ही सूती का एक और बड़ा ही मजेदार उपयोग होता था, जिसका हम बच्चे बड़े बेसब्री से इंतज़ार करते रहते थे। दरसल पहले के समय में दूध मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता था, जिसे हमारी बघेली भाषा में दोहनी कहा जाता था। यानी वह बर्तन जिसमें दूध दुहा या रखा जाता था। दोहनी में भरा दूध ज़मीन में बने गड्ढे यानी औंधा में रखकर ऊपर से छेद वाली गोरसी से मूंदकर अंगारों की धीमी आँच पर पकाया जाता था। इस तरह धीमी आंच में पके दूध में ऊपर तो मोटी-मोटी मलाई जमती ही थी, लेकिन साथ ही साथ नीचे दोहनी में में भी मलाई की एक खास परत भी बनती थी, जिसे बघेलीभाषा में करोनी कहते हैं। उसकी बाद हमारी दादी उसे निकालने के लिए सूती का ही सहारा लेतीं और उसके नुकीले किनारे से करोकर मने रगड़-रगड़कर करोनी उतारतीं थी। घर के सब बच्चे दादी के आस-पास उन्हें घेरकर बैठ जाते और करोनी का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते, फिर वह स्वादिष्ट करोनी हमें बच्चों को मिलती। दूध और पकी मिट्टी की सुगंध से भरी ऐसी मिठास जिसके सामने आज के छप्पन भोग भी फीके लगते हैं।

अब बची है बस पुराने दिनों की यादें

खैर वह समय अब कहाँ रहा, न वह संयुक्त परिवार बचे हैं ना वह रौनक और ही बुजुर्गों का वह स्नेहभरा साथ। आज बच्चों के लिए परिवार की परिभाषा बस माँ-बाप तक सिमट गई है। सूती की जगह आधुनिक पीलर्स ने ले ली है और आम भी अब कलमी -हाइब्रिड होकर जल्दी फलने लगे हैं। पेड़ों के नीचे खड़े होकर टपके आमों को ताकने और बीनने वाले बच्चे अब घरों के भीतर स्क्रीन पर वीडियो गेम्स में खोए रहते हैं। दूध के लिए न दोहनी बची और ना ही औंधा। ज़िंदगी ने रफ्तार ऐसी पकड़ी है कि जैसे सबकुछ पीछे छूट गया। अब हमारे पास बस उन सुनहरे दिनों की यादें हैं, जिन्हें हमने जी भरकर जिया था और हम आज भी कहीं न कहीं उन्हें तलाशते और महसूस करते रहते हैं।

युवा सूती से अंजान

आज के समय की जनरेशन को यह बात अजीब लग सकती है, कि किसी जीव के खोल का उपयोग सब्जी छीलने के लिए किया जाता था। लेकिन अगर सोचें तो मंदिरों में बजने वाला शंख भी समुद्री जीव की ही बाहरी खोल से बनता है। यानी प्रकृति से मिले संसाधनों का उपयोग करना हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है। बिना प्लास्टिक बिना फैक्ट्री और पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल। सच में यह सिर्फ एक औजार नहीं था बल्कि उस समय के हमारे पुरुखों की बुद्धिमत्ता और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली का एक बहुत खूबसूरत उदाहरण था।

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